आर्मेनिया से भारत की यारी जरूरी! पाक-बाकू साजिश के खात्मे हेतु!!



--के• विक्रम राव,
अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

दुनिया की दृष्टि केवल गाजा पट्टी पर ही केंद्रित है। साफ दिखता है कि वैश्विक सरोकार बलहीन राष्ट्रों पर कितना नगण्य है, बल्कि संवेदनहीन। इसका प्रमाण है कि इस्लामी अजरबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीयोवा खुलेआम ईसाई पड़ोसी देश अर्मेनिया के नागोर्नो-कारबाख क्षेत्र में सैनिक कब्जा कर चांद-सितारों वाला हरा परचम लहराते जमीन पर घुटने टेक कर विजयोल्लास से चूमना। खोजाले नामक इस नगर में दिनदहाड़े ऐसा साम्राज्यवादी हमला है! ईसाई अमेरिका मौन रहा। अपने सहधर्मियों पर राष्ट्रपति बाइडेन की जीभ सिली रही। हर स्वतंत्रताप्रेमी, पंथनिरपेक्ष मानव को ग्लानि होगी, क्लेश होगा। याद रहे विश्व का प्रथम देश आर्मेनिया है जिसने ईसा मसीह का धर्म अपनाया था। यकीन नहीं होता कि यहूदी इसराइल भी इस मुस्लिम मुल्क का मित्र हो सकता है।

भारतीयों का दिल जल जाना चाहिए था क्योंकि भारत विभाजन के जनक मियां मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा स्थापित अंग्रेजी दैनिक “दि डॉन” ने अपने कराची संस्करण में मुख्य पृष्ठ पर यही चित्र (16 अक्तूबर 2023) छापा। आक्रामक राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव चाँद-सितारे वाली हरी-पताका को माथे से लगाए हैं। बीस सदी पुरानी ईसाई धरती पर हरा झण्डा चूमते। कुछ पाक-अधिकृत गिलगिट-कश्मीर की तर्ज पर अज़रबैजान-आर्मेनिया सीमा विवाद के चलते नागार्नो-काराबाख को भी हथियाया गया था। काला सागर और कैस्पियन सागर के बीच अंतरमहाद्वीपीय क्षेत्र में पहाड़ी भूमि से घिरे इस क्षेत्र को अर्मेनियाई लोग आर्टाख कहते हैं। इसके निवासी मुख्यतः आर्मेनियाई हैं। उनकी अपनी सरकार है जिसका आर्मेनिया के साथ घनिष्ठ संबंध है। सोवियत संघ के 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में भंग होने के बाद इस क्षेत्र द्वारा अज़रबैजान से स्वतंत्र होने की घोषणा के समय से ही नागोर्नो-काराबाख संघर्ष चला आ रहा है। यहां पहला युद्ध 1980 से चला था। जिसकी समाप्ति 1994 में युद्धविराम के साथ हुई। इसके बाद ही नागोर्नो-काराबाख अर्मेनियाई नियंत्रण में आ गए। दूसरे कराबाख युद्ध के बाद रूस ने एक शांति समझौते में मध्यस्थता की, जिससे इस क्षेत्र में रूसी बलों की तैनाती को स्वीकृति दे दी गई थी।

कूटनीतिक तौर पर इल्हाम अलीयेव रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के समर्थक माने जाते हैं। यूक्रेन पर हमले में वे रूस के समर्थक रहे। बताते हैं की इन्हीं इलहाम ने अपने पिता हैदर अलीयोव का प्रतिशोध लेने हेतु काराबाख को कब्जियाया है। दो दशक पूर्व हैदर ने वोटों की हेराफेरी कर राष्ट्रपति पद हासिल किया था। वो बीमार पड़ गए तो जीते जी अपने साहिबज़ादे इलहाम को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। परिवारवाद का ही परिणाम था। पूरा अलीयोव कुटुंब नाना प्रकार के राजकोषीय लूट में लिप्त है। तेल तथा खनिज पदार्थ की तस्करी के लिए मशहूर है। हैदर को तो मीडिया ने 2012 में “राष्ट्र के महाभ्रष्ट राजनेता” की उपाधि से नवाजा था। इस तानाशाह के शासन में एक भी स्वतंत्र व मुक्त मतदान नहीं हुआ।

