मध्‍य प्रदेश सरकार ने दिया प्रदेश के आदिवासियों को कभी न भुला पाने वाला दर्द



--विजया पाठक (एडिटर, जगत विजन),
भोपाल-मध्य प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

■ स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजादी दिलाने तक आदिवासियों के योगदान को भूल गई शिवराज सरकार

■ आदिवासियों की दबी आवाज विधानसभा में लेकर पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ

बीते कई दिनों से कांग्रेस नेताओं द्वारा आदिवासी दिवस (09 अगस्त) को शासकीय अवकाश घोषित किए जाने को लेकर मांग की जा रही थी। लेकिन राज्य सरकार ने विपक्ष की इस बात को अनदेखा करते हुए सोमवार से ही विधानसभा का मानसून सत्र बुलाने का निर्णय ले लिया। सत्र के पहले ही दिन कांग्रेस नेताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में आदिवासी दिवस की छुट्‌टी घोषित न करने का विरोध किया। सड़क से लेकर विधानसभा के अंदर तक विपक्ष के नेताओं ने सरकार की इस मनमर्जी का विरोध किया।

कमलनाथ ने आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने विश्व आदिवासी दिवस पर प्रदेश के आदिवासियों का अपमान किया। हमने विश्व आदिवासी दिवस पर अवकाश दिया था, लेकिन शिवराज सरकार ने उस पर रोक लगा दी। आदिवासी कोई ठेका और कमीशन के लिए भूखा नहीं है। वह तो सिर्फ सम्मान का भूखा है। कमलनाथ की यह बात बिल्कुल सही है। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में आदिवासी नायकों के बलिदान को भला कैसे भुलाया जा सकता है। आजादी के इस संघर्ष में गुण्‍डा धूर, टंट्या भील, भीमा नायक, वीरसा गोंड, शंकर शाह, दलपत सिंह शाह के बलिदानों को भला कैसे भुलाया जा सकता है। किस तरह से अपनी रक्तपात करवाकर इन आदिवासी शूरवीरों ने देश को अंग्रेजों के शासन से मुक्त करवाने में अहम भूमिका निभाई और आज शिवराज सरकार उन्हीं आदिवासियों के बलिदान को भुला चुकी है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बेहद संवेदनशील व्यक्ति हैं। ऐसे में उनसे इस तरह की गलतियों की अपेक्षा प्रदेश की जनता कम ही करती है। लेकिन प्रदेश के मुखिया का यह निर्णय लाखों करोड़ों आदिवासियों के लिए कभी न भुला पाने वाला दर्द बन गया है। मध्य प्रदेश की कुल जनसंख्या की लगभग 20 प्रतिशत आबादी आदिवासी है।

विश्व आदिवासी दिवस आबादी के अधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी सुरक्षा के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व के आदिवासी लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। यह घटना उन उपलब्धियों और योगदानों को भी स्वीकार करती है जो मूलनिवासी लोग पर्यावरण संरक्षण जैसे विश्व के मुद्दों को बेहतर बनाने के लिए करते हैं। विश्व के इन सभी देशो में से कई देश ऐसे जहा पर आदिवासी जाति का निवास हैं। हमारे भारत की बात करे तो भारत में भी कई हिस्सों में आदिवासी लोग रहते हैं। हमारे देश की आजादी से पहले आदिवासी जनजाति ने देश की स्वंत्रता के लिए काफी योगदान दिया हैं। पूरे विश्व में आदिवासी जनजाति को बढ़ावा देने और उनको प्रोत्साहित करने के लिए और उनको सम्मान देने के लिए पुरे विश्व में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस यानी वर्ल्ड ट्राइबल डे मनाया जाता हैं। सबसे पहले आदिवासी दिवस संयुक्त राज्य अमेरिका में 1982 में मनाया गया था। इस दिन से ही विश्व आदिवासी दिवस की शुरुआत हुई थी।

हम जानते हैं कि मध्‍यप्रदेश के दक्षिण में बस्‍तर के आदिवासियों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया यथापि उनका यह योगदान अल्‍प विरोध का ही रहा परन्‍तु अंग्रेज इस क्षेत्र से इतने आतंकित थे कि अंत से इस वंश को ही नष्‍ट करने का प्रयास करने लगे। बस्‍तर के आदिवासियों के प्रमुख विद्रोह इस प्रकार है- प्रथम विद्रोह 1774, भोपालपटनम् संघर्ष-1795, परलकोट 1825, तारापुर विद्रोह 1842-1854, मेरिया विद्रोह 1842-1863, कोई विद्रोह 1859, मुरिया विद्रोह 1876 रानी चैरिस का विद्रोह 1878-1842, भूमकाल विद्रोह 1910। आदिवासियों द्वारा किये गये इन विद्रोह में भारत की स्‍वतंत्रता में बहुत बड़ा योगदान रहा है। हम कैसे भूल सकते हैं कि इन आदिवासियों ने अपनी जान तक की परबाह करते बगैर देश की आज़ादी में प्राणों को न्‍यौछावर किया है। लेकिन विडंबना है कि आज हमारी राजनीतिक पार्टियां इन आदिवासियों के बलिदानों को भूलती जा रही है। आदिवासी दिवस 9 अगस्‍त को शासकीय अवकाश देकर आदिवासी समाज के समाजसेवियों को सम्‍मानित कर हम बलिदानी आदिवासियों को सच्‍ची श्रद्धां‍जलि तो दे ही सकते हैं। साथ ही स्‍वतंत्रता संग्राम में जिन्‍होंने बलिदान दिया उनके नाम पर स्‍मारक, पुरस्‍कार जैसे सम्‍माननीय आयोजन सरकार द्वारा किये जाने चाहिए।

जनगणना 2011 के मुताबिक मध्यप्रदेश में 43 आदिवासी समूह हैं- इनमें भील-भिलाला आदिवासी समूह की जनसंख्या सबसे ज्यादा 59.939 लाख है। इसके बाद गोंड समुदाय का नंबर आता है, जिनकी आबादी 50.931 लाख हैं। इसके बाद कोल (11.666 लाख), कोरकू (6.308 लाख) और सहरिया (6.149 लाख) का नंबर आता है। यूं तो आदिवासी आबादी 20 प्रतिशत हैं, लेकिन सामाजिक और मानव वैज्ञानिक विविधताओं के कारण यह आबादी कभी व्‍यापक राजनीतिक दबाव समूह की तरह पेश नहीं हुई है। जानकारों की माने तो मध्‍य प्रदेश ईसा काल के पहले से आदिवासियों की आश्रय स्‍थली रहा है। इतनी पुरानी आबादी होने के बाद भी यह समूह प्रदेश के विकास के साथ कदमताल नहीं कर पाया है। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि हमारे यहां पर राज्य में संस्कृति बदल जाती है। इतनी विभिन्नता किसी और देश में नहीं है। ये बाबा भीमराव अंबेडकर ने संविधान बनाया है। जिसके कारण हम सब एक हैं। आज संविधान पर हमला हो रहा है। ये देश पर हमला है। आज के युवाओं को रोजार चाहिए। आज कोई भी वर्ग संतुष्ठ नहीं है।

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