घोघा-दहेज फेरी सेवा के उद्घाटन पश्चात प्रधानमंत्री द्वारा जनसभा को संबोधन के मुख्य अंश



मेरे प्‍यारे भाइयो और बहनों। सा‍थियों, जैसा अनुभव किसान को अपनी लहलहाती फसल को देख करके होता है; जैसा अनुभव कुम्‍हार को सुंदर सा घड़ा, मिट्टी के बर्तन; मिट्टी के दीए बनाता है, तो बनने के बाद उसे जैसा सुखद अनुभव होता है; जैसा अनुभव किसी बुनकर को सुंदर सी कालीन बनाकर उसके मन को जो प्रसन्‍न्‍ता होती है; वैसा ही अनुभव इस वक्‍त मुझे हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे अब से कुछ देर पहले, मैं सवा सौ करोड़ देशवासियों की इच्‍छाओं को, उनकी भावनाओं को जी करके यहां आया हूं। 

घोघा से दहेज के रास्‍ते में समंदर पर बिताए हुए एक-एक पल के दौरान, मैं यही सोचता रहा कि बीतता हुआ ये समय एक नया इतिहास लिख रहा है, एक नए भविष्‍य के दरवाजे खोल रहा है। इसी द्वार से चलकर हम ‘न्यू इंडिया’ का मजबूत आधार रखेंगे, न्यू इंडिया का सपना साकार करेंगे। देश की जनशक्ति से ही और उसके सही इस्‍तेमाल करने का सपना, सरदार पटेल से ले करके डॉक्‍टर बाबा साहेब अम्‍बेडकर तक सभी ने देखा था। आज हमने उनके सपने से जुड़े हुए एक पड़ाव को पार कर लिया है। 

घोघा-दहेज के बीच ये फेरी सौराष्‍ट्र और दक्षिण गुजरात के करोड़ों-करोड़ों लोगों की जिंदगी को न सिर्फ आसान बनाएगा, बल्कि उन्‍हें और निकट ले आएगा। 

इस फेरी सर्विस से पूरे क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक विकास का एक नया दौर शुरू होगा। रोजगार को जो नौजवान इस व्‍यवस्‍था का फायदा उठाएंगे; रोजगार के नए अवसर उपलब्‍ध होंगे। कोसटल शिपिंग और कोसटल टूरिज्म का भी एक नया अध्‍याय इसके साथ जुड़ने वाला है। भविष्‍य में हम सब इस फेरी सर्विस से.... और यहां आए हुए लोग ध्‍यान से सुनें, भविष्‍य में हम इस फेरी सर्विस से हजीरा, पीपावाओ, जाफराबाद, दमनदीव, इन सभी महत्‍वपूर्ण जगहों के साथ फेरी सर्विस जुड़ सकती है। 

मुझे बताया गया है कि सरकार की तैयारी आने वाले वर्षों में इस फेरी सर्विस को सूरत से आगे हजीरा और फिर मुम्‍बई तक ले जाने की योजना है। कच्‍छ की खाड़ी में भी इस तरह प्रोजेक्‍ट शुरू करके किए जाने की चर्चा चल रही है। उन्‍होंने काफी काम आगे बढ़ाया है। और मैं राज्‍य सरकार को उनके इन प्रयासों के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं और भारत सरकार की तरफ से पूरा सहयोग मिलेगा, इसका मैं विश्‍वास दिलाता हूं। 

सरकार का ये प्रयास दहेज समेत पूरे दक्षिण गुजरात के विकास के लिए सरकार की प्रतिबद्धता का एक जीता-जागता उदाहरण है। भड़ूच समेत दक्षिण गुजरात में औदयोगिक विकास की गति को तेज करने के लिए दहेज और हजीरा जैसे केन्‍द्रों पर हमने सविशेष ध्‍यान केन्द्रित किया है। पैट्रोलियम, कैमिकल्स & पैट्रोकैमिकल्स इनवेस्टमेंट रिजन्स की स्‍थापना के साथ ही रेल नेटवर्क, रोड लिंकेजेस, उस पर जो काम हुआ है, शायद पहले किसी ने सोचा तक नहीं होगा।

