चार साल से संचालित हो रहा बगैर अनुभवी कर्मचारी अधिकारियों के मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड



--विजया पाठक (एडिटर- जगत विजन),
भोपाल-मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी मुख्यमंत्री जी कि उन्हें पर्यटन बोर्ड की स्थापना का निर्णय लेना पड़ा

■ जनता के टैक्स के लाखों करोड़ों रुपए को प्रचार प्रसार और प्रमोशन के नाम पर खर्च कर रहे अनुभवहीन कर्मचारी

मध्य प्रदेश के लिए कही जाने वाली कहावत एमपी अजब है सबसे गजब है..., आपने कई बार सुनी होगी। इस कहावत का अक्सर उपयोग तभी और अधिक किया जाता है जब प्रदेश में अजीब-गरीब निर्णय लिये जाए। ऐसा ही निर्णय शिवराज सरकार ने वर्ष 2017 में लिया था जब प्रदेश में मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड की स्थापना की गई। खास बात यह है कि बगैर नीति के शुरू किया गया पर्यटन बोर्ड आज जनता की कमाई के करोड़ों रुपये ऐसे ही उड़ा रहा है। ऐसे में अपनी स्थापना को लेकर एक बार फिर मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है।

▪︎ वरिष्ठ आईएएस अफसर का चालू दिमाग है इसके पीछे

सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड की स्थापना के पीछे वरिष्ठ आईएएस अफसर हरिरंजन राव का मास्टरमाइंड दिमाग है। उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से हरि झंडी लेकर प्रदेश में पहली बार पर्यटन बोर्ड की स्थापना की स्वीकृति ली। बोर्ड बनाने की स्वीकृति के लिए उनके इशारे पर ही फरवरी 2017 में कैबिनेट बैठक पचमढ़ी में रखी गई और बोर्ड बनाने की सहमति उसी बैठक में हुई।

▪︎ काम कुछ नहीं फूंक दिये करोड़ों

देखा जाए तो आज मध्य प्रदेश का पूरे देश सहित विदेशों में जो भी नाम है उसका श्रेय मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के अधिकारियों को जाता है। निगम के अंर्तगत ही होटल संचालन से लेकर एडवेंचर स्पोर्ट्स एक्टिविटी, सहित प्रदेश के पर्यटन स्थलों की ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार का काम सफलता पूर्वक किया जाता रहा है। लेकिन वरिष्ठ आईएएस अफसर को यह बात रास नहीं आई और उन्होंने बोर्ड का गठन करने का गणित निकाला। बोर्ड के गठन के बाद पर्यटन निगम के अधिकारियों के पास अब सिर्फ होटल संचालन और बोट क्लब के संचालन की जिम्मेदारी मात्र रह गई है।

▪︎ अनुभवहीन है बोर्ड के अधिकारी

हरिरंजन राव के समय जैसे ही पर्यटन बोर्ड की स्थापना की गई। आनन-फानन में बोर्ड में अधिकारियों का कोरम पूरा करने के लिए इधर उधर से अनुभवहीन अधिकारियों को यहां प्रतिनियुक्ति पर रख लिया गया। इसमें नाम मात्र अधिकारियों को छोड़ दे तो इसके अलावा कोई भी ऐसा अधिकारी नहीं है जिसे पर्यटन के क्षेत्र में काम करने का पूर्व में कोई अनुभव रहा हो। खास बात यह है कि इसमें कॉलेज के प्रोफेसर से लेकर महिला बाल विकास में काम करने वाले अधिकारी, राज्य शिक्षा मिशन से जुड़े लोग, आयुष विभाग, इंदिरा, पुलिस विभाग के अधिकारी, गरीबी हटाओ, पशु चिकित्सा विभाग में कार्य करने वाले अधिकारी मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड जैसे अहम विभाग में काम करने के लिए तैनात किये गए है जो मध्य प्रदेश के प्रचार-प्रसार, संवर्धन, कौशल विकास, साहसिक और जल क्रीड़ा सहित फिल्म टूरिज्म से जुड़े कार्यों के नाम से करोड़ों रुपए का गबन कर रहे है।

▪︎ राज्य को खोखला होने से बचाइए मुख्यमंत्री जी

राज्य की जागरुक नागरिक और पत्रकार होने के नाते मैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से गुजारिश करती हूं कि वो इस दिशा में गंभीरता से विचार करें और यह समझने की कोशिश करें कि क्या सच में राज्य में पर्यटन बोर्ड की उपयोगिता है। बोर्ड के लिए अलग से कार्यालय बनाने के लिए 4 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च करने की उपयोगिता थी। अगर बोर्ड बनाना ही था तो कुछ चुनिंदा और अनुभवी अधिकारियों के साथ बोर्ड का गठन कर उसका कार्यालय पर्यटन निगम के भवन में संचालित किया जाना चाहिए था। इससे हर महीने लाखों करोड़ों रुपये कर्मचारी-अधिकारियों को दी जाने वाली सैलरी और कार्यालय के खर्चे से बचा जा सकता है। मुख्यमंत्री जी चंद अधिकारियों की वजह से राज्य को खोखला होने से बचाना आपका प्रथम दायित्व है।

▪︎ निगम की माली हालत खराब

मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड बनने के पहले मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के पास सारे वित्तीय पॉवर थे, लेकिन अब सारे वित्तीय पॉवर बोर्ड के पास है। जिससे निगम की वित्तीयय स्थिति खराब हो चुकी है। बोर्ड बनने से पहले पर्यटन निगम बहुत ऊंचाई पर था अब बहुत स्थिति खराब है। निगम का सिर्फ होटलो से कमाओं ओर सैलरी बांटो की जिम्मेदारी दी गई है। मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड बनने से मध्यपप्रदेश पर्यटन निगम को बहुत नुकसान हो रह है। केन्द्र सरकार द्वारा दिये जाने वाला अनुदान भी पर्यटन बोर्ड को आता है। मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के मुख्यामंत्री अध्यक्ष है जो प्रमुख सचिव को सारे अधिकार दिये हुये है। इतना ही नहीं पहले निगम द्वारा प्रसार-प्रसार करने के लिये पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन दिये जाते थे। लेकिन बोर्ड बनने के उपरांत प्रचार-प्रसार करने के लिये विज्ञापन भी नही दिये जा रहे है। जबकि केन्द्र सरकार द्वारा प्रचार-प्रसार का पैसा आता है। जिसका कोई हिसाब ही नही है। इसकी जांच होना चाहिए।

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