नई दिल्ली, 07 दिसम्बर 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने पंजाब में राबी नदी पर शाहपुरकंडी डैम (राष्ट्रीय परियोजना) को लागू करने की मंजूरी दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राबी नदी पर शाहपुरकंडी डैम,पंजाब को लागू करने की मंजूरी दी है। इसके लिए 2018-19 से 2022-23 की पांच वर्षों की अवधि के दौरान 485.38 करोड़ रुपये (सिंचाई घटक के लिए) की केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
इस परियोजना के कार्यान्वयन से राबी नदी के जल की मात्रा में कमी लाने में सहायता मिलेगी जो वर्तमान में माधोपुर हेडवर्क्स से होते हुए पाकिस्तान चली जाती है।
• ब्यौरा :
परियोजना के पूरा होने पर पंजाब राज्य में 5000 हेक्टेयर और जम्मू-कश्मीर में 32,173 हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई की सुविधा प्राप्त होगी।
शाहपुरकंडी डैम परियोजना के लिए वर्तमान की 99 पीएमकेएसवाई-एआईबीपी परियोजनाओं के समान नाबार्ड के माध्यम से केंद्रीय सहायता प्रदान की जाएगी।
केंद्रीय जल आयोग की वर्तमान निगरानी व्यवस्था के अतिरिक्त केंद्रीय जल आयोग के सदस्य की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जाएगा। परियोजना की कार्यान्वयन की निगरानी करने के लिए गठित की जाने वाली इस समिति में पंजाब और जम्मू-कश्मीर के चीफ इंजीनियर और संबंधित अधिकारियों को शामिल किया जाएगा।
एमओडब्ल्यूआर, सिंचाई पर आरडी एंड जीआर, बाढ़ नियंत्रण तथा बहुद्देशीय परियोजनाओं की परामर्शदात्री समिति ने 31 अक्टूबर 2018 को हुई 138वीं बैठक में 2715.70 करोड़ रुपये (मूल्य स्तर फरवरी 2018) के दूसरे पुनरीक्षित लागत अनुमान को स्वीकृति दी है।
485.38 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता के साथ पंजाब सरकार इस परियोजना को लागू करेगी। जून 2022 तक यह परियोजना पूरी हो जाएगी।
• प्रभाव :
राबी नदी के पानी की कुछ मात्रा वर्तमान में माधोपुर हेडवर्क्स होकर पाकिस्तान चली जाती है, जबकि पंजाब और जम्मू-कश्मीर में जलकी आवश्यकता है। परियोजना को लागू करने से पानी की बर्बादी में कमी लाने में मदद मिलेगी।
इस परियोजना के पूरा होने से पंजाब राज्य में अतिरिक्त 5000 हेक्टेयर और जम्मू–कश्मीर में अतिरिक्त 32,173 हेक्टेयर भूमि कोसिंचाई की सुविधा मिलेगी।
इसके अतिरिक्त इस परियोजना से पंजाब में यूबीडीसी प्रणाली के अंतर्गत 1.18 लाख हेक्टेयर में सिंचाई सुविधा को सुव्यवस्थित करने मेंमदद मिलेगी। परियोजना के पूरा होने के पश्चात पंजाब 206 मेगावाट जलविद्युत पैदा करने में सक्षम होगा।
• परिव्यय :
शाहपुरकंडी डैम परियोजना के कार्य घटक की शेष लागत 1973.53 करोड़ रुपये (सिंचाई घटक: 564.63 करोड़ रुपये, ऊर्जा घटक :1408.90करोड़ रुपये) है। इसमें 485.38 करोड़ रुपये केंद्रीय सहायता के रूप में उपलब्ध कराई जाएगी।
• लाभ :
पंजाब के 5000 हेक्टेयर भूमि तथा जम्मू-कश्मीर के 32,172 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई की सुविधा प्राप्त होगी। परियोजना के कार्यान्वयन से अकुशल श्रमिकों के लिए 6.2 लाख कार्यदिवसों, अर्द्धकुशल श्रमिकों के लिए 6.2 लाख कार्यदिवसों तथा कुशल श्रमिकों के लिए 1.67 लाख कार्यदिवसों के रोजगार का सृजन होगा।
• पृष्ठभूमि :
सिंधू नदी के जल बंटवारे के लिए 1960 में भारत और पाकिस्तान ने सिंधू जल सन्धि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत भारत को 3 पूर्वी नदियों-राबी, ब्यास और सतलज के जल के उपयोग का पूर्ण अधिकार प्राप्त हुआ था।
