नई दिल्ली, 29 अगस्त 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
॥■॥ भारत और मोरक्को के बीच हवाई सेवाओं के समझौते को मंत्रिमंडल की मंजूरी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत और मोरक्को के बीच हवाई सेवाओं के लिए संशोधित समझौते पर हस्ताक्षर की अनुमति दे दी है। नए समझौते के प्रभावी होने के साथ ही दिसंबर 2004 में किया गया मौजूदा समझौता स्वत: निष्प्रभावी हो जाएगा।
• लाभ:
नया समझौता नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में भारत और मोरक्को के बीच सहयोग के मील का पत्थर साबित होगा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार निवेश, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलेगा। यह समझौता व्यापक सुरक्षा और संरक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही दोनों देशों की विमान सेवाओं के लिए व्यापारिक संभावनाएं उपलब्ध कराएगा और निर्बाध हवाई संपर्क के लिए अनुकूल वातावरण भी तैयार करेगा।
• विवरण:
समझौते की प्रमुख विशेषताएं:-
दोनों देशों की विमानन कंपनियां विभिन्न तरह की सेवाओं के लिए कोड शेयरिंग कर सकती हैं।
प्रत्येक पक्ष की निर्दिष्ट एयर लाइन विपणन के लिए परस्पर करार कर सकती हैं। वे दूसरे पक्ष या तीसरी पार्टी के साथ भी ऐसा समझौता कर सकती हैं।
समझौते के जरिए दोनों देशों की कोई भी निर्दिष्ट एयर लाइन हवाई सेवाओं की बिक्री और विज्ञापन के लिए एक दूसरे के यहां अपने कार्यालय खोल सकती हैं।
एएसए द्वारा निर्धारित मार्गों पर चिन्हित छह स्थानों से दोनों देशों की एयर लाइनें एक दूसरे के यहां जितनी संख्या में चाहे सेवाएं दे सकती हैं। इस व्यवस्था के तहत भारत की निर्दिष्ट एयर लाइनें मोरक्को के कासाब्लांका, रबात, माराकेश, अगादीर, तांगीर और फेज से आने जाने के लिए अपनी सेवाएं दे सकती हैं। इसी तरह मोरक्को की निर्दिष्ट एयर लाइनेंनई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलूरू और हैदराबाद आने जाने के लिए अपनी सेवाएं उपलब्ध करा सकती हैं।
हवाई सेवा समझौते में विमान सेवाओं के संचालन की अनुमति, संचालन नियमों, व्यवासायिक संभावनाओं तथा सुरक्षा और संरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं को निलंबित करने या खत्म करने की भी व्यवस्था है।
• पृष्ठभूमि:-
नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में बढ़ते अवसरों तथा दोनों देशों के बीच हवाई सेवाओं को आधुनिक और निर्बाध बनाने के उद्देश्य से मौजूदा हवाई सेवा समझौते में संशोधन किया जा रहा है।
भारत और मोरक्को के बीच मौजूदा हवाई सेवा समझौता 2004 में किया गया था। इसमें निर्दिष्ट एयर लाइनों की सुरक्षा, संरक्षा और वाणिज्यिक गतिविधियों से जुड़े प्रावधानों में समय के अनुरूप बदलाव की व्यवस्था नहीं थी।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने भारत और ब्रिटेन तथा उत्तरी आयरलैंड के बीच पशु-पालन, डेरी उद्योग और मत्स्य-पालन के क्षेत्रों में सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत और ब्रिटेन तथा उत्तरी आयरलैंड के बीच पशु-पालन, डेरी उद्योग और मत्स्य-पालन के क्षेत्रों में सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन को मंजूरी दे दी है। 17.04.2018 को समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
