मुख्यमंत्री बदल देना बीजेपी के शीर्षस्थ नेतृत्‍व की गलत परंपरा



--विजया पाठक (एडिटर- जगत विजन),
भोपाल-मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ जनता के विश्वास को तोड़ रही बीजेपी

■ भय के साये में बीजेपी शासित राज्‍यों के सीएम

■ क्या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी बदले जायेंगे?

सत्‍ता के लालच और बहुमत के गुरूर में बीजेपी हाईकमान लोकतंत्र की मर्यादाओं को तार-तार करने पर उतारू है। एक चुने हुए मुख्‍यमंत्री को बीजेपी हाईकमान बगैर किसी कारण के ऐसे कुर्सी से उतार देती है जैसे वह उसने कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो। हम जानते हैं कि संविधान में इस तरह के फैसले का अधिकार पार्टियों को दिया हुआ है कि वह किसी को भी कभी भी अपने पद से हटा सकती है या बिठा सकती है लेकिन इस तरह की गलत परंपरा से हमाने देश के लोकतंत्र की मर्यादाएं तार-तार हो रही हैं। पिछले कुछ महीनों में ही बीजेपी के देश के अलग-अलग राज्‍यों के चार मुख्‍यमंत्रियों को हटाकर दूसरों को इस पद पर बिठा दिया है। इन फैसलों से दूसरे बीजेपी शासित राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री भय के साये में हैं। उनके कामकाज प्रभावित हो रहे हैं। अपने मामूली फायदे के लिए जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि को एक झटके में हटा देना देश की सबसे बड़ी पार्टी को शोभा नही देता है। निश्चित तौर पर देश की अन्‍य पार्टियां भी देखादेखी में इस तरह की गलत परंपरा का अनुसरण करने से नहीं चूकेंगी। इस तरह के फैसलों से कहीं न कहीं प्रदेश के विकास पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में भाजपा शासित राज्यों में एक बड़ा फेरबदल देखने को मिल रहा है। पिछले कुछ समय से राज्यों से मुख्यमंत्री को हटाकर नए मुख्यमंत्री बैठाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले उत्तराखंड, फिर कर्नाटक और फिर गुजरात में मुख्यमंत्री बदले जाने के बाद अब हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को दिल्ली तलब किया गया है। भाजपा शीर्षस्थ नेताओं की यह कार्यशैली इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की इस तरह की कार्यशैली पर सवालिया निशान भी खड़े होने लगे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब भाजपा को राज्य में चुनाव जीतना होता है तो वो चर्चित नाम को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर खड़ा कर देती है। लेकिन चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री को उसका कार्यकाल पूरा करने से पहले ही हटाकर नये मुख्यमंत्री के चेहरे का दांव खेलती है। लोकतंत्र में यह एक गलत परंपरा की ओर बढ़ता कदम है। जिसका आज नहीं तो कल अन्य राजनीतिक पार्टियां भी अनुसरण करने लगेगी। इस तरह से देश में एक नई परंपरा स्थापित हो जाएगी। इसलिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृहमंत्री अमित शाह को इस परंपरा को यही समाप्त कर देना चाहिए। क्योंकि इस तरह की परंपराओं के कारण कोई भी मुख्यमंत्री पूरी स्वतंत्रता के साथ राज्य के विकास में अपना योगदान नहीं दे पाएगा। वो पूरे समय अपनी कुर्सी बचाने के विषय में ही सोचता रहेगा।

