--परमानंद पांडेय,
अध्यक्ष - अंतर्राष्ट्रीय भोजपुरी सेवा न्यास,
राष्ट्रीय संयोजक - मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच, उत्तर भारत।
मकर संक्रांति सनातन धर्म के बड़े पर्वों में से एक है। इस साल मकर संक्रांति का त्योहार 15 जनवरी 2022 शनिवार को मनाया जाएगा। इस बार की मकर संक्रांति शनिवार और प्रदोष के युक्त होने से महान पुण्यफलदायी होगी। मकर संक्रांति का जितना धार्मिक महत्व है उतना ही वैज्ञानिक महत्व भी बताया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर ही मकर संक्रांति योग बनता है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। इस साल पौष शुक्ल द्वादशी शुक्रवार 14 जनवरी रात्रि 08:49 बजे सूर्य उत्तरायण होंगे यानी सूर्य अपनी राशि बदलकर धनु से मकर राशि में प्रवेश करेंगे।
शास्त्रों के निर्णयानुसार जिस समय सूर्य का प्रवेश मकर राशि में हो रहा हो, उसके कम से कम बीस घटी बाद पुण्यकाल माना जाता है जिसे हम समझने के लिये पर्व मनाने का समय भी कह सकते हैं। यदि यह संक्रांति रात्रि काल में हो रही हो तो पर्व काल अगले दिन होगा, ध्यान विषयक यह भी है कि इस पर्व में तिथि या दिन की कोई प्रधानता नहीं केवल संक्रांति समय की प्रधानता है।
इस वर्ष यह संक्रांति दिनांक 14 जनवरी 2022 को रात्रि 08:49 मिनट पर हो रही है जिसके कारण स्वतः शास्त्राज्ञानुसार 15 जनवरी 2022 को दिन में 11:49 तक संक्रांतिजन्य पुण्यकाल और संक्रांति का पर्व मनाना उचित होगा।
मकर संक्रांति के विषय में एक भ्रांति भी है कि यह त्यौहार 14 जनवरी को ही होता है जो नितांत भ्रामक है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार हर वर्ष सूर्य की घूर्णन गति लगभग 20 सेंकेड बढ़ जाती है, और हर वर्ष यह गति बढ़ते बढ़ते अनुमानतः सत्तर से अस्सी वर्षों में एक दिन की गणनायुक्त हो जाती है जिससे संक्रांति एक दिन बढ़ जाती है। ज्ञात ज्योतिषीय घटनाक्रमों की मानें तो महाभारत काल में संक्रांति मार्गशीर्ष शुक्ल में हुआ करती थी। छठी शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के काल में इस पर्व को 24 दिसंबर को मनाने के प्रमाण भी मिलते हैं। वहीं अकबर और शिवाजी महाराज के काल में क्रमशः 10 और 11 जनवरी को इस पर्व के मनाने का प्रमाण है। इन ज्योतिषीय गणनाओं के आलोक में देखें तो संभव है आने वाले चार पांच हजार वर्षों बाद यह संक्रांति फरवरी माह में हो।
मकर संक्रांति के दिन दान का भी विशेष महत्व है। महान शास्त्रज्ञ ऋषियों का कहना है कि इस दिन किया गया दान पुण्य और अनुष्ठान अभीष्ट फल देने वाला होता है।
• मोक्ष प्राप्ति हेतु गंगा स्नान : सनातन धर्म में मकर संक्रांति को मोक्ष की सीढ़ी बताया गया है। मान्यता है कि इसी तिथि पर भीष्म पितामह को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसके साथ ही सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण हो जाते हैं जिस कारण से खरमास समाप्त हो जाता है। प्रयाग में कल्पवास भी मकर संक्रांति से शुरू होता है। इस दिन को सुख और समृद्धि का दिन माना जाता है। गंगा स्नान को मोक्ष का रास्ता माना जाता है और इसी कारण से लोग इस तिथि पर गंगा स्नान के साथ दान करते हैं।
मकर संक्रांति पर शनि की प्रिय वस्तुओं के दान से शनि महाराज संतुष्ट हो जातक को शुभ फल देते हैं। इस कारण मकर संक्रांति के दिन तिल निर्मित वस्तुओं का दान शनिदेव की विशेष कृपा को घर परिवार में लाता है। आइए जानते हैं कि इस दिन राशि अनुसार किस चीज का दान करने से व्यक्ति को पुण्य फल की प्राप्ति के साथ उसका 100 गुना वापस मिलता है।