राबी नदी के जल की कुछ मात्रा वर्तमान में माधोपुर हेडवर्क्स होकर पाकिस्तान में चली जाती है। इस परियोजना के लागू होने से पानी की बर्बादी होने में मदद मिलेगी।
पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच 1979 में एक द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। समझौते के तहत पंजाब सरकार द्वारा रंजीत सागर डैम (थीन डैम) और शाहपुरकंडी डैम का निर्माण किया जाना था। रंजीत सागर डैम का निर्माण कार्य अगस्त, 2000 में पूरा हुआ था। शाहपुरकंडी डैम परियोजना राबी नदी पर रंजीत सागर डैम से 11 किमी डी/एस तथा माधोपुर हेडवर्क्स से 8 किमी यू/एस पर स्थित है।
इस परियोजना को योजना आयोग ने नवंबर, 2001 में प्रारंभिक मंजूरी दी थी और इसे त्वरित सिंचाई लाभ योजना (एआईबीपी) के अंतर्गत शामिल किया था ताकि सिंचाई घटक के अंतर्गत इस योजना के लिए कोष उपलब्ध कराया जा सके।
एमओडब्ल्यूआर, आरडी एंड जीआर की परामर्शदात्री समिति ने 24 अगस्त, 2009 को शाहपुरकंडी डैम राष्ट्रीय परियोजना के लिए 2285.81 करोड़ रुपये का संशोधित लागत निर्धारित किया था। इस परियोजना के लिए 26.04 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता 2009-10 से 2010-11 के दौरान जारी की गई थी। हालांकि कार्य में प्रगति नहीं हो सकी। इसका कारण था- पंजाब सरकार द्वारा ऊर्जा घटक के अंतर्गत कोष उपलब्ध नहीं कराना तथा जम्मू-कश्मीर के साथ कई मुद्दों पर मतभेद होना।
इस संबंध में द्विपक्षीय स्तर पर कई बैठकें आयोजित की गईं तथा भारत सरकार के स्तर पर भी कई बैठकों का आयोजन हुआ। अंतत: एमओडब्ल्यूआर, आरडी एंड जीआर के तत्वावधान में पंजाब और जम्मू-कश्मीर ने 8 सितंबर, 2018 को नई दिल्ली में एक समझौते पर सहमति व्यक्त की।
॥■॥ जहाजरानी मंत्रालय ने वाराणसी में 156 करोड़ रुपये के फ्रेट विलेज को मंजूरी दी
जहाजरानी मंत्रालय ने गंगा नदी पर अंतर्देशीय जलमार्ग टर्मिनल के समीप वाराणसी में 156 करोड़ रुपये की लागत से एक फ्रेट विलेज विकसित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। वाराणसी फ्रेट विलेज का विकास भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण के द्वारा किया जाएगा। यह एक कार्गो हब के रूप में काम करेगा और यह माल एकत्रित करने एवं उसमें मूल्यवर्धन का भी एक केंद्र होगा। यह वाराणसी में एक पेशेवर लॉजिस्टिक्स उद्योग के विकास को भी प्रोत्साहित करेगा।
फ्रेट विलेज एक ऐसा निर्दिष्ट क्षेत्र है जहां परिवहन के विभिन्न साधन, माल वितरण और अन्य लॉजिस्टिक्स सुविधाएं सिंक्रनाइज तरीके से बड़े पैमाने पर उपलब्ध होती हैं। फ्रेट विलेज का मुख्य कार्य परिवहन के विभिन्न साधनों का प्रबंधन एवं उपयोगिता सुनिश्चित करना, उनमें तालमेल बिठाना और मौजूदा परिवहन साधन से भीड़भाड़ को कम करना है। फ्रेट विलेज बुनियादी तौर पर एक कार्गो एग्रीगेटर होता है जो शिपर/कार्गो मालिक को विभिन्न लॉजिस्टिक विकल्प यानी रेल-सड़क, रेल-जलमार्ग, सड़क-जलमार्ग आदि प्रदान करता है। पसंदीदा लॉजिस्टिक विकल्प कम इष्टतम/ सबसे कम लॉजिस्टिक लागत पर आधारित होता है जो शिपर/कार्गो मालिक से वसूला जा सकता है। माल ढुलाई संबंधी विभिन्न गतिविधियां एक ही छत के नीचे उपलब्ध होने और उनमें समन्वय से कारोबारी सुगमतता सुनिश्चित होती है। साथ ही इससे ट्रक क्षमता का बेहतर उपयोग संभव हो पाता है और इससे कारोबारी गतिविधियों एवं आर्थिक दक्षता में सुधार हो सकता है।