हजीरा में भी इन्फ्रास्ट्रकचर के विकास पर जोर लगाया गया है। आने वाले वर्षों में दिल्‍ली-मुम्‍बई इंडस्ट्रियल काॅरिडोर का लाभ भी इन क्षेत्रों को मिलने वाला है। गुजरात का मरीटाइम डेवलपमेंट पूरे देश के लिए एक माडल है। मुझे उम्‍मीद है कि रो-रो फेरी सर्विस का प्रोजेक्ट भी दूसरे राज्‍यों के लिए एक माडल प्रोजेक्ट की तरह काम करेगा। 

हमने जिस तरह वर्षों की मेहनत के बाद इस तरह के प्रोजेक्ट में आने वाली दिक्‍कतों को समझा, उसे दूर किया, उन दिक्‍कतों कम सो कम आएं, भविष्‍य में अगर नया प्रोजेक्ट बनाना है; उस दिशा में गुजरात ने बहुत बड़ा काम किया है। 

सा‍थियों, आज से नहीं सैंकड़ों वर्षों से जल-परिवहन के मामले में भारत दूसरे देशों से बहुत आगे रहा था। हमारी टेकनीक दूसरे देशों से कहीं ज्‍यादा श्रेष्‍ठ हुआ करती थी। लेकिन ये भी सही है कि गुलामी के बड़े कालखंड के दौरान हमने अपनी श्रेष्‍ठताओं को अपने इतिहास से सीखना धीरे-धीरे कम कर दिया, भूलते चले गए। नए इनोवेशन कम होने के साथ ही जो क्षमताएं थीं, वो भी धीरे-धीरे इतिहास का हिस्‍सा बन गईं। वरना जिस देश की नेविगेशन क्षमताओं का लोहा सदियों से पूरी दुनिया मानती रही हो, उसी देश में स्‍वतंत्रता के बाद वाटर ट्रांसपोर्ट पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया, भुला दिया गया। 

साथियों, आज भी भारत में रोड ट्रांसपोर्ट का हिस्‍सा 55 प्रतिशत है, रेलवे माल ढुलाई का 35 प्रतिशत वहन करती है और वाटरवेज्स क्‍योंकि सबसे सस्‍ता है, वो सिर्फ 5 या 6 प्रतिशत है। जबकि तीसरे देशों में वाटरवेज्स और कोसटल ट्रांसपोर्ट की हिस्‍सेदारी करीब-करीब 30 प्रतिशत से भी ज्‍यादा हुआ करती है। यही हमारी सच्‍चाई, यही हमारी चुनौती है और यही स्थिति हमें बदलने का संकल्‍प ले करके आगे बढ़ना है। 

आज जान करके हैरान हो जाओगे कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था पर लाॅजिस्टिक का बोझ 18 प्रतिशत तक है। यानी सामान को देश के एक हिस्‍से से दूसरे हिस्‍से तक ले जाने पर दूसरे देशों की अपेक्षा हमारे देश में खर्च ज्‍यादा होता है। और उसके कारण गरीब व्‍यक्ति को जो चीजों की जरूरत होती है, वो ट्रांसपोर्ट के कारण भी महंगी हो जाती हैं। अगर वाटर ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देकर हम काॅस्ट आफ लाॅजिस्टिक को लगभग आधा कर सकते हैं और ऐसा करने के लिए हमारे पास साधन, संसाधन, सुविधाएं और सामर्थ्‍य, सब कुछ मौजूद है। 

साथियों हमारे देश में 7,500 किलोमीटर का समुद्री तट और 14,500 किलोमीटर का इंटरनल वाटरवेय, यानी नदियों द्वारा मार्ग उपलब्‍ध है। एक तरह से मां भारती ने हमें पहले से ही 21,000 किलोमीटर के जलमार्ग का आशीर्वाद देके रखा हुआ है। वर्षों तक हम इस खजाने पर चौकड़ी मारकर बैठे रहे और ये समझ ही नहीं पाए कि इसका इस्‍तेमाल कैसे करें। 

आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि हमारे यहां पहली पोर्ट पॉलिसी, 1995 में बनी। देश आजाद हुआ 1947 में और बंदरों की नीति, 1995, कितना विलंब कर दिया। उसके पहले पोर्ट के विकास के लिए एक लंबे विज़न के साथ काम नहीं हो रहा था। बस चीजें चल रही थीं और ये सच है कि इसकी वजह से देश को अरबों-खरबों का आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा। 

आपको एक उदाहरण देता हूं- अगर जलमार्ग के माध्‍यम से हम कोयले को ट्रांसपोर्टेशन करना चाहते हैं, तो उसका खर्च आता है प्रतिटन किलोमीटर 20 पैसे। वहीं जब इसे उसी कोयले को रेल के माध्‍यम से ले जाते हैं तो यही कीमत हो जाती है सवा रुपया, यानी 20 पैसे के सामने सवा हो जाता है, और आप विचार कीजिए कि रोड़ मार्ग से जाएंगे तो किना गुना बढ़ जाएगा ? आप बताइए हमें सस्‍ते माध्‍यम से कोयले की ढुलाई करनी चाहिए या नहीं? आप जानकर हैरान रह जाओगे कि आज भी कोयले की ढुलाई का 90 प्रतिशत रेल के द्वारा ही हो रहा है। दशकों से बनी हुई इस व्‍यवस्‍था को बदलना हमने ठान लिया है। और इसके लिए सरकार लगातार नए-नए इनिशिएटिव ले रही है। 

साथियो, जब हम नया घर खरीदते हैं तो देखते हैं कि उस घर की दूसरे क्षेत्रों के साथ कनेक्टिविटी कैसी है, रोड है कि नहीं है, रेल है कि नहीं है, जाना है तो बस मिलती है कि नहीं मिलती है। जब हम नया बिजनेस शुरू करते हैं- तो भी देखते हैं कि इस इलाके में कनेक्टिविटी कैसी है। उस इलाके में सामान को लाने-ले जाने में कोई दिक्‍कत तो नहीं आएगी ? 

जब हमारी सामान्‍य एप्रोच यही रहती है तो फिर एक सवाल ये भी उठता है कि आखिर हमारे उद्योग समुद्र तटों से दूर क्‍यों जगाए जाएं? अगर इंडस्‍ट्री का कच्‍चा माल और तैयार किया हुआ माल, अगर बंदरों की कनेक्टिविटी पर निर्भर है तो क्‍या ये सही नहीं होगा कि समुद्र तटों के पास इंडस्ट्रियल कोसटल भी विकसित किए जाएं। इससे न केवल लॉजिस्टिक की कीमत में कमी आएगी बल्कि इज़ आफ बियिंग बिजनेस में भी मददगार साबित होगा। 

जो देश के भीतर जरूरत है उसके उद्योग देश के भीतर कहीं भी लग सकते हैं और लगाने भी चाहिए। लेकिन जो दूसरे देशों में भेजना है, एक्सपोर्ट करना है, वो जब समुद्री तट पर करते हैं तो ज्‍यादा सुविधाजनक हो जाता है, ज्‍यादा मुनाफा मिलता है। 

साथियो, ट्रांसपोर्ट की दुनिया में कहा जाता है कि अगर आप आने वाले कल की दिक्‍कतों को आज सुलझा रहे हैं तो आप पहले ही बहुत देर कर चुके हैं। आप सोचिए, आपके आसपास किसी सड़क पर हर रोज जाम लगता हो और कोई तय करे कि अब वहां फ्लाईओवर बनाया जाएगा, ये फ्लाईओवर जब बन करके तैयार होगा तब तक उस इलाके में गाडि़यों की संख्‍या इतनी बढ़ जाती है कि उस फ्लाईओवर पर भी जाम लगने लग जाता है। हमारे देश में यही होता रहा है। और इसलिए ट्रांसपोर्ट सेक्टर में सरकार अभी की जरूरतों के साथ ही भविष्‍य की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए भी काम कर रही है। हमारा मंत्र है पी फार पी, पोर्टस फार प्रासपरिटी। हमारे बंदर समृद्धि के प्रवेश द्वार। सागरमाला जैसा प्रोजेक्ट इसी विज़न की एक झलक है। इस प्रोजेक्ट पर टवेन्टी – थर्टी फाइव तक की जरूरतों को ध्‍यान में रखते हुए हम काम कर रहे हैं। इसके तहत सरकार अब से ले करके 2035 को ध्‍यान में रखते हुए 400 से ज्‍यादा परियोजाओं पर आज बहुत बड़ा इनवेस्टमेंट कर रही है। 

