--विजया पाठक
एडिटर, जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
● भाजपा के शीर्ष नेताओं ने देश की 140 करोड़ जनता की धार्मिक भावनाओं को किया आहत
● राम मंदिर उद्घाटन को लेकर देश के प्रमुख राजनेताओं सहित शंकराचार्यों ने बनाई दूरी
● बड़ा सवाल: देश के सभी मुख्यमंत्रियों को क्यों नहीं भेजा निमंत्रण?
● राजीव गांधी खुलवा चुके हैं पहले ही राम मंदिर के पट*
● पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ दे रहे भगवान राम में आस्था का परिचय
अयोध्या में 22 जनवरी को लगभग 500 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। निश्चित ही अय़ोध्या में राम मंदिर का निर्माण और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हर्ष और उल्लास का अवसर है। यह संपूर्ण भारतवासियों और सनातियों के लिये विशेष उपलब्धि का अवसर भी है। लेकिन पिछले कुछ समय से राम मंदिर के नाम पर भाजपा ने राजनीतिकरण का जो खेल रचा है वह निंदनीय है। भगवान राम किसी पार्टी और दल, नेता अथवा प्रधानमंत्री के नहीं हैं। वह इस धरती पर जन्में हर सनातनी के आराध्य हैं। ऐसे में कोई एक दल या पार्टी राम मंदिर निर्माण का क्रेडिट कैसे ले सकती है। आज यह सवाल हर भारतीय के मन में गूंज रहा है कि भाजपा और उसके नेताओं ने किस ढंग से राजनीति का षड़यंत्र रचकर राम मंदिर निर्माण का श्रेय खुद को दे दिया है। अपने हिसाब से लोगों को अयोध्या आने का आमंत्रण दे रहे हैं, अपने हिसाब से पूजा अर्चना में शामिल होने वाले लोगों निमंत्रण दे रहे हैं। भाजपा के नेताओं को जो लोग पंसद नहीं है, उन लोगों को पूरी तरह से दरकिनार किया जा रहा है। आखिर धर्म और मंदिर निर्माण के नाम पर इस तरह का खेल भाजपा ने क्यों रचा है।
• शंकराचार्य ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह पर जताई नाराजगी
सनातन धर्म में शंकराचार्य का पद बेहद अहम होता है। ये हिंदू धर्म के सर्वोच्च गुरु होते हैं। आदि शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों पर चार मठों की स्थापना की थी। उत्तर के बद्रिकाश्रम में ज्योर्तिमठ, दक्षिण में शृंगेरी मठ, पूर्व में जगन्नाथपुरी का गोवर्धन मठ और पश्चिम में द्वारका का शारदा मठ स्थापित है। मठ के मठाधीश ही शंकराचार्य कहलाते हैं। हिंदुओं के ये सबसे बड़े धार्मिक नेता हैं। चारों मठों के शंकराचार्य 22 जनवरी को राम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं होंगे। चारों शंकराचार्यों ने 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर के अभिषेक समारोह में शामिल नहीं होने का फैसला किया है, हालांकि उनमें से दो ने इस आयोजन का समर्थन करते हुए एक बयान जारी किया है। उत्तराखंड में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दूरी बनाई है। वे प्राण प्रतिष्ठा समारोह का सबसे मुखर होकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि अर्धनिर्मित मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा राजनीतिक है, यह नहीं होनी चाहिए। राम लला की प्राण प्रतिष्ठा चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को होनी चाहिए, जो उनका जन्मदिन है। उनका कहना है कि यह समारोह धार्मिक कम, राजनीतिक अधिक है। साल 2006 में अविमुक्तेश्वरानंद ने शंकराचार्य पीठ की जिम्मेदारी संभाली थी। शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती भी प्राण प्रतिष्ठा को शास्त्र विरुद्ध बता रहे हैं।
• देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को देना चाहिए था निमंत्रण
अयोध्या में 22 जनवरी को को होने वाले राम लला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में वैसे तो कई सेलिब्रिटी को बुलावा भेजा गया है। जिनमें फिल्म स्टार, क्रिकेट जगत की हस्तियां शामिल हैं लेकिन कहीं न कहीं इस आयोजन को राजनीतिक रंग भी दिया जा रहा है। यह विशेष आयोजन देश के हर एक देशवासी का है। हर देशवासी को तो अयोध्या बुलाया नहीं जा सकता है पर प्रदेश का मुखिया होने के नाते देश के सभी मुख्यमंत्रियों को जरूर बुलाया जा सकता था। लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया है। मुख्यमंत्रियों को बुलाने में सरकार ने भेदभाव किया है। ये सरासर गलत है। अगर प्रदेश के मुख्यमंत्री को निमंत्रण भेजा जाता तो सम्पूर्ण प्रदेश का प्रतिनिधित्व हो जाता। प्रदेश का हर नागरिक इस आयोजन का सहभागी बन जाता।