विश्व बैंक के एक पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन में पाया गया कि वाराणसी फ्रेट विलेज के लिए एक उपयुक्त जगह है। यह शहर सामरिक दृष्टि से उपयुक्त जगह पर स्थित है और यह ईस्टर्न ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर की लॉजिस्टिक्स श्रृंखला का मध्य बिंदु है जहां से राष्ट्रीय जलमार्ग-1, ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (ईडीएफसी), राष्ट्रीय राजमार्ग-7 और राष्ट्रीय राजमार्ग-2 गुजरते हैं। जल मार्ग विकास परियोजना के तहत बन रहे मल्टी मोडल टर्मिलन के चालू होने पर वाराणसी के लिए अंतर्देशीय जलमार्ग पर यातायात में वृद्धि होने की उम्मीद है। वाराणसी मल्टी मोडल टर्मिनल के लिए यातायात की अनुमानित मात्रा 2020 तक 3.55 एमएमटी, 2025 तक 3.82 एमएमटी, 2035 तक 10.12 एमएमटी और 2045 तक 10.32 एमएमटी है। आईडब्ल्यूटी मल्टी मोडल टर्मिनल 2000 डीडब्ल्यूटी तक क्षमता वाले जहाजों को ठहराने में समर्थ होगा और वहां सिंक्रो-मोडलिटी के माध्यम से जेएमवीपी एवं ईडीएफसी से कार्गो यातायात की मात्रा में इस अपेक्षित वृद्धि को संभालने के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएं होंगी।
वाराणसी फ्रेट विलेज को लगभग 100 एकड़ भूमि पर विकसित करने का प्रस्ताव है। इसके लिए भूमि अधिग्रहण दो चरणों में- पहले चरण में 70 एकड़ और दूसरे चरण में 30 एकड़- किया जाएगा जिसकी कुल अनुमानित लागत 120 करोड़ रुपये है। इसके अलावा परामर्श सेवा एवं परियोजना प्रबंधन इकाई के परिचालन जैसे अन्य मदों में 45 करोड़ रुपये की निवेश पूर्व लागत होने का अनुमान है।
फ्रेट विलेज की भूमि का मालिक आईडब्ल्यूएआई होगा लेकिन इसका कुछ हिस्सा लॉजिस्टिक्स कंपनियों और जलमार्ग से संबंधित विनिर्माण एवं व्यापारिक कंपनियों को बाजार स्थितियों के अनुसार तय मूल्यों एवं निर्धारित शर्तों पर पट्टे पर दिया जाएगा ताकि वे अपना कारोबार स्थापित कर सकें। यह फ्रेट विलेज कंटेनर, बल्क एवं ब्रेक-बल्क कार्गो, तरल थोक और बैग वाले कार्गो सहित विविध कार्गो प्रोफाइल को अपनी सेवाएं मुहैया करा सकता है।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने स्वास्थ्य व आरोग्य के क्षेत्र में भारत और जापान के बीच सहयोग- ज्ञापन को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्वास्थ्य व आरोग्य के क्षेत्र में भारत और जापान के बीच 29 अक्टूबर, 2018 को हस्ताक्षर हुए सहयोग-ज्ञापन (एमओसी) को मंजूरी दे दी।
■ ज्ञापन में सहयोग के निम्न क्षेत्रों को शामिल किया गया है :
• विशेष परियोजनाओं को प्रोत्साहन
दवा, शल्य चिकित्सा और आघात (ट्रॉमा) देखभाल के क्षेत्र में मानव संसाधन का विकास
क्लिनिक परीक्षण के लिए अत्याधुनिक परीक्षण प्रयोगशाला का निर्माण
देखभाल करने वाले प्रशिक्षुओं के लिए जापानी भाषा शिक्षा केंद्र की स्थापना
एयूएमएस के समान दोनों देशों में तृतीय स्तर के देखभाल केंद्रों के बीच सहयोग स्थापित करना
वृद्धों की देखभाल के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रशिक्षुओं के लिए पाठ्यक्रम और पुस्तकें उपलब्ध कराना
• अवसंचरना का विकास
केंद्रीकृत स्वास्थ्य देखभाल वितरण प्रबंधन केंद्र की स्थापना
स्वच्छ और किफायती शौचालयों तक पहुंच बढ़ाने के माध्यम से स्वच्छता वातावरण को बेहतर बनाना
दवा के क्षेत्र में मरीज डेटा विश्लेषण, सूचना व संचार प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता विषयों पर संस्थानिक सहयोग को बढ़ावा देना
भारत में भारत-जापान नवाचार हब का निर्माण