अजरबैजान की राजधानी बाकू यूं तो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का शहर माना जाता है। पर यह भीषण तूफानों के लिए भी जाना जाता है। इसकी शाब्दिक उत्पत्ति फारसी शब्द “बदकुबे” से हुई है। जिसका अर्थ है "हवा से चलने वाला शहर", बाद मतलब पवन। इसमें निहित है क्रिया “कुबिदान” मतलब "टू पाउंड"। जहां हवा तेज़ होगी। भयंकर सर्दियों के बर्फीले तूफान और कठोर हवाओं का अनुभव करने के लिए यह जाना जाता है।

इन भ्रष्टाचारी अज़रबैजानी राजनेताओं की तुलना में ईसाई आर्मेनियायी राजनेता और प्रधानमंत्री निकोल बोवायी पाशिनियन भिन्न है, मर्यादित है। पेशे से श्रमजीवी पत्रकार रहे निकोल ने अपना भ्रष्टाचार-विरोधी समाचार पत्र निकाला था। उसे बंद करना पड़ा क्योंकि मानहानि का मुकदमा संपादक पर चला था। साल भर की सजा भी भुगती। संपादक निकोल ने 1999 से 2012 तक समाचार पत्र “हेकाकन ज़मानक” ("अर्मेनियाई टाइम्स") का संपादन किया। आर्मेनिया के पहले राष्ट्रपति लेवोन टेर-पेट्रोसियन के समर्थक थे। मगर वे दूसरे राष्ट्रपति रॉबर्ट कोचरियन, रक्षा मंत्री सर्ज सरगस्यान और उनके सहयोगियों के अत्यधिक आलोचक थे। वे रूस के साथ आर्मेनिया के घनिष्ठ संबंधों के भी सख्त विरोधी थे। इसके बजाय उन्होंने तुर्की के साथ संबंध को उन्होंने बढ़ावा दिया। 2007 के संसदीय चुनाव में उन्होंने एक छोटी विपक्षी पार्टी का नेतृत्व किया और 1.3% वोट प्राप्त किये। पशिनियन ने 2020 के नागोर्नो-काराबाख युद्ध के दौरान आर्मेनिया का नेतृत्व भी किया।

इतिहास के पन्नों पर आर्मीनिया का आकार कई बार बदला है। आर्मेनिया राजशाही के अंतर्गत वर्तमान तुर्की का कुछ भू-भाग, सीरिया, लेबनान, ईरान, इराक, अज़रबैजान और वर्तमान आर्मीनिया के भू-भाग सम्मिलित था। रोमन काल में अर्मेनिया फ़ारस और रोम के बीच बंटा रहा। ईसाई धर्म का प्रचार यूरोप और ख़ुद अर्मेनिया में इसी समय हुआ। सन 591 में बिज़ेन्टाईनों ने पारसियों को हरा दिया। पर 645 में वे ख़ुद दक्षिण में शक्तिशाली हो रहे मुस्लिम अरबों से हार गए। इसके बाद यहाँ इस्लाम का भी प्रचार हुआ। ईरान के सफ़वी वंश के समय (1501-1730) यह चार बार, इस्तांबुल के उस्मानी तुर्कों और इस्फ़हान के शिया सफ़वी शासकों के बीच यह हस्तांतरित होता रहा। सन् 1920 से लेकर 1991 तक आर्मीनिया एक साम्यवादी देश था। यह सोवियत संघ का एक सदस्य था। आज संघर्ष की वजह से आर्मीनिया की तुर्की और अज़रबैजान से लगती सीमा बंद रहती हैं। नागोर्नो-काराबाख पर आधिपत्य को लेकर 1992 में आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच लड़ाई हुई थी जो 1994 तक चली थी। आज इस जमीन पर आर्मीनिया का अधिकार है लेकिन अजरबैजान अभी भी जमीन पर अपना अधिकार बताता है। भारत को इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करना है। राष्ट्रहित में।

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