--हरेंद्र शुक्ला,
वाराणसी - उत्तर प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
■ तीर्थ स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना ठीक नहीं - महंत प्रो विश्वंभरनाथ मिश्र
■ अयोध्या पर्व की ओर से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में "भक्ति आंदोलन और संत परंपरा" विषयक परिचर्चा में शामिल हुए देशभर से मानस मर्मज्ञ
महंत नृत्यगोपाल दास के संरक्षणकत्व और अयोध्या के सांसद लल्लू सिंह के संयोजकत्व में अयोध्या पर्व के पांचवें संस्करण के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नयी दिल्ली में "भक्ति आंदोलन और संत परंपरा" विषयक परिचर्चा का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर संकटमोचन मंदिर (वाराणसी) के महंत एवं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बीएचयू इलेक्ट्रॉनिक विभाग के निवर्तमान अध्यक्ष प्रो विश्वंभरनाथ मिश्र ने कहा कि भक्ति आंदोलन के वास्तविक संवाहक गोस्वामी तुलसीदास जी थे। श्रीरामचरितमानस की रचना कर उन्होंने जन जन तक प्रभु श्रीराम को पहुंचाने का कार्य किया। गोस्वामी तुलसीदास जी ने किष्किन्धाकाण्ड से आगे की कांड को काशी में पूर्ण करने के बाद श्रीरामचरितमानस का प्रकाशन उन्होंने अयोध्या से किया। तुलसीदास काशी नहीं आये होते तो रामचरित मानस भी पूर्ण नहीं होता, अवध वहीं होगा जहां राम होंगे। श्रीराम के बिना अवध की परिकल्पना बेमानी होगी। स्वयं प्रभु श्रीराम अपनी जन्मभूमि के संदर्भ में कहते हैं "जन्म भूमि मम पूरी सुहावन उतर दिशी बह सरजू पावन.... गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस जैसी कालजयी रचना कर राम को जन जन के मन और मस्तिष्क में बैठा दिया है।
अयोध्या मर्यादित जीवन शैली है। श्रीराम जी को भी उनकी जन्म भूमि अयोध्या बहुत प्रिय था लेकिन कालान्तर में अब तीर्थ स्थानों को पर्यटन के रूप में प्रचारित किया जा रहा है जो गलत है। हम लोग चार धाम यात्रा करते हैं। आदिशंकराचार्य जी ने उत्तर में ज्योतिष पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी पीठ,पुरब में जगन्नाथ पुरी पीठ और पश्चिम में द्वारिका पीठ की स्थापना की थी। फिर गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी मानस के माध्यम से श्रीराम भक्तों को चार धाम के रूप में काशी, अयोध्या, चित्रकूट और प्रयागराज स्थापित किया। गोस्वामी जी कहते हैं "तहां अवध जहां राम निवासू, तहां दिवस वहां भानु प्रकाशु .... जहां सूर्य होगा वहां दिन होगा और जहां राम होंगे वहीं अयोध्या होगा। अयोध्या को म्युजियम के बजाय प्रभु श्रीराम की संवेदनशीलता, सहिष्णुता, उदारता,भायप भक्ति, सामाजिक समरसता आदि को प्रचारित करने से ही सामाजिक, आर्थिक विषमता दूर होगी। पूरे ब्रह्मांड में ताकतवर होते हुए भी श्रीराम सौम्यता के प्रतिमूर्ति हैं। उनको कभी आक्रोश में नहीं देखा गया।
प्रो मिश्र ने यह भी कहा कि वर्तमान दौर में यह देखा जा रहा है कि प्रभु श्रीरामजी का चित्र धनुष-बाण लिए क्रोध की मुद्रा को प्रसारित किया जा रहा है जो बिल्कुल ग़लत है। श्रीराम कभी भी क्रोध की मुद्रा में नहीं दिखते है श्रीराम सौम्यता की प्रतिमूर्ति हैं श्रीराम भाव की मुद्रा लिए हुए हैं श्रीराम का स्वरूप ही पूरी सृष्टि का सर्वोत्तम सुन्दर स्वरूप है।
समारोह का संचालन देवेन्द्र राय ने किया। इस अवसर पर स्वामी जितेन्द्रानंद, प्रो चंदन, उमेश सिंह, राकेश सिंह, विकास सिंह, मानस चिंतक अशोक पाण्डेय (काशी), शूलपाणि सिंह, विनोद सिंह, डा वशिष्ठ नारायण सिंह, ज्ञानेन्द्र श्रीवास्तव सहित विभिन्न राज्यों के मानस मर्मज्ञ मौजूद रहे।
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