भारत में उच्चस्तरीय बीएसएल 3 प्रयोगशाला सुविधाओं का निर्माण
उच्चस्तरीय चिकित्सा उपकरण प्राप्त करने के लिए सहयोग, मेक इन इंडिया के तहत विनिर्माण इकाइयों की स्थापना
• मानव विकास
• एमई-बीवाईओ व आयुर्वेद के समान स्वास्थ्य स्व–प्रबंधन के लिए मानव संसाधन, शोध व परियोजना प्रोत्साहन को विकसित करना
• भारत-जापान सार्वजनिक व निजी स्वास्थ्य देखभाल फोरम का गठन
(घ)
आयुष्मान भारत कार्यक्रम व अन्य पहलों तथा एएचडब्ल्यूएम के बीच समन्वय को प्रोत्साहन देने के लिए कोई अन्य क्षेत्र जिस पर दोनों पक्षों ने सहमति व्यक्त की हो, और
इस ज्ञापन के तहत सहयोग को बढ़ावा देने के लिए कोई अन्य क्षेत्र जिस पर दोनों पक्षों ने सहमति व्यक्त की हो
परस्पर सहयोग को बढ़ावा देने तथा समझौते ज्ञापन के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए एक उच्चस्तरीय परामर्शदात्री संयुक्त समिति का गठन किया जाएगा।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने बाह्य अंतरिक्ष की खोज तथा शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए बाह्य अंतरिक्ष के उपयोग में सहयोग पर भारत तथा उज्बेकिस्तान के बीच समझौता को स्वीकृति दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल को बाह्य अंतरिक्ष की खोज तथा शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए बाह्य अंतरिक्ष के उपयोग में सहयोग पर भारत तथा उज्बेकिस्तान के बीच समझौता के बारे में अवगत कराया गया। इस समझौता पर एक अक्टूबर, 2018 को नई दिल्ली में उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किया गया था।
• प्रमुख प्रभाव : यह समझौता भारत और उज्बेकिस्तान के बीच सहयोग को मजबूत बनाएगा और दूर संवेदी, सेलेटाइट संचार, सेटेलाइट नैविगेशन, अंतरिक्ष विज्ञान तथा बाह्य अतंरिक्ष की खोज के क्षेत्र में नई शोध गतिविधियां तथा ऐप्लीकेशन संभावनाओं में तेजी लाएगा।
• लाभ : इस समझौते से मानवता के लाभ के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी ऐप्लीकेशन के क्षेत्र में संयुक्त गतिविधियां बढ़ेंगी। इस समझौता से संयुक्त कार्य समूह बनेगा जो समझौता के प्रावधानों को लागू करने की समय सीमा तथा उपायों सहित कार्य योजना तैयार करेगा।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने ग्रामीण विद्युतीकरण निगम में भारत सरकार की वर्तमान 52.63 प्रतिशत हिस्सेदारी की रणनीतिक बिक्री विद्युत वित्त निगम को प्रबंधन नियंत्रण के साथ करने की सद्धांतिक मंजूरी दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडलीय आर्थिक समिति ने सिद्धांत रूप से ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (आरईसी) में भारत सरकार की 52.63 प्रतिशत हिस्सेदारी की रणनीतिक बिक्री विद्युत वित्त निगम (पीएफसी) को प्रबंधन नियंत्रण के साथ करने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
इस अधिग्रहण का उद्देश्य विद्युत श्रृंखला को एकीकृत करना, बेहतर तालमेल बनाना, व्यापक आर्थिक आकार का सृजन और वित्त विद्युत क्षेत्र की क्षमता में सुधार करके ऊर्जा पहुंच और सक्षमता के लिए क्षमता में वृद्धि करना है।
आरईसी और पीएफसी विद्युत मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय सार्वजनिक प्रतिष्ठान हैं।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक अधिनियम, 1951 में संशोधन को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल ने जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक अधिनियम, 1951 में संशोधन को मंजूरी दे दी।
