सांडों की लड़ाई में बागड़ का सत्यानाश....



---सलमान खान,
अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स मध्यप्रदेश इकाई।

सौच रहा हूं यह कहावत कब किसने कितने परीक्षण कर कैसे और किस पर बनाई होगी जो आज भी अपनी सत्यता पर खरी उतरती है। क्योंकि इसी कहावत को विगत दिनो अपनी हिकमत अमली से चित्रार्थ किया है एक अति महत्वकाक्षीं और विघटन कारी अपने नाम के बिल्कुल विपरीत आचरण वाले नरसंहारी आईएएस अधिकारी पी नरहरि ने... जी हां मैं बात कर रहा हूं भोपाल में स्थित पत्रकार भवन की जिसे एक सनकी अधिकारी ने अपनी छदम काबलियत साबित करने के लिए बल पूर्वक धाराशाही करवा दिया।

कभी अपनी आन बान और शान का प्रतीक रहे राजधानी भोपाल के मालवीय नगर स्थित इस पत्रकार भवन की बर्बादी का सहरा हालाकि दो सांडो की लड़ाई को जाता है जिन्होंने अपने वर्चस्व की लड़ाई के चलते प्रदेश के उन हज़ारों पत्रकारों की भावनाऔ और पत्रकारिता के लिए समर्पित निष्ठा की धाज्जियाँ उड़वा दी। कुछ दिनो से यह भवन इन दोनो खुराफ़ाती तथा कथित नेताओं की आपसी लड़ाई का केन्द्र बन गया था। हालांकि आज नहीं तो कल इस भवन का यही अंजाम होना था।

70 के दशक के पूर्व जिन निष्ठावान पत्रकारिता के जज्बे से लबरेज हमारे मार्गदर्शक स्व• धन्नालाल जी शाह, स्व• सत्पनारायण शर्मा जी, स्व• त्रिभूवन यादव जी, मरहूम इश्तियाक आरिफ जी, स्व• नितिन मेहता जी और लज्जाशंकर हरदेनिया जी जैसे वरिष्ट पत्रकारों ने इस पत्रकार भवन की नीव भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के बेनर तले लगभग 43 वर्ष पहले 11 फरवरी 1969 को रखी थी।

यहाँ ये बताया जाना भी अवश्य है कि हमारे वरिष्ठ जनो ने एक अभिनव सोच के तहत आने वाली पीढ़ी को एक लक्ष्य व प्रतीक के रुप मे पत्रकार भवन बनाने का निणर्य लिया था। तब उनके सामने सबसे बड़ी समस्या ज़मीन की आई जब उन्होंने इस मुददे पर सरकार से चर्चा कर पत्राचार किया तब यह बात सामने आई की सरकार किसी भी बिना पंजीकृत संस्था, समिति यूनियन या संघ को ज़मीन अलाट नहीं कर सकती, जमीन आवंटन के लिए संगठन का सरकार में पंजीयन होना अवथ्यक है और वह भी पुराना पंजीयन हो तब हमारे वरिष्ट जनो ने दिल्ली जाकर (28 अक्टूबर 1950 को गठित) भारत के सबसे पुराने और सबसे बड़े पत्रकार संगठन इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (आई•एफ•डब्ल्यू•जे•) के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रदैय स्व• के• रामाराव जी से सम्पर्क साघा और उनसे जुड़ने का प्रस्ताव रखा (यहा यह जानना भी अवाश्यक है कि स्व• के• रामाराव वरिष्ठ पत्रकार होने के सांथ सांथ भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के निज सचिव रह चुके थे और वह नेहरु जी के प्रधानमंत्री काल में प्रधानमंत्री जी के भाषण लिख कर देते थे )। चर्चा के दौरान वहाँ एक और समस्या सामने आई कि आई•एफ•डब्ल्यू•जे• अपने संविधान के अनुसार किसी भी प्रदेश में सदस्यता नहीं करता और ना ही किसी तहसील, जिला, संभाग या नगर इकाई को अपनी सम्बंधता देता है और जिस प्रदेश इकाई को सम्बधता दी जाती है उक्त प्रदेश इकाई का सदस्य स्वतह आई•एफ•डब्ल्यू•जे• का सदस्य बन जाता है। तब हमारे वरिष्ट जनों ने जो शायद भोपाल के पत्रकारों को ही जौड़ना चाह रहे थे तब उन्होंने अपनी रणनीति में सुधार किया और भोपाल वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन का कार्यक्षेत्र बढ़ाकर संम्पूर्ण मध्य प्रदेश किया गया।

भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट को आई•एफ•डब्ल्यू•जे• से सम्बंधता मिलने के बाद जब ज़मीन की लीज़ की बात आई तब भी हमारे वरिष्ठ जनों ने अपनी दूर अंदेशी का परिचय दिया और यह मानकर कि निकट भविष्य में कोई छलिया, कपटी, ठग या जालसाज यदि भोपाल वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन का अध्यक्ष बन बैठा और उसने अपने छल कपट और प्रभाव से पत्रकारों को बेदखल कर भवन और जमीन पर कब्जा कर उसे खुद बुर्द कर दिया तो वर्तमान के पत्रकार ठगे रह जाएंगे। निकट भविष्य में आने वाले इस तरह की दावे विवादों से बचने के लिए उन्होंने बीच का रास्ता इख्तेयार किया और 1969 में जब सरकार से जमीन की लीज कराई तो उसमें यह कंडीशन डाल दी कि इस पत्रकार भवन की मालिक भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन होगी जो मध्यप्रदेश इकाई का अगं (जिला इकाई) होगी और उस मध्य प्रदेश इकाई को इंडियन फेडरेशन ऑफवर्किंग जर्नलिस्ट्स ने अपनी सम्बंधता दे रखी होगी। इस कारण यह बात स्पष्ट हो गई कि जब तक इन तीनों इकाइयां जिला, प्रदेश और देश की सम्बधता की कड़ी नहीं मिलती कोई भी पक्ष इसका मालिक नहीं बन सकेगा।

