--अभिजीत पाण्डेय,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।
कुरुक्षेत्र जहाँ महाभारत का युद्ध हुआ था उस कुरुक्षेत्र ओर इसके आसपास के इलाकों में लगभग 5500 साल बाद भी महाभारत की निशानियां मौजूद हैं। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र का विस्तार 48 कोस में था जो आज के कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल, यमुनानगर, जींद ओर पानीपत तक के क्षेत्र को समेटे हुए है व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों को भी इसने समेट रखा है। यहां महाभारत के साक्ष्य कहीं धरती के नीचे दबे हुए हैं तो कहीं उत्खनन में उजागर हुए हैं। कुरुक्षेत्र के तीर्थों की देखरेख का जिम्मा कुरुक्षेत्र विकास निगम (केडीबी) के नियंत्रण में है।
वर्तमान में अंबाला दिल्ली राजमार्ग और रेलमार्ग पर स्थित कुरुक्षेत्र हरियाणा राज्य का एक प्रमुख जिला और तीर्थस्थल है।
इसका शहरी इलाका एक अन्य एतिहासिक स्थल थानेसर से मिला हुआ है। यही नहीं इसी कुरु क्षेत्र में थानेसर से लगभग 6 किलोमीटर पर ज्योतिसर नामक स्थान पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।
ऐतिहासक प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र का इतिहास करीब 1500 ई.पूर्व भारत में आर्यों के बसने से जुड़ा है व साथ ही पौराणिक महाकाव्य महाभारत की कथाओं से भी जुड़ा हुआ है। कुरुक्षेत्र का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के पहले श्लोक में ही मिलता है। यही नहीं प्राचीन भारतीय इतिहास पर नजर डालें तो कुरुक्षेत्र के पास ही स्थित थानेसर 606 से 647 ईसवी तक सम्राट हर्षवर्धन की राजधानी रहा है। इस भव्य नगर को मुगल आक्रमणकारी महमूद गजनवी ने सन 1011 ई. में उजाड़ दिया था। प्राचीन नगर के अवशेष आज भी थानेसर और इसके आसपास के क्षेत्रों में मिल जाते हैं।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार कुरुक्षेत्र ब्राह्मणकाल में वैदिक संस्कृति का केन्द्र था। जिसकी वहज से कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र भी कहा गया है। कुरुक्षेत्र के महंतों के अनुसार कुरुक्षेत्र के महत्व व पौराणिक कथाओं का उल्लेख ब्राह्मण-ग्रन्थों- तैत्तिरीय ब्राह्मण और ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है। इन ग्रंथों के मुताबिक सरस्वती ने कवष मुनि की रक्षा की थी। ऐतरेय ब्राह्मण में ही कुरुओं एवं पंचालों के देशों का उल्लेख किया गया है।
शास्त्रों के अनुसार महाभारत के वनपर्व के 83वें अध्याय के अनुसार कुरुक्षेत्र को सरस्वती नदी के तट पर होना बताया गया है। यदि नारद पुराण का अध्ययन करें तो कुरुक्षेत्र के लगभग सौ तीर्थों के नाम दिये हैं। जिसमें ब्रह्मसर तीर्थ प्रमुख है। नारद पुराण के अनुसार यहां पर राजा कुरु संन्यासी के रूप में निवास करते थे। कहा जाता है कि जो लोग कुरुक्षेत्र में आकर रहते हैं वे पाप मुक्त हो जाते हैं। ये भी कहा जाता है कि संसार मे कहीं भी पाप करो उस का निदान काशी में होता है। काशी में किये पाप हरिद्वार में, हरिद्वार में हुए पाप कुरुक्षेत्र में निदान होता है पर अगर धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में पाप हो तो इसका निदान शस्त्रों में कहीं नहीं है। साथ ही ये भी किवंदती है कि कुरुक्षेत्र में यदि किसी की मृत्यु होती है तो उसके पिंडदान के लिए हरिद्वार या पेहोवा जाने की आवश्यकता नहीं होती है। इसी धरती पर उसका तर्पण हो जाता है।
शास्त्रों के अनुसार कुरुक्षेत्र एक धार्मिक नगरी होने के कारण यहां छोटे बड़े कुल 365 के करीब मंदिर हैं जिनमें प्रमुख धार्मिक स्थलों का वर्णन निम्न है:-
कुरूक्षेत्र के पौराणिक स्थलों में से मुख्य है यहां का ब्रह्मसरोवर, यह सरोवर थानेसर में स्थित है। इसके महात्म का उल्लेख महाभारत और वामन पुराण में भी मिलता है। इस तीर्थ को ब्रह्मा से भी जोड़ा गया है। शास्त्रों के अनुसार यह वही सरोवर है जिसके पानी में खुद को बचाने के लिए दुर्योधन छिप गया था। सूर्यग्रहण के दिन यहां पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। कुछ ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा जी ने इस स्थान पर तपस्या कर सृष्टि की रचना इसी स्थान से शुरू की थी।