इन अलग-अलग परियोजनाओं पर 8 लाख करोड़़ रुपये से ज्‍यादा निवेश करने की तैयारी है। सागरमाला प्रोजेक्‍ट निश्चित तौर पर न्यू इंडिया का बहुत बड़ा आधार बनेगा। 

साथियों, समुद्र के जरिए दूसरे देशों से मजबूत संबंध स्‍थापित करने के लिए हमें और आधुनिक पोर्टस की आवश्‍यकता है। हमारी ईकोनोमी के लिए पोर्टस फेफड़ों की तरह हैं। अगर पोर्टस बीमार हो जाएं, क्षमता के मुताबिक काम न करें तो हम बहुत व्‍यापार भी नहीं कर पाएंगे। इसी तरह जैसे शरीर में फेफड़ों द्वारा खींची गई ऑक्‍सीजन हृदय द्वारा पम्प करके नसों के माध्‍यम से अलग-अलग स्‍थानों पर पहुंचाई जाती है, वैसे ही ईकोनोमी में ये भूमिका रेल्वेज, हाईवेज्स, एयरवेज्स और वाटरवेज्स के द्वारा होती है। अगर नसों में खून की सप्‍लाई कम हो जाए, ऑक्‍सीजन कम हो जाए तो शरीर कमजोर हो जाता है। ऐसे ही कनेक्टिविटी सही न हो तो देश का आर्थिक विकास भी कमजोर पड़ने लगता है। और इसलिए इंफ्रास्टक्चर और कनेक्टिविटी दो ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर ये सरकार अधिक से अधिक शक्ति लगा रही है। 

साथियों, सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है कि पिछले तीन वर्षों में पोर्ट सेक्टर में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। अभी तक का सबसे ज्‍यादा केपिसिटी एडिशन पिछले दो-तीन वर्षों में ही हुआ है। जो पोर्ट और सरकारी कम्‍पनियां घाटे में चल रही थीं, उनमें भी परिस्थिति बदल गई है। सरकार का ध्‍यान कोसटल सर्विस से जुड़े स्किल डेवलपमेंट पर भी है। 

एक अनुमान के मुताबिक अकेले सागरमाला प्रोजेक्‍ट से आने वाले समय में देश के भिन्‍न-भिन्‍न भाग पर एक करोड़ नई नौकरियों के अवसर की संभावनाएं हैं। हम इस एप्रोच के साथ काम कर रहे हैं कि ट्रांसपोर्टेशन का पूरा फ्रेम वर्क आधुनिक और इंटिग्रेटेड हो। 

आजकल आप कई जगहों पर ट्रेफिक जाम देखते हैं। इसी तरह हमारे पोर्टस में भी जाम लग जाता है। पोर्टस में लगने वाले जाम की वजह से लॉजिस्टिक कॉस्ट बढ़ती है, वेटिंग टाइम बढ़ता है। जिस तरह हम ट्रेफिक में फंसने के बाद सिर्फ इंतजार करते रह जाते हैं, कोई प्रोजेक्टिव काम नहीं कर पाते; उसी तरह समुद्र में खड़े जहाज भी सामान उतारने और सामान चढ़ाने के इंतजार में खड़े रह जाते हैं। और सिर्फ वो वेशैल खड़ा नहीं रहता है, पूरी इकोनोमी ठहर जाती है। यह बहुत आवश्‍यक है कि पोर्टस का आधुनिकीकरण हो, बॉटलनेक्स हटाए जाएं। 

सागरमाला प्रोजेक्‍ट का एक और पहलू है और वो है ब्लू ईकोनोमी। पहले लोग सिर्फ ओसियन ईकोनोमी के बारे में बात करते थे लेकिन हम ब्लू ईकोनोमी के बारे में बात करते हैं। ब्लू ईकोनोमी यानी ईकोनोमी और ईकोलॉजी का गठजोड़। ब्लू ईकोनोमी आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ ही समुद्र से जुड़े ईको-सिसटम को भी बढ़ावा देती है। 