● मध्य प्रदेश में भी लगने लगी अटकलें

एक के बाद एक भाजपा शासित राज्यों के बदलते मुख्यमंत्रियों के चेहरे ने मध्य प्रदेश के सियासी मंच को भी हवा दे दी है। अब लोग यहां तक कहने लगे हैं कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दिल्ली का बुलावा कब आ जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। हमें पता है कि कमलनाथ की सरकार गिर जाने के बाद ही शिवराज सिंह चौहान को मुख्‍यमंत्री बनाया गया था। उन्‍हें मुख्‍यमंत्री बने हुए कुछ ज्‍यादा समय नहीं हुआ है और इसी बीच देश के कोरोना काल का समय भी देखा है। ऐसी स्थिति में बीजेपी का शीर्ष नेतृत्‍व कैसे एक मुख्‍यमंत्री की सीआर देख सकती है। कम से कम किसी मुख्‍यमंत्री को आंकने का, समझने को पांच वर्ष को मिलना चाहिए। हम यह बात इसीलिए कह रहे हैं क्‍योंकि बीजेपी आजकल यही पैमाना अपनाकर मुख्‍यमंत्रियों को बदल रही है। खैर, राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो संभवतः नवंबर 2021 के पहले सप्ताह तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। क्योंकि मध्यप्रदेश में आने वाले समय में विधानसभा चुनाव और उससे पहले उपचुनाव होने हैं। ऐसे में शिवराज सिंह चौहान को हटाकर पार्टी स्तर पर कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है।

● गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने से पार्टी को क्‍या मिला फायदा?

गुजरात में भाजपा ने इस प्रयोग को दोहराया। वर्ष 1998 में हुए आम चुनावों में भाजपा ने बहुमत हासिल कर केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री बनाया परन्तु पार्टी के अंदरूनी कारणों की वजह से उन्हें 2001 में हटाकर नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया। वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार फिर गुजरात में उथल-पुथल हुई और आनंदीबेन को मुख्यमंत्री बनाया गया परन्तु उनके खिलाफ हो रहे असंतोष को देखते हुए विजय रूपाणी को सीएम बनाया गया और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया जिसमें पार्टी ने फिर एक बार बहुमत हासिल किया। हालांकि उन्होंने भी अपना इस्तीफा दे दिया और भूपेंद्र पटेल को नया मुख्यमंत्री बनाया गया है।

● उत्तराखंड में पार्टी ने चार महीने में बदले 03 मुख्यमंत्री

उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहां एक ही पार्टी का बहुमत होते हुए भी चार महीनों में 3 मुख्यमंत्री बदले गए। सबसे पहले त्रिवेंद सिंह रावत सीएम बने परन्तु पार्टी के अंतर्विरोधों के कारण उन्हें हटाकर तीरथ सिंह रावत को लाया गया। वह केवल 115 दिन ही मुख्यमंत्री रह सके और संवैधानिक बाध्यता का बहाना लेकर युवा नेता पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया।

● कर्नाटक में भी बदले गए 03 मुख्यमंत्री

वर्ष 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत मिला और बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बनाए गए। वह अपने पद पर 3 वर्ष 67 दिन तक रहे, इसके बाद डी.वी. सदानंद गौड़ा को लाया गया। वह एक वर्ष से कुछ कम समय के लिए मुख्यमंत्री रहे और उनकी जगह जगदीश शेट्टर को लाया गया। हालांकि तीन बार मुख्यमंत्री बदलने की पार्टी की इस योजना ने काम नहीं किया और पार्टी को अगले विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने। कुछ समय एच. डी. कुमारस्वामी भी सीएम पद पर रहे। वर्ष 2019 में येदियुरप्पा फिर सत्ता में लौटे और दो वर्ष के बाद इसी वर्ष जुलाई में उन्हें हटाकर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री पद पर लाया गया।

● वर्षों पुरानी है बीजेपी की गलत परंपरा

जानकारों की मानें तो भाजपा द्वारा मुख्यमंत्रियों को कार्यकाल पूरा होने के पहले ही बदल दिये जाने की परंपरा भाजपा की आज की नहीं बल्कि वर्षों पुरानी है। कई बार पार्टी को इसका लाभ हुआ और कई बार हानि भी उठानी पड़ी है। वर्ष 1993 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। मदनलाल खुराना दिल्ली के मुख्यमंत्री बने परन्तु जैन हवाला कांड में नाम आने पर पार्टी की छवि बचाने के लिए उन्हें हटाकर साहब सिंह वर्मा को सीएम बनाया गया। किन्हीं कारणों के चलते उन्हें भी हटाकर सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया था।

इस तरह की मुख्‍यमंत्री की उलटफेर से किसी भी प्रदेश का कोई भी मुख्‍यमंत्री भय मुक्‍त होकर काम नही कर पायेगे। वो अपने प्रदेश के प्रति कम और केन्‍द्र में बैठे हुये नेताओं के लिए अधिक जिम्‍मेदार रहेंगे।

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