--विजया पाठक,
सम्पादक- जगत विज़न पत्रिका,
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
■ सोची-समझी साजिश से विपक्ष को खत्म करना चाहती है मोदी सरकार
■ लोकतंत्र के लिए खतरनाक है निचले स्तर की राजनीति
■ सोनिया गांधी, राहुल गांधी को इंदिरा गांधी की तरह जुझारूपन दिखाने की आवश्यकता है
मोदी सरकार में राजनीति अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। बदजुबानी और आपसी वैमनस्य की शुरुआत तो वैसे 2014 से ही शुरू हो गई थी, जब केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी। यही कारण है कि आज अपने राजनैतिक विरोधियों को कुचलना और इस वैमनस्यता वाली राजनैतिक सोच ने लोकतंत्र को अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंचा दिया। कहा जा सकता है कि पिछले आठ साल में एक सोची समझी साजिश के तहत मोदी सरकार ने विपक्ष को खत्म करने की साजिश रची है। इस साजिश में विपक्ष के नेताओं पर कानूनी तरीके से परेशान करना, बदले की भावना से नेताओं के साथ व्यवहार करना, कई विपक्षी कददावर नेताओं के विषय में अपशब्दों का उपयोग करना (जैसे राहुल गांधी को ''पप्पू'' कहना) और विपक्ष के नेताओं को सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं की कार्रवाई करवाने की धमकी देकर अपने पाले में करने की साजिश रचना प्रमुख हैं। मोदी सरकार के यह ऐसे षड़यंत्र हैं जिनके डर से कई नेता या तो बीजेपी में शामिल हो गये या अपने आप को चुप करके शांत बैठ गये। इसका परिणाम यह हुआ कि आज विपक्ष कमजोर हो गया और मोदी सरकार अपनी हिटलरशाही पर उतर आयी। मोदी सरकार का यह रवैया देश के लिए और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में विपक्ष कमजोर हुआ है तब-तब देश खतरे में पड़ा है।
ताजा मामला देश की सबसे ताकतवर विपक्ष कांग्रेस के नेताओं को लेकर है। नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी ने समन भेजा है। जबकि मनी लॉन्ड्रिंग का कोई सबूत नही है। इक्विटी में केवल कंवर्जन या ऋण दिया गया है। इस प्रकार से देखा जाए तो वर्तमान समय में ईडी और अन्य एजेंसियों की छापेमार कारवाई चल रही हैं। यह केवल उन लोगों पर ही कार्रवाई हो रही है जो या तो विपक्ष में हैं या जो मोदी सरकार के विरोधी हैं। यह केवल बदले की भावना से की जाने वाली कार्रवाईयां हैं।
● इतिहास के नेताओं से सीख लें मोदी जी
एक समय था जब राजनीतिक दलों में आपसी मतभेद होते थे पर मनभेद नहीं थे। जवाहरलाल नेहरू और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के बीच भी तल्खी खूब थी लेकिन नेहरू जी ने अपने शासन में उन्हें कश्मीर के मामले में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी। वहीं नेहरू जी और भीमराव अंबेडकर जी के बीच कुछ ठीक नहीं था लेकिन नेहरू ने उन्हें कानून मंत्री बनाया। नेहरू ने विपक्षी दल में होने के बावजूद अटल जी को हर जगह सराहा। देश के महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर विदेश में भारत का पक्ष रखने भेजा करते थे। ऐसा ही सम्मान स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी इंदिरा गांधी की तरफ दिखाया करते थे। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में अटलजी ने इंदिरा गांधी को दुर्गा की उपमा दी थी। अटल जी ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा भी मर्यादा के साथ उठाया था। लोहिया जी और जवाहरलाल नेहरू की आपस में कभी नहीं पटती थी पर जवाहरलाल नेहरू और लोहिया जी के बीच पूरा आदर भाव था। नेहरू जी की आखरी दर्शन यात्रा में किसी के जूते पहन कर ऊपर चढ़ जाने से उस व्यक्ति को लोहिया जी ने सरेआम लताड़ा यही आपसी आदरभाव जेपी और इंदिरा गांधी के बीच था।