सूर्यग्रहण के दौरान लाखों लोग ब्रह्मसरोवर में स्नान करते हैं। यहां दिसंबर में प्रति वर्ष गीता जयंती मनाई जाती है। जिसमें देश-विदेश लाखों लोग पहुंचते हैं।
ब्रह्मसरोवर परिसर परिक्रमा मार्ग पर कई पुरातन मंदिरों के साथ नवनिर्मित श्री तिरुपति बालाजी (भगवान विष्णु) मंदिर का उद्घाटन पवित्र शहर कुरुक्षेत्र में धार्मिक पर्यटन देने के लिए एक बड़ा बढ़ावा देने को किया गया है। अब उत्तर भारत के भगवान तिरुपति बालाजी के भक्त आंध्र प्रदेश में तिरुपति जाने के बजाए भगवान बालाजी से आशीर्वाद मांगने के लिए कुरुक्षेत्र आते हैं।
कुरुक्षेत्र के थानेसर शहर से छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ज्योतिसर। कहा जाता है कि इसी स्थान पर आज से करीब साढ़े पांच हजार साल पहले भगवान श्री कृष्ण ने एक वट वृक्ष के नीचे अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। यहां मौजूद वट बृक्ष को महाभारत कालीन बताया जाता है। मान्यता है कि इसी बरगद के नीचे कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया था। इसी पेड़ के नीचे एक चबूतरा है। कहा जाता है कि इसका निर्माण दरभंगा नरेश ने करवाया था। ज्योतिसर परिसर ओर आसपास कई दर्शनीय मंदिर स्थित हैं।
ज्योतिसर से 2 किलोमीटर पहले नरकातारी गाँव मे स्थित बाणगंगा जहां अर्जुन ने तीर मार कर धरती से गंगा की धारा निकाल शरशैया पर लेटे भीष्म पितामह की प्यास बुझाइ थी।
कुरुक्षेत्र के अन्य दर्शनीय स्थलों में से एक सन्निहित सरोवर है। इस सरोवर के पास श्री कृष्ण संग्रहालय भी है। सन्निहित सरोवार के बारे में कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने युद्ध में मारे गए लोगों की मुक्ति के लिए तर्पण और पिंड-दान किया था। यहां अमावस्या के दिन भारी भीड़ रहती है और लोग सरोवर में स्नान-दान करते हैं। इसके साथ ही प्राचीन मां काली कमली मंदिर भी स्थित है।
गीता की स्थली होने के साथ कुरुक्षेत्र को एक और गौरव हासिल है। यहां सिखों के दस में आठ गुरु आए और उनकी पातशाही से यहां गुरुद्वारे बनाए गए। अब इन गुरुओं की कुरुक्षेत्र भ्रमण की स्मृतियों को सहेजने के लिए संग्रहालय बनने जा रहा है। धर्मनगरी में पांच और जिले में 18 ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं। इस पवित्र भूमि की महत्ता को देखते हुए राज्य सरकार ने सिख गुरुओं का संग्रहालय बनाने का निर्णय लिया है।
कुरुक्षेत्र में झांसा रोड पर माँ भद्रकाली शक्तिपीठ है जहां के बारे में कहा जाता है कि यहां माता पार्वती का जब अंग बंग हुआ था तो माता के दाहिने पाँव का टकना यहीं पर गिरा था। कुल 52 शक्ति पीठों में हरियाणा में ये एकमात्र शक्तिपीठ है।
माँ भद्रकाली से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर थानेसर में स्थित है स्थानेश्वर महादेव मंदिर जहां के बारे में कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध से पहले पांडवों व श्री कृष्ण ने इसी स्थान पर महादेव की पूजा की थी। इसी स्थान पर शनि देव का मंदिर, बाला जी मंदिर सप्त काल मंदिर व गुरुद्वारा भी स्थित है। मंदिर के पास ही कई छोटे मंदिर और कालेश्वर महादेव का मंदिर भी स्थित है जिसके बारे में किवदंती है कि जब रावण अपने पुष्पक विमान में जाता था तो इस स्थान पर उस का विमान रुक जाता था फिर यहां महादेव का पूजन करने के बाद ही उस का विमान आगे जाता था। मंदिर प्रांगण में ही साई बाबा का विशाल और भव्य मंदिर और साथ ही खाटू नरेश का निर्माणाधीन मंदिर भी स्थित है।
स्थानेश्वर महादेव मंदिर के रास्ते में थानेसर के सम्राट हर्षवर्धन का मकबरा स्थित है जहां हर्षवर्धन और उनके गुरु शेखचिल्ली की कब्र हैं इसी कारण इसे शेखचिल्ली का मकबरा भी कहा जाता है। मकबरे के साथ ही हर्षवर्धन पार्क और हर्षवर्धन का विशाल टीला भी स्थित है।
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