• राजीव गांधी के राज में भी मंदिर निर्माण के लिए हो चुका हैं शिलान्यास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही अगस्त 2020 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया और मंदिर की आधारशिला रखी। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन हो रहा है। इससे पहले साल 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के राज में भी मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास हो चुका हैं। बात उस समय की है जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे बीर बहादुर सिंह और केंद्र में सरकार थी राजीव गाँधी की। इन्हीं के शासन के दौरान सालों से बंद पड़े मंदिर के दरवाज़े खोले गए थे। राजीव गांधी ने बीर बहादुर सिंह के साथ तालमेल कर मंदिर के ताले खुलवाए और जिसके बाद 9 नवंबर, 1989 में अयोध्या में शिलान्यास हुआ। ऐसा नहीं है सबकुछ अचानक हुआ बल्कि इन सबकी शुरुआत काफी पहले हो गई थी। साल 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर ही दूरदर्शन पर रामायण का प्रसारण शुरू किया गया था। रामायण की उसी प्रसारण से राम मंदिर आंदोलन को ताकत मिली थी।
• लंबे समय तक चले आंदोलन के उदाहरण नहीं मिलते
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि भगवान राम के नाम पर पूरा देश एक है। उन्होंने कहा कि राम जन्मभूमि का आंदोलन विश्व के सबसे पुराने आंदोलनों में से एक है। किसी भी देश के इतिहास में किसी तीर्थ स्थल के लिए इतने लंबे समय तक चले आंदोलन के उदाहरण नहीं मिलते हैं। यह हिंदू धर्म के पुनरुत्थान का आंदोलन है। परांडे ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में राजनीतिक दलों के शामिल होने की बात है तो उस समय सभी पार्टियों को इसमें सहभागी होने को कहा गया था। यदि सभी दलों ने उस समय समर्थन किया होता तो यह राजनीतिक मुद्दा बनता ही नहीं। कौन साथ आए और कौन नहीं आए, यह उनका अपना निर्णय है। यह भी समझना होगा कि भारत के कण-कण में राम हैं। यहां हर जाति-संप्रदाय के लोगों के मन में राम बसते हैं। जो लोग समाज में भ्रम फैला रहे हैं उनसे देशवासियों को सचेत रहने की जरूरत है। प्रभु राम सामाजिक समरसता के सबसे बड़े उदाहरण हैं। इसलिए इस उत्सव में समाज के सभी वर्ग के लोगों को भाग लेने चाहिए और भगवान राम के काम में अपना योगदान देना चाहिए। जिनको 22 जनवरी के आयोजन में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से बुलाया जा रहा है, उन्हें जरूर जाना चाहिए, जिन्हें आमंत्रण नहीं मिल सका, उनके लिए भी कोई रोक नहीं। यह तो श्रद्धा का विषय है।
• कमलनाथ राम भक्ति में हुए लीन
कांग्रेस नेतृत्व ने भले ही अयोध्या के राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का न्योता ठुकरा दिया हो, लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ राम भक्ति में लीन नजर आ रहे हैं। कमलनाथ छिंदवाड़ा से 04 करोड़ 31 लाख राम नाम लिखे पत्रकों को अयोध्या भेजने की तैयारी कर रहे हैं। छिंदवाड़ा की मारुति नंदन सेवा समिति ने 21 दिनों का श्रीराम महोत्सव का आयोजन किया है। इस महोत्सव में संस्थान लोगों को राम नाम के पत्रक बांट रहा है। इसमें रामभक्तों और लोगों से 108 बार राम लिखकर वापस देने के लिए कहा जा रहा है। समिति की कोशिश है कि राम नाम के इस रिकॉर्ड संग्रह को प्राण प्रतिष्ठा उत्सव के दौरान ही अयोध्या पहुंचाया जाए। छिंदवाड़ा के सिमरिया स्थित प्रसिद्ध हनुमान मंदिर का प्रबंधन इसी समिति के हाथ में है। कमलनाथ और उनके सांसद बेटे नकुलनाथ इस समिति के संरक्षक हैं। ये मंदिर भी कमलनाथ ने ही बनवाया है। श्रीराम महोत्सव के दौरान छिंदवाड़ा-पांढुर्णा जिले में रामरक्षा स्त्रोत की पुस्तिका भी बांटी जा रही हैं। इस पुस्तिकाओं के कवर पर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और सांसद नकुलनाथ की तस्वीर छपी है।
https://www.indiainside.org/post.php?id=9591