जिला कारागार सोनभद्र ---प्रशासनिक व्यवस्था का नमूना



गुरमा,(सोनभद्र) सोनभद्र का गुरमा में स्थित जिला कारागार प्रशासनिक लापरवाही के कारण अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है| जेल के अंदर तथा आसपास सुरक्षा मानकों का तो जैसे कोई मतलब ही नहीं है हर वक्त किसी घटित होने वाली अनहोनी घटना के इंतजार में है यह जिला कारागार|
गुरमा जेल की स्थापना सन 1956 में तत्कालीक मुख्यमंत्री श्री संपूर्णानंद द्वारा की गई थी ।तब के अविभाज्य उत्तर प्रदेश राज्य में दो खुली जेलें बनवाई गई थी जिसमें से एक गुरमा में स्थित वर्तमान सोनभद्र जिला कारागार है। उक्त समय में इसे संपूर्णानंद शिविर कारागार का नाम दिया गया था ।शिविर बंदीगृहकी शुरुआत परीक्षण के तौर पर 10 कैदियों से की गई थी। ज्ञात हो कि इस बंदी शिविर में सजायाफ्ता मुजरिमों को ही रखने का प्रावधान था ।धीरे-धीरे कैदियों की संख्या बढ़ते हुए लगभग 4,000 तक जा पहुंची। जेल के निकट सीमेंट कारपोरेशन द्वारा स्थापित चुर्क सीमेंट फैक्ट्री हेतु पत्थर तोड़ने का कार्य सश्रम कारावास की सजा पाए कैदियों द्वारा कराया जाता था, जिसके एवज में कैदियों को मजदूरी का भुगतान किया जाता था। उस समय 15 एकड़ में फैले हुए खुले जेल परिसर में कैदियों को टीन के अस्थाई शिविरों में रखा जाता था जिनके सुरक्षा की जिम्मेदारी पीएसी बल संभालती थी। पूरे जेल परिसर की सुरक्षा दीवार के नाम पर कटीले तारों की बाढ़ हुआ करती थी तमाम अपरिहार्य कारणों से उक्त बंदी शिविर को सन 1999 में बंद करना पड़ा क्योंकि तब तक चुर्क सीमेंट फैक्ट्री भी बंद हो चुकी थी जिस कारण कैदियों के लिए कोई कार्य भी नहीं था।
सन 1988 में मिर्जापुर से अलग होकर जनपद सोनभद्र अस्तित्व में आया ।नवसृजित जनपद सोनभद्र की तमाम सरकारी मशीनरी स्वतंत्र रुप से कार्य करने लगी किंतु सोनभद्र में कारावास की समुचित व्यवस्था ना होने के कारण कैदियों को मिर्जापुर जेल में ही रखा जाता था।तब से लेकर 2016 तक सोनभद्र के तमाम कैदियों को प्रतिदिन मिर्जापुर जेल से सुनवाई हेतु सोनभद्र जनपद मुख्यालय तक लाना व ले जाना पड़ता था। सोनभद्र जनपद मुख्यालय से मिर्जापुर जेल की दूरी लगभग 80 किलोमीटर है इस तरह प्रतिदिन 160 किलोमीटर का सफर कैदियों व सुरक्षाकर्मियों को उत्तर प्रदेश की शानदार नमूने जैसी सड़क पर करना पड़ता था जो कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी विचारणीय था। इस बात पर कई बार कैदियों ने हंगामा किया, भूख हड़ताल की चेतावनी तक देनी पड़ी ,तब जाकर भारी दबाव के बीच गुरमा स्थित पूर्व जेल परिसर की जमीन पर सन 2003 में सोनभद्र जिला कारागार का निर्माण शुरू हुआ जोकि कक्षप गति सेबनते-बनते 10 वर्षों की लंबी अवधि के पश्चात 2013 में बनकर तैयार हुआ। बिना किन्ही बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान दिए सितंबर 16 से कैदियों को गुरमा जिला कारागार में स्थानांतरित किया जाने लगा।
आज आलम यह है कि उक्त जेल में 33 सजायाफ्ता मुजरिमों सहित कुल 549 कैदी हैं। जेल की कुल 18 बैरकों में 549 कैदी मात्र 33 सुरक्षाकर्मियों की देखरेख में रखे गए हैं। जेल में सुरक्षा मानकों का सर्वथा अभाव है, आज इतनी उन्नत संचार व्यवस्था होने के बावजूद जेल परिसर किसी भी संचार व्यवस्था से पूरी तरह कटा हुआ है। ना ही बेसिक फोन है, ना ही बाकी टाकी, ना सायरन, ना कैमरे, ना बिजली की पर्याप्त व्यवस्था। जेल के चारों तरफ हाई मास्क लाइट तक नहीं है, जबकि जेल परिसर से सटी ऊंची पहाड़ियां जेल की सुरक्षा के लिए एक चिंता का विषय है। जेल के अंदर कैदियों को खाना प्लास्टिक के डिस्पोजेबल पत्तलों में दिया जाता है जो पर्यावरण के लिए सर्वथा हितकर नहीं है ।पेयजल नाम पर बोरिंग का लाल पानी ही उपलब्ध है जो कि स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक है यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं। अचंभा होता है कि बिना जेल सुरक्षा मानकों को पूरा किए, बिना किसी जेल मैनुअल के चल रहे सोनभद्र जिला कारागार में किसी अप्रिय घटना के होने पर आखिर जिम्मेदारी किसकी होगी क्या स्थानीय प्रशासन अपनी उदासीनता की वजह बता पायेगा।

मूलभूत सुविधाओं का अभाव ---कर्मचारियों में आक्रोश

बात करते हैं कर्मचारियों के आवासीय परिसर की। टूटे-फूटे आवास ,बजबजाती नालियां ,सूखे पत्तों व कूड़े से पटी पड़ी पूरी कॉलोनी ,कैसे रहते होंगे कर्मचारी सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। पीने तक के लिए पानी की व्यवस्था नहीं है जबकि महज 20 फीट की दूरी पर चुर्क नगर पंचायत द्वारा पेयजल की सप्लाई लाइन है। कर्मचारियों को पीने का पानी खरीदना पड़ता है तथा दैनिक किया हेतु हैंड पाइप के लाल पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है। पानी के अभाव में कॉलोनी परिसर के आवासों के शौचालय वर्षों से जाम पड़े हैं नतीजन कर्मचारियों को शौचादि के लिए बोतल में पानी लेकर जंगलों में जाना पड़ता है।

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