अगर 18वीं और 19वीं शताब्‍दी में औद्योगिक क्रांति जमीन पर हुई तो 21वीं शताब्‍दी में औद्योकिग क्रांति समुद्र के माध्‍यम से होगी, ब्लू रिवॉल्यूशन के जरिए होगी। 

साथियो, हमारी आज की आवश्‍यकताओं और चुनौतियों को देखते हुए ये बहुत आवश्‍यक है कि हम देश की सामुद्रिक शक्ति का ज्‍यादा से ज्‍यादा इस्‍तेमाल करें। ब्लू ईकोनोमी की क्षमताओं का ज्‍यादा इस्‍तेमाल न्यू इंडिया का आधार बनेगा। 

खाद्य सुरक्षा के लिए ब्लू ईकोनोमी का इस्‍तेमाल किया जा सकता है। जैसे अगर हमारे मछुआरे भाई सी बीइड की खेती करें, उसमें वेल्यू-एडिशन करें तो इससे उनकी आय में भी इजाफा हो सकता है। ऐसे ही ब्लू ईकोनोमी, ऊर्जा के क्षेत्र में माइनिंग के क्षेत्र में, टूरिज्म के क्षेत्र में न्यू इंडिया का एक बहुत बड़ा आधार बन सकती है। 

साथियो, ये सरकार देश में एक नई कार्य संस्‍कृति विकसित कर रही है। एक ऐसी कार्य-संस्‍कृति जो जवाबदेह हो, पारदर्शी हो। आज इसी कार्य-संस्‍कृति की वजह से योजनाओं पर तेजी से काम हो रहा है। आज देश में दोगुनी गति से सड़के बन रही हैं, दोगुनी गति से रेल लाइनें बिछ रही हैं। 

योजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए ड्रोन से लेकर सेटेलाइट तक से मानिटरिंग करने की व्‍यवस्‍था हो रही है। कोई तो वजह होगी कि अब आपको पासपोर्ट इतना जल्‍दी मिल जाता है। कोई तो वजह होगी कि अब आपको गैस का सिलेंडर इतनी आसानी से मिल जाता है। कोई तो वजह होगी कि अब आपको इनकम टैक्स रिफण्ड के लिए महीनों इंतजार नहीं करना पड़ता है। ये बदलाव आपकी जिंदगी में आ रहा है और इसके पीछे बड़ी वजह है, सरकार की कार्य-संस्‍कृति में हमने जो बदलाव लाया है। एक ऐसी कार्य-संस्‍कृति है जो गरीबों को, मध्‍यम वर्ग को, तकनीक की मदद से उसका हक दिला रही है। 

गुजरात में आपने जो सिखाया है, वो अनुभव मुझे दिल्‍ली में बहुत काम आ रहा है। खोज-खोजकर फाइलें निकलवा रहा हूं और जो परियोजनाएं दशकों से अटकी हुई हैं उन्‍हें पूरा करवा रहा हूं। हमने एक व्‍यवस्‍था विकसित की है- ‘प्रगति’। इसके माध्‍यम से अब तक 9 लाख करोड़ रुपये से ज्‍यादा की परियोजनाओं की समीक्षा की गई है। प्रगति में समीक्षा होने के बाद चार-चार दशक से अटके हुए प्रोजेक्ट अब तेजी से पूरे होने की तरफ आगे बढ़ रहे हैं। 

ये सरकार देश में ईमानदार अर्थव्‍यवस्‍था और इमानदार सामाजिक अर्थव्‍यवस्‍था स्‍थापित करने के लिए प्रयास कर रही है। नोटबंदी ने काले धन को न सिर्फ तिजौरी से बाहर निकालकर बैंक में पहुंचाया है, बल्कि देश को ऐसे-ऐसे सबूत भी सौंपे हैं जिससे एक अभूतपूर्वक स्‍वच्‍छता अभियान शुरू होना संभव हुआ है। 