मकर संक्रान्ति का उत्सव लगभग सम्पूर्ण देश में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। क्योंकि आज के दिन से ही प्रकाश अर्थात् ज्ञान अर्थात् जीवन की उष्णता कम होने का क्रम बदलता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना अर्थात् संक्रमण करना ही मकर संक्रान्ति कहलाता है. वास्तव में संक्रान्ति *संक्रमण* का अपभ्रंश शब्द है, चूँकि हमने संक्रमण के स्थान पर संक्रान्ति शब्द को ही स्वीकार कर लिया है इसलिए इसे हम मकर संक्रान्ति ही कहते हैं।
जब सूर्य का संक्रमण धनु राशि से मकर राशि में होता है तो वह समय बहुत ही पवित्र एवं पुण्य-काल का माना जाता है। क्योंकि यह काल अज्ञानांधकार से प्रकाश रूप ज्ञान की ओर, असत्य से सत्य की ओर तथा मृत्यु से अमृत (जीवन) की ओर जाने का स्फूर्तिदायक एवं प्रेरणा प्रद काल है। कदाचित वेदों में भी इसी पुण्य पर्व के सन्दर्भ में कहा गया है :-
तमसो मा ज्योतिर्गमय
असतो मा सद् गमय
मृत्योर्माऽमृतं गमय
इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है। दक्षिण अर्थात् नीचे की ओर एवं उत्तर ऊपर की ओर यानी नीचे से ऊपर की ओर बढ़ना अर्थात् तमोगुण से सतोगुण की ओर बढ़ना। सूर्य का उत्तरायण होने का अर्थ है देवत्व को प्राप्त होना। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने अपने प्राणों का त्याग सूर्य का मकर राशि में प्रवेश अर्थात् सूर्य का उत्तरायण होने के लिए 58 दिन बाणों की शय्या पर लेटे रहने के पश्चात् किया था।
मकर संक्रान्ति पर्व काल में हिन्दू समाज पवित्र तीर्थों व पवित्र नदियों में स्नान कर समाज के अभावग्रस्त व दीन-हीन बन्धुओं को अन्न, धन, एवं वस्त्रादि प्रदान कर उन्हें जीवन यापन योग्य बनाते हैं।
आज भी भारत के गाँवों में गृहस्थ लोग प्रातःकाल अपने घरों के द्वार पर पशुओं के लिए चारा रख छोड़ते हैं जिससे चरने वाले पशु उस चारे को खाते जाते हैं। परिवार की महिलाएँ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अपने सास-श्वसुर व ज्येष्ठ आदि के चरण-स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं और उन्हें वस्त्रादि प्रदान कर परिवार का स्नेहमय उल्लासपूर्ण वातावरण बनाती हैं।
इस प्रकार मकर संक्रमण (मकर संक्रान्ति) एक श्रेष्ठ पारिवारिक पर्व के साथ-साथ एक सामाजिक व यज्ञ संस्कृति का पर्व भी है। इस अवसर पर सामूहिक यज्ञ किये जाते हैं। यज्ञ की सामग्री में तिलों की मात्रा अधिक रहती है।
यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि यज्ञ द्वारा मेघ (बादल) बनते हैं और वर्षा होती है। यज्ञ सामग्री में जब तिलों की अधिकता रहेगी तो मेघ (बादल) बनेंगे और वर्षा भी होगी क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और इस समय वर्षा की आवश्यकता होती है। यज्ञ-सामग्री में यव (जौं) की मात्रा अधिक रखकर हवन-यज्ञ करने से मेघ (बादल) विसर्जित होते हैं जो प्रायः फाल्गुन मास में होलिका दहन के अवसर पर देखने को मिलता है। क्योंकि फसल पक जाने के कारण वह समय वर्षा के लिए उपयुक्त नहीं होता।
वास्तव में हिन्दू समाज के पर्वोत्सव यज्ञ संस्कृति के उत्सव हैं। 'उत्सव' शब्द में उत् उपसर्ग के साथ सव पद जुड़ा है जिसका एक अर्थ यज्ञ भी होता है। लोहड़ी अथवा होलिका दहन आदि सामुहिक यज्ञों के ही स्वरूप हैं जिन्होंने काल-क्रम से आधुनिक रूप धारण कर लिया है।
● मकर संक्रांति के उपाय
• उपाय – 01 : मकर संक्रांति की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कामों से निपट कर सूर्य को अर्घ्य दें। अब पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का जाप करें।
ऊं आदित्याय विदमहे
दिवाकराय धीमहि
तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्
कम से कम 05 माला जाप अवश्य करें। इस प्रकार मंत्र जाप करने से जीवन की हर परेशानी दूर हो जाएगी। यदि इस मंत्र का जप प्रत्येक रविवार को किया जाए तो और भी जल्दी लाभ होता है।
• उपाय – 02
