साम्प्रदायिक सद्भाव लाने के लिए शिक्षा को चरित्र निर्माण से जोड़ना होगा!



--प्रमोद दुबे,
कोलकाता-प• बंगाल,
इंडिया इनसाइड न्यूज।

... और उस मानसिकता को क्या कहेंगे, जो शिक्षित होकर भी बर्बरतापूर्ण कुकृत्य करती है। साम्राज्यवादी सोच से उर्वर है, जो पशुवत हैं, जो सिर्फ अपना ही नहीं दूसरे की अधिकार सीमा में अतिक्रमण कर उनका भी हिस्सा खा जाते हैं। स्वामी विवेकानंद ने एक बार अपने गुरु से अपनी सांसारिक विद्या के विस्मरण की बात कही थी, क्योंकि यह आत्मिक उन्नति में बाधक है। छल- प्रपंच रचती है! धर्म का खूंटा और उसमें बाध दिया जाना, या स्वयं ही बिना किसी बन्धन के उसमें चिपका रहना रूढ़िवादिता है। धर्म की परिभाषा चाहे जो हो, पर अध्यात्म तो भीतर का विज्ञान है। अंतर में हृदय का अभास सदचिंतन और सद्व्यवहार की प्रेरणा है। वहां तक पहुंचना ही भक्ति है, और वही साधुत्व की पहचान है, क्योंकि उस स्थिति में व्यक्ति किसी के साथ छल नहीं कर सकता है।

हम शासन-प्रशासन, राजनीति, समाज, विज्ञान, गणित, साहित्य, मीडिया के सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं या आसीन होने की प्रक्रिया में संघर्ष कर रहे हैं। हम साधना के बगैर, सम्मान चाहते हैं और जहां मिले तब तो ठीक ही है, पर जहां न मिले उसकी आलोचना शुरू कर देते हैं। हम अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों और उसमें प्रवेश की कोशिश नहीं करते और न कोई गुरु आपको वहां तक प्रवेश कराने के निमित्त कठिन साधना को प्रेरित करता है! क्योंकि उनकी दुकानदारी खत्म हो जाएगी। ज्यादातर तो सिर्फ तिजोरी भरने के लिए कथा- प्रवचन, कान फूंकने की दुकान चला रहे हैं! अध्यात्म की परिभाषा तो व्यवहारिक रूप से कोई वास्तविक परमहंस ही कर सकता है, जैसा कि नरेन्द्र दत्त (स्वामी विवेकानंद) के गुरु परमहंस रामकृष्ण देव ने किया।

हमें अध्यात्म का गूढ़ रहस्यों का पता लगाना है और यह तभी संभव होगा, जब हम रूढ़िवादिता को ठोकर मार दें। "सियाराम मय सब जग जानी"! या भी भक्त प्रह्लाद का" "हममें - तुममें, खड्ग - खंभ में, सबमें व्याप्त राम"! ऐसी दृढ़ता हो, तब हम जाति, धर्म की दीवारों को तोड़ने में समर्थ होंगे। हमारी जो विद्या है, वह संसार का व्याकरण बताती है, और संसार के व्याकरण में छल - प्रपंच, मानवीय मूल्यों की अवहेलना, संवेदना की शव यात्रा, यही तो शामिल है।

हम याद करें गौतम बुध श्रावस्ती में थे। वे घने जंगल की तरफ जाना चाहते थे, जहां अंगुलिमाल का शासन था। अंगुलिमाल तो हजारों अंगुलियों की माला पहना था, तब आप सोच सकते हैं कि वे इसके लिए कितने लोगों का जीवन लिया होगा? गौतम बुद्ध जाने लगे, लोगों ने मना किया। गौतम बुद्ध नहीं माने, क्योंकि गौतम बुद्ध को अपनी साधना पर पूरा विश्वास था। रात में चांदनी चमक रही थी। बारह बजे थे। अंगुलिमाल भयंकर रूप से एक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था। अपना खड्ग निकालकर गौतम बुद्ध से कहा ठहर जा! गौतम बुद्ध नहीं रुके, तीसरी बार उसने कहा ठहर जा? गौतम बुद्ध खड़े हो गए, और बोले मैं तो ठहर गया, तुम कब ठहरेगा? यह कोई साधारण बात नहीं थी। अंगुलिमाल के हृदय तीर की तरह से भेद गई। अंगुलिमाल बोला मैं तुझे मारना चाहता हूं। गौतम बुद्ध ने कहा कि ठीक है, मैं मरने के लिए ही आया हूं, लेकिन मेरी एक इच्छा पूरी कर दो। अंगुलिमाल बोला क्या है? गौतम ने कहा इस वृक्ष से एक पत्ता तोड़ दो! अंगुलिमाल पत्ता तोड़ दिया। गौतम बुद्ध ने कहा कि इसे जहां से तोड़ा था, वहीं जोड़ दो! अंगुलिमाल बोला कैसा मूर्ख आदमी है? यह कैसे जुड़ सकता है? गौतम बुद्ध ने कहा जब तुम जोड़ नहीं सकते हो तो तुम्हें तोड़ने का क्या अधिकार है? महात्मा बुद्ध के इसी वाक्य के प्रभाव से भयंकर डकैत, हत्यारा अंगुलिमाल उनका शिष्य बन गया।

हम यदि समाज, परिवार, देश में शांति चाहते हैं, तो धार्मिक कट्टरता से ऊपर उठना होगा। कुछ लोग बौद्ध बनकर दूसरे धर्मों को गालियां देते हैं। वे अंगुलिमाल ही बनें रहें। गौतम बुद्ध की शिक्षा का उनपर कोई प्रभाव नहीं है। आज जिस तरह से कावड़ियों पर हमला हो रहा है, मुसलमानों पर हमला हो रहा है, चर्च जलाए जा रहे हैं, मंदिर तोड़े जा रहे हैं, यह स्थिति बड़ी भयानक और तभी रुकेगी जब हम धर्म के मूल तत्व को समझ सकेंगे। धर्म का मूल तत्व यही है कि हम सब भारतवासी एक हैं। एकता, अखंडता व भाईचारा के लिए सरकार, सभी धर्मों, समाज और हर व्यक्ति को प्रयास करना होगा। सिर्फ एक व्यक्ति एक धर्म के प्रयास से कुछ भी संभव नहीं होने वाला है।

https://www.indiainside.org/post.php?id=9400