• निर्णय का सार : इस निर्णय का लक्ष्य जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक अधिनियम, 1951 में समुचित संशोधन करना है, ताकि न्यासियों के रूप में प्रतिनिधित्व हो सके। संशोधन इस प्रकार है : “लोकसभा में मान्य नेता प्रतिपक्ष या जब नेता प्रतिपक्ष न हो, तब की स्थिति में सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता”।
• लाभ : मौजूदा अधिनियम में सबसे बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दल के प्रतिनिधित्व के लिए प्रावधान है। न्यास से दल विशेष के सदस्य को हटाने से न्यास गैर-राजनीतिक हो जाएगा। प्रस्तावित संशोधन के तहत न्यास में विपक्षी दल के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया गया है। प्रस्तावित संशोधन से सरकार को न्यास के कामकाज में हिस्सा लेने या किसी अन्य कारण से न्यासी को हटाने या उसे बदलने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने बहुविषयक साइबर-फिजिकल प्रणालियों के राष्ट्रीय मिशन को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल ने बहुविषयक साइबर-फिजिकल प्रणालियों के राष्ट्रीय मिशन (एनएम-आईसीपीएस) को मंजूरी दे दी। इसे पांच सालों के लिए 3600 करोड़ रुपये की कुल लागत के साथ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग लागू करेगा।
विवरण :
इस मिशन के तहत समाज की बढ़ती प्रौद्योगिकी जरूरतों को पूरा किया जाएगा और वह अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों के लिए अग्रणी देशों के अंतर्राष्ट्रीय रूझानों तथा रोडमैप का जायजा लेगा। इस मिशन के तहत निम्नलिखित विकास और कार्य किए जाएंगे :
• देश में साइबर-फिजिकल प्रणालियां (सीपीएस) और संबंधित प्रौद्योगिकियां सुगम हो जाएंगी।
• भारतीय परिस्थितियों के मद्देनजर राष्ट्रीय/क्षेत्रीय मुद्दों को हल करने के लिए सीपीएस प्रौद्योगिकियों को अपनाना।
• सीपीएस मे अगली पीढ़ी की कुशल श्रमशक्ति का सृजन।
• प्रौद्योगिकी आधारित नव-अनुसंधान में तेजी लाना।
• सीपीएस में उद्यमिता और स्टार्ट-अप इको प्रणाली विकास में तेजी लाना।
• सीपीएस, प्रौद्योगिकी विकास तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग विषयों में उच्च शिक्षा में उन्नत अनुसंधान को तेजी देना।
• भारत को अन्य उन्नत देशों के समकक्ष लाना तथा कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभों को प्राप्त करना।
कार्यान्वयन रणनीति :
एनएम-आईसीपीएस एक समग्र मिशन है जो सीपीएस में प्रौद्योगिकी विकास, विनियोग विकास, मानव संसाधन विकास, कौशल विकास, उद्यमशीलता और स्टार्ट-अप विकास तथा संबंधित प्रौद्योगिकियों के मुद्दों को हल करेगा। मिशन का लक्ष्य 15 प्रौद्योगिकी नवाचार केन्द्र, 6 विनियोग नवाचार केन्द्र और 4 प्रौद्योगिकी आधारित नव-अनुसंधान केन्द्र (टीटीआरपी) बनाना है। यह केन्द्र और टीटीआरपी देश के प्रतिष्ठित अकादमिक, अनुसंधान एवं विकास तथा अन्य संगठनों में समाधान विकास के संबंध में अकादमिक संस्थानों, उद्योग, केन्द्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों को जोड़ेगा। अकादमिक संस्थानों, उद्योग और सरकार के एक व्यावहारिक समूह को शामिल करने के लिए रणनीतिक पहल के संबंध में प्रस्ताव को अपनाया गया है। मिशन के कार्यान्वयन, निगरानी और उसके मार्गदर्शन के लिए मिशन प्रशासनिक बोर्ड तथा अन्तर-मंत्रालयी समन्वय समिति, वैज्ञानिक सलाहकार समिति और अन्य उप-समितियों के रूप में मजबूत तथा निगरानी प्रणाली तैयार होगी। केन्द्रों और टीटीआरपी के चार प्रमुख क्षेत्र हैं। इनके साथ मिशन का कार्यान्वयन चलेगा। यह चार क्षेत्र हैं