इसी तरह जीएसटी से भी देश में एक नया बिजनेस कलचर मिल रहा है। हमें मालूम है पहले जो लोग ट्रक लेकर जाते हैं, चेक पोस्ट पर घंटों खड़े रहना पड़ता था। जीएसटी आने के बाद सारे चेक-पोस्ट गए। जो ट्रक पांच दिन में पहुंचता था वो आज तीन दिन में पहुंचता है। सामान ले जाने, लाने का खर्चा कम हो गया और हजारों करोड़ रुपये जो चेक-पोस्ट पर जाते थे, उसमें भी भ्रष्‍टाचार पनपता था। वो सारी चीजें जीएसटी आने के कारण बंद हो गया। अब मुझे बताइए, अब तक जिन्‍होंने ठेकेदारी में लूटा था वो मोदी से नाराज होंगे कि नहीं होंगे ? उनको मोदी पर गुस्‍सा आएगा कि नहीं आएगा ? लेकिन देश के ना‍गरिक को भला होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए ? देश के नागरिकों को लाभ होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए ? 

एक ऐसा बिजनेस कलचर जिसमें इमानदारी से सारा कारोबार होता है और इमानदारी के दम पर ही कमाई की जाती है। और मेरा अनुभव है कोई व्‍यापारी चोरी करना नहीं चाहता है। लेकिन कुछ कानून, नियम, अफसर, राजनेता; उसको उस पर धक्‍का मारते हैं, बेचारे को मजबूर कर देते हैं। हम उसको इमानदारी का वातावरण देने के लिए काम कर रहे है। 

आप देखिए जीएसटी से जुड़ने वाले व्‍यापारियों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। जीएसटी लागू होने के बाद इनडायरेक्ट टैक्स के दायरे में 27 लाख नागरिक जुड़ गए हैं। 

साथियो, मुझे पता है कि मुख्‍यधारा में लौट रहे कुछ व्‍यापारियों को डर लग रहा है कि कहीं उनके पुराने रिकॉर्ड तो नहीं खोले जाएंगे ? जो कोई वर्ग इमानदारी से देश के विकास में शामिल हो रहा है, मुख्‍यधारा में आ रहा है, उसे मैं ये पूरा भरोसा दिलाना चाहता हूं कि उनकी पुरानी चीजें खोल करके किसी अफसर को परेशान करने का हक नहीं दिया जाएगा। 

भाइयो, बहनों, तमाम सुधारों और कड़े फैसलों के बावजूद देश की अर्थव्‍यवस्‍था पटरी पर आए सही दिशा में है। हाल में आए आंकड़ों को देखें तो कोयले, बिजली, स्टील, नेचुरल गैस, इन सबके प्रोडक्शन में काफी वृद्धि हुई। विदेशी इनवेस्टर भारत में रिकार्ड निवेश कर रहे हैं। भारत का फारेन एक्सचेंज रिजर्व लगभग 30 हजार करोड़ डॉलर से बढ़कर 40 हजार करोड़ डॉलर को पार कर गया है। 

कई जानकारों ने इस बात पर सहमति जताई है कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था के फंडामेंटल काफी मजबूत हैं, स्ट्रांग हैं। हमने रिफार्म सेक्टर में महत्‍वपूर्ण फैसले लिए हैं और ये प्रक्रिया लगातार जारी रहेगी। देश की फाइनल ससटेनएबिलिटी को भी मेनटेन रखा जाएगा। निवेश बढ़ाने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए हम हर आवश्‍यक कदम उठाते रहेंगे। 

साथियो, ये बदलती हुई व्‍यवस्‍थाओं का दौर है। संकल्‍प से सिद्धि का दौर है। हम सभी को न्यू इंडिया के निर्माण के लिए संकल्‍प लेना होगा, उसे सिद्ध करना होगा। आज यहां घोघा-दहेज फेरी सर्विस के माध्‍यम से न्यू इंडिया के एक नए साधन की शुरूआत हुई है। 

आप सभी को मैं एक बार फिर बहुत-बहुत शुभकामनाओं के साथ इसका भरपूर फायदा लेने के लिए निमंत्रित करता हूं। 

भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय 

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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