मध्य प्रदेश: बांध बनने से डूबी जमीन, अब पड़ने लगे खाने के लाले



--विजया पाठक (एडिटर, जगत विजन),
भोपाल - मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

● विदिशा जिले के बरोदियां और आसपास के गांवों की बदतर स्थिति

● रोजगार न मिलने से पलायन को मजबूर ग्रामीण

● शिवराज के विकास के दावों की पोल खोलती गांवों की तस्‍वीर

राजधानी भोपाल से सटे विदिशा जिले के बंजारा समुदाय बाहुल्‍य चार गांवों की दयनीय स्थिति मध्‍यप्रदेश की दूसरी ही तस्‍वीर बयां कर रही है। प्रदेश की वर्तमान सरकार भले ही राज्‍य के विकास और बदलती तस्‍वीर के गुणगान कर रही हो लेकिन इन गांवों को देखकर लगता है कि विकास के छूटे आंकड़ों से प्रदेश को महिमामंडित किया जा रहा है। गौरतलब है कि विदिशा जिले में करीब 10 वर्ष पहले संजय सागर बांध का निर्माण किया गया था। यह बांध विदिशा जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर के शमशाबाद विकासखंड अंतर्गत आने वाला ग्राम पंचायत बरोदिया और चौड़ियाई, अलनिया, तलैया और इमलापुरा के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। बांध बनने से खेती का अधिकतर हिस्सा डूब में आने के कारण मुआवजा भी नहीं मिल सका, क्योंकि उस जमीन का इनके पास पट्टा भी नहीं था। इन गांवों के रहवासी अब नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। ग्राम पंचायत बरोदिया के ये गांव और 400 परिवार आज भी संजय सागर बांध के डूब क्षेत्र में बसे हुए हैं। आज भी इन गांवों में बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। जगत विजन की टीम ने जब इन गांवों की स्थिति को देखा तो हकीकत जानकर बड़ी हैरानी हुई। अधिकतर गांवों के घरों में ताले पड़े मिले और जिन घरों में ताले नहीं थे उन घरों में केवल बुजुर्ग ही थे। हमने जब इन लोगों से बात की तो इनका कहना था कि शासन-प्रशासन स्‍तर पर हमारे लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है। रोजगार से लेकर आजीवि‍का के लिए दर-दर भटकने को मजबूर होना पड़ रहा है। वहीं हमारे बच्‍चे रोजगार के लिए देश के अन्‍य राज्‍यों में जाने को मजबूर हैं।

प्रदेश की मौजूदा शिवराज सरकार आज भले ही सार्वजनिक मंचों से थक नहीं रहे हैं कि मध्‍यप्रदेश आज विकास के कई कीर्तिमान रच रहा है। लोगों की प्रति व्‍यक्ति आय बढ़ रही है। निवेश आने से लोगों को रोजगार मिल रहे हैं। लेकिन इन इन कुछ गांवों की तस्‍वीर देख कर तो यही लगता है कि सरकार के सारे दावे और वादे सभी खोखले हैं। सिर्फ मंचों से भाषण देने से और झूठे दावे करने से लोगों की समस्‍याएं हल नहीं होगी। सरकार को सबसे पहले लोगों की समस्‍याओं पर ध्‍यान देना होगा। उन्‍हें रोजगार के अवसर देने होंगे। बरोदिया जैसे केवल गांव नहीं है। प्रदेश में और भी कई ऐसे गांव हैं जहां लोगों को रोजगार न होने की स्थिति में पलायन करना पड़ रहा है। बताया जा रहा है कि लोगों की कल्‍याणकारी योजनाओं के संचालन के लिए सरकार प्रतिमाह हजारों करोड़ रूपये कर्ज पर ले रही है। अब सवाल उठता है कि जब यह कर्ज लोगों के कल्‍याण में ही काम नहीं आ रहा है तो ऐसे कर्ज लेने की क्‍या जरूरत है?

• प्रभारी मंत्री विश्‍वास सारंग को नहीं सुध लेने की फुरसत

विदिशा जिले के प्रभारी मंत्री शिवराज सरकार में कैबिनेट मंत्री विश्‍वास सारंग हैं। विश्‍वास सारंग कहने को तो वह इस जिले के मंत्री हैं लेकिन उन्‍हें अपने जिले में जाने की फुरसत ही नहीं है। कभी कभार जाते भी हैं तो केवल किसी कार्यक्रम में मुख्‍य अतिथि के रूप में या किसी कार्यक्रम का फीता काटने जाते हैं। जबकि यह जिला उनके निवास से कुछ ही दूरी पर है। सारंग को पता ही नहीं है कि उनके जिले में क्‍या हो रहा है? उनके प्रभार के जिले के लोगों की क्‍या समस्‍यायें हैं? रोजगार के क्‍या अवसर हैं? और जो हैं उनकी क्‍या स्थिति है? ऐसे किसी भी मामले से मंत्री जी को कुछ लेना देना नहीं है। जिले के लोगों की भी यही शिकायत हैं। कुछ ऐसी ही शिकायत इन गांव वालों के लोगों की भी हैं। लोगों का कहना है कि हमने कई बार प्रभारी मंत्री से इस संबंध में बात करने की कोशिश की है। लेकिन आज तक हमारी परेशानी पर कोई काम ही नहीं किया है।

• बंजारा बाहुल्‍य हैं गांव

यह सभी गांव बंजारा समुदाय बाहुल्‍य गांव हैं। इन गांवों के जनप्रतिनिधि भी ज्‍यादातर बंजारा हैं। ये लोग खेती की जमीन बांध के निर्माण में डूब जाने से इनका रोजगार भी छिन गया है। अब केवल मेहनत मजदूरी से ही अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। बरोदिया पंचायत की सरपंच गुड्डी बाई भी बंजारा हैं। वे बताती हैं कि उनकी पंचायत में समाज के डेढ़ सौ में से करीब सौ परिवार के युवा रोजगार के लिए पलायन कर गए हैं। इनका मानना है कि जब लोगों के पास रोजगार ही नहीं होगा तो वह कहीं न कहीं तो रोजगार की तलाश में जायेंगे।

• रोजगार के लिए छोड़ा घर-परिवार

केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक गांवों में ग्रामीणों को साल भर रोजगार उपलब्ध कराने के दावे करती हैं, लेकिन इसकी हकीकत कुछ अलग है। इन चार गांवों के 150 में से लगभग 100 घरों में ताले लटके हुए हैं, क्योंकि इन घरों के लोग रोजगार के लिए आंध्रप्रदेश और राजस्थान के शहरों में चले गए हैं। जिन घरों में ताले नहीं लगे वहां भी सिर्फ बुजुर्ग ही घरों की रखवाली करते मिलते हैं। गांव चौड़ियाई में बंजारा समाज के 50 घर हैं, लेकिन 25 से अधिक घरों में कोई नहीं रहता। यह स्थिति अन्य तीन गांवों की भी है। बरोदिया गांव के अजय सिंह का कहना है कि जिले में मजदूरी मिलती नहीं है। इसलिए वे दूसरे राज्यों में जाकर फुटपाथ पर सामान बेचने का काम करते हैं। कुछ लोग भवन निर्माण में मजदूरी भी करते हैं। कुछ लोगों ने पथ-विक्रेता योजना में आवेदन जमा किये थे लेकिन बैंक दस हजार रुपये का कर्ज देने को तैयार नहीं हैं। ऐसी स्थिति में पलायन करना ही एकमात्र रास्‍ता है।

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