--अभिजीत पाण्डेय,
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
भारत की जमीन से जुड़े सभी पंथों में होली किसी न किसी रूप में मनाई जाती है। इस प्रमुख त्योहार होली को गुरु गोविंद सिंह जी ने नए ढंग से मनाने की परंपरा आरंभ की थी। उन्होंने इस त्योहार को परमात्मा के प्रेम रंग में सराबोर कर अधिक आनंददायी स्वरूप दिया।
श्री गुरुग्रंथ साहब में होली का उल्लेख करते हुए प्रभु के संग रंग खेलने की कल्पना की गई है। गुरुवाणी के अनुसार, परमात्मा के अनंत गुणों का गायन करते हुए प्रफुल्लता उत्पन्न होती है और मन महा आनंद से भर उठता है। जब मनुष्य होली को संतों की सेवा करते हुए मनाता है तो लाल रंग अधिक गहरा हो जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने होली को आध्यात्मिकता के रंग में रंग दिया। उन्होंने इसे होला महल्ला का नाम दिया।
दशमेश गुरु ने होला-मोहल्ला के माध्यम से समाज के दुर्बल और शोषित वर्ग की प्रगति चाहते रहे। यही वजह है कि सिखों के दसवें गुरु की जन्मस्थली पटना साहिब में धूमधाम से होला-मोहल्ला हर वर्ष मनाया जाता है।
सिखों के पवित्र धर्मस्थान श्री आनंदपुर साहिब में होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते हैं। यहां होली से दो दिन पहले पर्व प्रारंभ हो जाता है। होली पौरुष के प्रतीक पर्व के रूप में मनाई जाती है। यही कारण है कि दशमेश गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह ने होली के लिए पुलिंग शब्द होला मोहल्ला का प्रयोग किया। गुरु जी इसके माध्यम से समाज के दुर्बल और शोषित वर्ग की प्रगति चाहते थे।
होला-मोहल्ला पर्व के संबंध में तख्त श्री हरिमंदिर के वरीय मीत ग्रंथी भाई बलदेव सिंह ने बताया कि वर्ष 1701 को आनंदपुर साहेब में दशमेश गुरु गोविंद सिंह ने आदेश दिया कि अब से होली नहीं होला मनाया जाएगा। इसे रंग-अबीर की जगह वीर सैनिकों का शौर्य का त्योहार बना दिया। उन्होंने बताया कि होला शब्द की उत्पति हल्ला शब्द से हुई है जिसका मतलब आक्रमण करना होता है। वहीं मोहल्ला शब्द का अर्थ संगठित व एकत्रित होना है।
होली को ‘होला मोहल्ला’ कहा जाता है, पंजाब में सिखों के पवित्र धर्मस्थल श्री आनंदपुर साहिब में ‘होला मोहल्ला’ मेले का आयोजन किया जाता है। होला मोहल्ला पर्व की शुरुआत से पहले होली के दिन एक-दूसरे पर फूल और फूल से बने रंग आदि डालने की परंपरा थी लेकिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने इसे शौर्य के साथ जोड़ते हुए सिख कौम को सैन्य प्रशिक्षण करने का आदेश दिया। उन्होंने होला मोहल्ला की शुरुआत करते हुए सिख समुदाय को दो दलों में बांटकर एक-दूसरे के साथ छद्म युद्ध करने की सीख दी। जिसमें विशेष रूप से उनकी लाडली फौज निहंगों को शामिल किया गया जो कि पैदल और घुड़सवारी करते हुए शस्त्रों को चलाने का अभ्यास करते थे। इस तरह तब से लेकर आज तक होला मोहल्ला के पावन पर्व पर शूरता और वीरता का रंग देखने को मिलता है।
होला शब्द होली की सकारात्मकता का प्रतीक था और महल्ला का अर्थ उसे प्राप्त करने का पराक्रम। रंगों के त्योहार के आनंद को मुखर करने के लिए गुरु जी ने इसमें व्याप्त हो गई कई बुराइयों जैसे कीचड़ फेंकने, पानी डालने आदि का निषेध किया। होली के त्योहार का आयोजन इस तरह से किया जाने लगा कि पारस्परिक बंधुत्व और प्रेम की भावना दृढ़ हो।
होला महल्ला का आरंभ प्रात: विशेष दीवान में गुरुवाणी के गायन से होता। इसके पश्चात कवि दरबार होता, जिसमें चुने हुए कवि अपनी कविताएं सुनाते। दोपहर बाद शारीरिक अभ्यास, खेल और पराक्रम के आयोजन होते। गुलाब के फूलों, गुलाब से बने रंगों की होली खेली जाती। दो दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के दूसरे दिन छद्म युद्ध आयोजित किया जाता, जिसमें सिखों को दो दलों में बांट दिया जाता था। इसमें बिना किसी को शारीरिक क्षति पहुंचाए युद्ध के जौहर दिखाए जाते। इसके लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने खास तौर पर आनंदपुर साहिब में किला बनवाया था। किले में बैठकर वे स्वयं सिख दलों के युद्ध को देखते थे। योद्धाओं को उचित पुरस्कार दिए जाते थे। अंत में कड़ा प्रसाद वितरित होता। इस तरह होली का यह पुरातन त्योहार स्वस्थ प्रेरणाओं का उत्सव बन गया था।
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