● देहाती औरत, पप्पू से फैंकू तक और कितनी गिरेगी ज़ुबान
राजनीतिक बदजुबानी का नया चलन 2013 से चलना शुरू हुआ। उस समय भाजपा में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया था। मोदी ने अपनी टीम में ओछे राजनीतिज्ञों के साथ-साथ कई नौसिखियों को रखा। कोई टेलीविजन परदे से था तो कोई चार्टेड अकाउंटेंट था। या कोई पर्दे के पीछे खेलते बाबाजी इन सब नये-नवेले राजनीति में आये लोगों लॉयल्टी भी मोदी तक सीमित थी। फिर जो राजनीतिक बदजुबानी का ऐसा चलन चला कि मानो कान से खून निकल जाए। किसी ने तबके प्रधानमंत्री को दब्बू और देहाती कहा तो किसी ने राजनीतिक इमेज हत्या के लिए राहुल गांधी को पप्पू बना दिया और इसके जवाब में दूसरी टीम ने किसी को फेंकू कहा तो, किसी को तड़ीपार।
● बदजुबानी के बाद केंद्रीय एजेंसियों द्वारा कुचलने की शुरुआत
बदजुबानी के बाद इन राजनैतिक दलों में वैमन्यता इतनी ज्यादा बढ़ गई कि अब कुचलने के लिए ईडी, सीबीआई, एनसीबी और अन्य एजेंसी के माध्यम से अपने राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने की कोशिश की जाने लगी। राज्य के मंत्री को उठाना हो या चिदंबरम पिता-पुत्र के खिलाफ मैन हैंडलिंग से अपने विरोधियों को कुचलने की नई परिपाठी चालू हो गई है। ऐसी वैमन्यता वाली सोच निश्चित तौर पर लोकतंत्र का सर्वनाश कर देगी। एक बात जरूर सत्ता दल को याद रखना चाहिए की सत्ता स्थाई नहीं होती ना किसी पार्टी विशेष मुक्त भारत कभी हो सकता है। वैसे भी प्रकृति का नियम से बदलाव होते ही हैं।
● सोनिया गांधी-राहुल गांधी देश के सामने जुझारूपन दिखाए
जुझारूपन को लेकर एक किस्सा याद आया जब इंदिरा गांधी को जनता सरकार ने गिरफ्तार किया था। इंदिरा गांधी ने कहा था कि मैं तब तक अपने घर से बाहर नहीं निकलूंगी जब तक मेरे हाथों में हथकड़ी नहीं लगाओंगे। जनता पार्टी सरकार के अंत की शुरुआत उसी दिन हो गई थी। डेढ़-दो साल के अंदर जनता पार्टी सरकार का अस्तित्व मिट गया। राहुल गांधी को अपनी दादी को याद करना चाहिए। वक्त ने आपको उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। आप अगर सच्चे हैं तो कोई जांच एजेंसियां आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती हैं। इंदिरा गांधी जैसी जुझारूपन की राजनीति से ही आप अपना आगे का भविष्य बना सकते हैं।
अंत में यही कहती हूं कि लोकतंत्र में पक्ष विपक्ष का होना बहुत जरूरी होता हैं और साम-दाम, दण्ड-भेद की राजनीति से विपक्ष का गला घोंटा गया तो आने वाले समय में भारतीय राजनीति विपक्षहीन होकर तानासाही के हाथों में चली जाएगी। विपक्ष में बैठे लोग आवाज उठा रहे हैं पर उन्हें किसी न किसी मामले में कोई न कोई जांच एजेंसी का सामना करना पड़ रहा है। इसी दबाव के चलते कांग्रेस का युवा चेहरा हार्दिक पटेल ने सत्ताधारी दल के सामने घुटने टेक दिए और सारी जांच एजेंसियो से छुटकारा पा लिया। कभी भाजपा की रडार में हार्दिक देशद्रोह के आरोपी थे। वहीं केजरीवाल ने भी नई दिल्ली के मंत्री सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी के बाद कहा था कि मोदी जी अब जल्दी ही उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर भी फर्जी केस की तैयारी कर रहे हैं। शाहरूख खान के बेटे आर्यन खान के साथ भी बदले की भावना से फंसाया गया था। आज वह बरी हो गया है। इसमें शाहरूख खान की जो बदनामी हुई है उसका क्या?
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