ज्ञात हो कि पत्रकार भवन की लीज ही इस कण्डीशन या तरीके से हूई है। इसी आधार व नियम के तहत तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार ने कलेक्टर सीहोर जो तब भोपाल में ही आता था के माध्यम से मालवीय नगर स्थित खसरा नंबर एक पर स्थित .27,007 वर्गफिट जमीन इस शर्त पर आवंटित की थी कि इस जमीन पर यूनियन पत्रकार भवन का निमार्ण कर उसके माध्यम से पत्रकारों के सामाजिक सांस्कृतिक और शैक्षणिक उत्थान के कार्यक्रम संचालित करेगी।

यहाँ यह बताए जाना भी अवश्यक है कि शासन या सरकार जमीन की दो तरह की लीज देता है एक 30 साल की और दूसरी 99 साल की, जिस संस्था या आवेदक को 30 साल की लीज दी जाती हैं उसकी लीज की शर्तों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख होता है कि अमुक संगठन संस्था या आवेदक को शासन ने आज दिनांक से 30 वर्षो के लिये लीज निष्पादित की है। किन्तु जिन संगठनों, सस्थाऔ ओर आवेदकों को 99 साल की लीज दी जाती है उसने 30 वर्ष का अवश्यक बधंन नहीं लिखा जाता। अब सरकार में बैठे वेतन भोगी कर्मचारी और माखन लालिया पत्रकार बिना कागज़ देखे या मालूमात करे किस आधार पर पत्रकार भवन की लीज़ 30 साल पूरे होने पर खत्म होने का रोना रो रहे हैं यह समझ से परे है।

हम बात कर रहे थे जब इडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स से संबंध मध्यप्रदेश इकाई ओर उससे जुड़ी भोपाल जिला इकाई भोपाल वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन के नाम लीज हो गई तब स्वर्गीय धन्नालाल शाह जी के नेतृत्व में एक चदां कमेंटी बनी जिसने दिन रात अथक प्रयास कर लोगों से चंदा इकट्ठा करना शुरु किया। सभी पत्रकार अपने अपने स्तर से कभी सामूहिक तो कभी व्यक्तिगत संपर्क के आधार पर चदां करने में जुट गये तब लगभग 43 साल पहले 11 फरवरी 1969 को पत्रकार भवन की नीव रखी गई तभी भोपाल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन ने पत्रकार भवन के निमार्ण और रख रखाव के लिए पत्रकार भवन समिति का गठन किया जिसे मध्यप्रदेश सोसाइटी पंजीयन अधिनियम 1959 के तहत 1970 में फर्म एवम् सोसाइटी विभाग में पंजीकृत कराया गया जिसके पहले अध्यक्ष स्व• धन्नालाल शाह थे, उन पर पत्रकार भवन के निमार्ण का इतना जूनून था कि जब तक वह प्रति दिन 5-6 लोगों से चंदा नहीं ले लेते थे तब तक खाना नहीं खाते थे। सच्चाई और अच्छाई के लिए कई पत्रकारों ने अपने बच्चों को भूखा रखा और चंदा इकट्ठा किया और के बाद स्व• जगत पाठक, स्व• राजेन्द्र नूतन आदि कई पत्रकार इस मिशन में उतरे और कारवां बढ़ता गया सालों की मेहनत के बाद पत्रकार भवन बनकर तैयार हुआ। यह देश में किसी पत्रकार यूनियन का पहला भवन था। इसकी विशालता और भव्यता के चर्जे पूरे देश में होते थे। भारत सरकार के द्वारा संचालित पत्र सूचना कार्यालय वर्षों तक इस भवन में किराये पर रहा। प्रदेश के कोने कोने से आने वाले पत्रकारों के लिये यहां ठहरने की भी व्यवस्था थी। इतना ही नहीं कई पत्रकारों का तो यह स्थायी ठिकाना व अनगिनत पत्रकारों का आखिरी ठिकाना था।

लेकिन इस भवन को क्षेत्रीय विधायक और विभागीय (रवर स्टाम्प ) जनसम्पर्क मंत्री पी• सी• शर्मा की ना अहली और जनसम्पर्क आयुक्त व सचिव पीं नरहरि की अति महत्वकाक्षा चंद घंटो में लील गई....।

चलते...चलते...

ऐसे अवसरो के लिये किसी शायर ने क्या खूब नसीहत भरा शेर कहा था कि...

शोहरत की बुलन्दी पर इतना न उड़ो "नरहरि"
परवाज़ न खो जाये कही इन ऊँची उड़ानौ में....

https://www.indiainside.org/post.php?id=6648