मकर संक्रांति को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद उगते हुए सूर्य को तांबे के लोटे से अर्घ्य दें। पानी में कुंकुम तथा लाल रंग के फूल भी मिलाएं तो और भी शुभ रहेगा। अर्घ्य देते समय "ऊं घृणि सूर्याय नम:" मंत्र का जाप करते रहें। इस प्रकार सूर्य को अर्घ्य देने से मन की हर इच्छा पूरी हो सकती है।
• उपाय – 03
सूर्य के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए मकर संक्रांति पर सूर्य यंत्र की स्थापना कर के पूजा करनी चाहिए। इससे दोष कम होते हैं और विशेष लाभ भी मिलता है। सूर्य यंत्र की स्थापना इस प्रकार करें-
स्थापना विधि – मकर संक्रांति की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सूर्यदेव को प्रणाम करें। इसके बाद सूर्य यंत्र को गंगाजल व गाय के दूध से पवित्र करें। अब इस यंत्र की पूजा करने के बाद सूर्य मंत्र का जाप करना चाहिए।
"मंत्र- ऊं घृणि सूर्याय नम:"
जाप करने के बाद इस यंत्र को अपने पूजा स्थान पर करें। इस यंत्र की पूजा से शीघ्र ही सूर्य संबंधी होने वाली समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।
• उपाय – 04
मकर संक्रांति पर गुड़ एवं कच्चे चावल बहते हुए जल में प्रवाहित करना शुभ रहता है। अगर सूर्यदेव को प्रसन्न करना हो तो पके हुए चावल में गुड़ और दूध मिलाकर खाना चाहिए। ये उपाय करने से भी सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और शुभ फल प्रदान करते हैं।
• उपाय – 05
मकर संक्रांति पर दान करने का विशेष महत्व है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किए गए दान का पुण्य सौ गुना होकर प्राप्त होता है। अगर आप चाहते हैं कि भाग्य आपका साथ दे तो इस दिन कंबल, गर्म वस्त्र, घी, दाल-चावल की कच्ची खिचड़ी आदि का दान करें। गरीबों को भोजन करवाएं तो और भी जल्दी आपकी मनोकामना पूरी होगी।
• उपाय – 06
ज्योतिष के अनुसार, तांबा सूर्य की धातु है। मकर संक्रांति पर तांबे का सिक्का या तांबे का चौकोर टुकड़ा बहते जल में प्रवाहित करने से कुंडली में स्थित सूर्य दोष कम होता है। इसके साथ-साथ लाल कपड़े में गेहूं व गुड़ बांधकर दान देने से भी व्यक्ति की हर इच्छा पूरी हो सकती है।
• उपाय – 07
मकर संक्रांति की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद पूर्व दिशा में मुख करके कुश के आसन पर बैठें। अपने सामने बाजोट (पटिए) पर सफेद वस्त्र बिछाएं और उसके ऊपर सूर्यदेव का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद सूर्यदेव की पंचोपचार पूजा करें और गुड़ का भोग लगाएं। पूजा में लाल फूल का उपयोग अवश्य करें। इसके बाद लाल चंदन की माला से नीचे लिखे मंत्र का जाप करें।
"मंत्र- ऊं भास्कराय नम:"
कम से कम 05 माला जाप अवश्य करें।
● राशि के अनुसार करें दान-पुण्य
• मेष - तिल-गुड़ का दान दें, उच्च पद की प्राप्ति होगी।
• वृष - तिल डालकर अर्घ्य दें, बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी।
• मिथुन - जल में तिल, दूर्वा तथा पुष्प मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें, ऐश्वर्य प्राप्ति होगी।
• कर्क - चावल-मिश्री-तिल का दान दें, कलह-संघर्ष, व्यवधानों पर विराम लगेगा।
• सिंह - तिल, गुड़, गेहूं, सोना दान दें, नई उपलब्धि होगी।
• कन्या - पुष्प डालकर सूर्य को अर्घ्य दें, शुभ समाचार मिलेगा।
• तुला - सफेद चंदन, दुग्ध, चावल दान दें। शत्रु अनुकूल होंगे।
• वृश्चिक - जल में कुमकुम, गुड़ दान दें, विदेशी कार्यों से लाभ, विदेश यात्रा होगी।
• धनु - जल में हल्दी, केसर, पीले पुष्प तथा तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें, चारों-ओर विजय होगी।
• मकर - तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें, अधिकार प्राप्ति होगी।
• कुंभ - तेल-तिल का दान दें, विरोधी परास्त होंगे।
• मीन - हल्दी, केसर, पीत पुष्प, तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें, सरसों, केसर का दान दें, सम्मान, यश बढ़ेगा।
श्रीरस्तु..शुभमस्तु।