अरविन्दो सम्मान मुझे मिलेगा, हर्षित या दुखी होने से परे हूं



--आचार्य विष्णु हरि,
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।

मुझे भी कोई सम्मान मिलेगा, वह भी एक महान विचारक और तपस्वी के संगठन के द्वारा? मैंने कभी इसकी कल्पना नहीं की थी। मैं एक मुँह फट संत और आचार्य हूं जो सत्य के साथ खड़ा रहता हूं, सच को साथ रखता हूं। सत्य और सच के सहचर को अपने घर में भी विद्रोही मान लिया जाता है, हानिकारक मान लिया जाता है, सम्मान से परे समझा जाता है, घृणा का पात्र समझा जाता है और उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल कर बाहर कर दिया जाता है, फेक दिया जाता है।

मैं जीवन में कोई एक मित्र नहीं बना सका पर रोज दुश्मनों की फौज खड़ा करता रहा। जिस तरह से कोई ज्वालामुखी की ढेर पर राख हो जाता है उसी प्रकार मैं भी दुश्मनों और विधर्मियों की ज्वालामुखी पर बैठा हुआ हूं, पर मैं राख नहीं बना, विध्वंस नहीं हुआ, मैं जीवंत हूं, सक्रिय हूं, सत्य और सच के साथ गतिशील हूं, राष्ट और सनातन की रक्षा के लिए बलिदानी मार्ग पर चल रहा हूं।

मुझे अरविन्दो सम्मान देने वाली संस्था का नाम है इंटरनल हिन्दू फाउंडेशन। यह संस्था महान महर्षि और विचारक गोविन्दाचार्य के मार्गदर्शन में चलती हैं। गोविन्दाचार्य नेपथ्य के रणनीतिकार और शख्सियत हैं। गोविन्दाचार्य दो की संख्या से उठा कर भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने की पृष्ठभूमि रखने के शिल्पी है, जादूगर है और तपस्वी हैं। मैं गोविन्दाचार्य से युवावस्था से ही परिचित हूं। जब हमलोग गोविन्दाचार्य जी के पॉकेट से रखे पैसे निकाल लेते थे, गोविन्दाचार्य कहते कि सर वापस भी दिल्ली जाना है, रांची जाना है, कलकता जाना है, वारणासी, भोपाल, कानपुर जाना है, कैसे जांउगा, फिर हमलोग उनके पैसे उनकी ही जेब में डाल दिया करते थे, उनके चेहरे पर खुशी और मुस्कान तथा हंसी की खूशबू और चमक आज तक यादों में उपस्थित है। गोविन्दाचार्य आज भी अपने पास चॉकलेट रखना नहीं भूलते हैं। मूलाकात के दौरान परीक्षण के लिए गोविन्दचार्य से पूछ ही लेते हैं कि आपकी चॉकलेट कहा है? इस पर गोविन्दचार्य कहते हैं कि है न, ये लीजिये सर।

इंटरनल हिन्दू फांउडेशन और संस्थान को मेरा नाम किसने प्रस्तावित किया, किसने समर्थन किया, किसकी दिमाग की उपज थी? मैं यह नहीं जानता? लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि मेरे नाम को प्रस्तावित करने वाला जरूर कोई महान और वीर आत्मा ही होगा, वह भी किसी न किसी प्रकार सत्य और सच के साथ खड़ा रहने वाला महान महापुरूष ही होगा। क्योंकि सुविधाभोगी और हमेशा मीठे बोलने वाले लोग मेरे जैसे सत्य और सच के साथ खडा होने वाले का समर्थन कर ही नहीं सकते हैं, ऐसी मानसिकता और प्रबृति के लोग तो सत्य व सच के साथ खड़ा रहने वालों को हिंसक और नकारात्मक बताकर छबि विध्वंस का काम करते हैं, संभावनाओं व सम्मान का दाहसंस्कार करते हैं।

मैंने जानकारी देने वाले एस के महापात्रा और जया कापले से प्रश्न पूछा कि मुझे किस योग्यता और उपलब्धि के लिए अरविन्द सम्मान दिया जा रहा है? उत्तर मिला कि सनातन, संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान की वीरता की कसौटी पर यह सम्मान आपको दिया जा रहा है। सम्मान देने के लिए भव्य कार्यक्रम भी होगा और यह कार्यक्रम महान संत वाल्मीकी जयंती पर रखा जायेगा।

मैं एक ब्रम्हचारी हूँ, मैं एक सन्याषी हूँ, मैं एक आचार्य हूँ। मोहमाया, लालच और भौतिक सुविधाओं से परे हूं। सम्मान की कोई इच्छा भी नहीं होती। मैं तो निस्वार्थ भाव से सत्य और सच के साथ खड़ा रहता है, सक्रिय रहता है, अभिमानी रहता हूं। मैं सम्मान मिलने से हर्षित भी नहीं होता हूं, न मिलने से चिंतित भी नहीं होता।

मेरे इस कथन और सम्मान शास्त्र पर आप भी व्याख्यापूर्ण टिप्पणी कर सकते हैं। मैं इस सम्मान का पात्र हूं या नहीं? इस पर भी आप अपनी राय दे सकते हैं।

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