(i) प्रौद्योगिकी विकास,
(ii) मानव संसाधन विकास एवं कौशल विकास,
(iii) नवाचार, उद्यमिता एवं स्टार्ट-अप इको प्रणाली विकास
(iv) अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।
प्रभाव :
सीपीएस प्रौद्योगिकियों से राष्ट्र की वैज्ञानिक, अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी नवाचार क्षमताओं को नई धार मिलेगी। इसके अलावा वह सरकार के अन्य मिशनों को समर्थन देगी, औद्योगिक तथा आर्थिक प्रतिस्पर्धा का माहौल पैदा करेगी और एक वास्तविक रणनीतिक संसाधन के रूप में विकसित होगी। उभरते हुए विनियोग के आकार, प्रकार और जटिलता की वजह से आने वाले दिनों में नई प्रौद्योगिकियां लगातार विकसित होती रहेंगी। प्रस्तावित मिशन विकास का माध्यम बनेगा, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, पर्यावरण, कृषि, रणनीति आधारित सुरक्षा और औद्योगिक क्षेत्रों में राष्ट्रीय पहलों को लाभ होगा। इसके अलावा इंडस्ट्री 4.0, स्मार्ट सिटी, सतत विकास लक्ष्य इत्यादि को भी लाभ होगा। सीपीएस आने वाली प्रौद्योगिकियों की एक समग्र प्रणाली है, जो विकास की दौड़ में अन्य देशों के साथ मिलकर चलने को प्राथमिकता देती है। सीपीएस से समस्त कौशल आवश्यकताओं में आमूल परिवर्तन होगा। उद्योग/समाज की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उन्नत कुशलता और कुशल श्रमशक्ति के सृजन के द्वारा मिशन रोजगार अवसरों में इजाफा करेगा। नवाचार, उद्यमिता और स्टार्ट-अप इको प्रणाली प्रस्तावित एनएम-आईसीपीएस का अभिन्न हिस्सा हैं, जिसके मद्देनज़र स्टार्ट-अप से भी सीपीएस तथा संबंधित क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी आधारित रोजगार अवसर पैदा होंगे। इस तरह अल्पकालिक अवधि में लगभग 40,000 रोजगार और दीर्घकालिक अवधि में लगभग दो लाख रोजगार पैदा होंगे।
लाभ :
मिशन समाज के लाभ के लिए सीपीएस प्रौद्यगिकियों के कारगर इस्तेमाल करने के संबंध में केन्द्रीय मंत्रालयों/विभागों, राज्य सरकारों और उद्योगों को अपनी परियोजनाएं और योजनाएं चलाने में मदद करेगा।
राज्यों/जिलों का समावेश :
एनएम-आईसीपीएस एक अखिल भारतीय मिशन है और इसके दायरे में केन्द्रीय मंत्रालय, राज्य सरकार, उद्योग और अकादमिक जगत सहित पूरा भारत है।
पृष्ठभूमि :
सीपीएस और कृत्रिम बौद्धिकता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, बिग डेटा एनालिटिक्स, रोबोटिक्स, क्वांटम कम्यूटिंग, क्वांटम कम्यूनिकेशन, क्वांटम इंक्रिप्शन (क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन), डेटा साइंस, प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स, भौतिक अवसंरचना और अन्य अवसंरचना के लिए साइबर सुरक्षा सहित संबंधित प्रौद्योगिकियां बहुत आगे बढ़ चुकी हैं। वे सभी सेक्टरों में मानवी प्रयासों के लगभग हर क्षेत्र में परिवर्तन करने में अहम भूमिका निभा रही है। सरकार और उद्योग के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे प्रतिस्पर्धी बने रहने, सामाजिक विकास करने, रोजगार सृजन, आर्थिक विकास में तेजी लाने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने तथा पर्यावरण को कायम रखने के लिए इन उभरती हुई प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए तैयार रहें।
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