समझौता ज्ञापन का उद्देश्य भारतीय मवेशियों और मत्स्य-पालन का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से पशु-पालन, डेरी उद्योग और मत्स्य-पालन के क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग विकसित करना है।
• प्रभाव:
इस साझेदारी से घरेलू उद्योग और निर्यात के लिए डेरी, मत्स्य पालन और पशु उत्पादों को बढ़ाकर मवेशियों के स्वास्थ्य, उनके पालन-पोषण और मत्स्य-पालन के क्षेत्र में सुधार की उम्मीद है। समझौता ज्ञापन पशु-पालन, मत्स्य-पालन और डेरी उद्योग पर निम्नलिखित के जरिए परामर्श और सहयोग को बढ़ावा देगा:
पशु-पालन, मत्स्य-पालन और संबंधित मामलों में आपसी हित से जुड़े मामले
मवेशियों के स्वास्थ्य और पशु-पालन, पालन-पोषण, डेरी और मत्स्य-पालन में सहयोग
मवेशियों की उत्पादकता और उत्पादन बढ़ाने के लिए कमी वाले क्षेत्रों में भोजन और चारे को पोषण की दृष्टि से समृद्ध बनाने और उसकी बड़ी मात्रा में ढुलाई का प्रबंधन और व्यवस्था
मवेशियों, पशु-पालन और पशु उत्पादों के व्यापार से जुड़े मामलों में स्वच्छता
पशुओं के चारे की फसलों के साथ उच्च तकनीक वाले चारे के पेड़ों की प्रजातियों की नर्सरियां विकसित करना और सूखे वाले क्षेत्रों में नमी वाली मिट्टी के संरक्षण सहित एकीकृत कृषि प्रणाली के अंतर्गत चारे वाले पेड़ों की प्रजातियों के पौधा-रोपण के लिए कृषि वनों को बढ़ावा
अध्ययन दौरों/परस्पर सहमति वाले क्षेत्रों में परीक्षण के लिए वैज्ञानिकों के आदान-प्रदान के क्षेत्र
सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के इस्तेमाल सहित नवोन्मेष कृषि विस्तार दृष्टिकोण के संबंध में विभिन्न विषयों की जानकारी के लिए संयुक्त अनुसंधान के लिए सहयोग
संयुक्त हित वाला अन्य कोई मुद्दा
प्रत्येक पक्ष के प्रतिनिधियों को मिलाकर एक संयुक्त कार्य दल गठित किया जा सकता है ताकि संयुक्त कार्यक्रम बनाये जा सकें और सहयोग तथा विचार-विमर्श किया जा सके।
• पृष्ठभूमि:
पशुपालन, डेरीऔर मत्स्य पालन के क्षेत्रों में सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन पर भारत और ब्रिटेन तथा उत्तरी आयरलैंड के बीच अप्रैल 2018 में हस्ताक्षर किए गये थे। भारत की ओर से कृषि और कृषि कल्याण मंत्रालय में पशु-पालन, डेरी और मत्स्य-पालन विभाग के प्रतिनिधियों और ब्रिटेन तथा उत्तरी आयरलैंड की ओर से पर्यावरण, खाद्य और ग्रामीण मामलों के विभाग के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए।
॥■॥ मंत्रिमंडल को रेल के क्षेत्र में सहयोग पर भारत और कोरिया के बीच समझौता ज्ञापन के बारे में जानकारी दी गई
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्रीय मंत्रिमंडल को रेल के क्षेत्र में वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग को सुदृढ़ करने तथा बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान डिजाइन एवं मानक संगठन (आरडीएसओ), भारत और कोरिया रेलरोड रिसर्च इंस्टिट्यूट (केआरआरआई) के बीच सहयोग पर समझौता ज्ञापन (एमओयू) के बारे में जानकारी दी गई है। इस समझौता ज्ञापन पर 10 जुलाई, 2018 को हस्ताक्षर किया गया था।
• प्रभावः
यह एमओयू भारतीय रेल के लिए कोरियाई रेल के साथ मिलकर रेल क्षेत्र में नवीनतम प्रगतियों एवं ज्ञान साझा करने तथा परस्पर संवाद का एक मंच उपलब्ध कराएगा। यह ज्ञान साझा करने के लिए विशिष्ट प्रौद्योगिकी क्षेत्रों एवं अन्य परस्पर संवादों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए तकनीकी विशेषज्ञों, रिपोर्टों एवं तकनीकी दस्तावेजों के विनिमय, प्रशिक्षण एवं संगोष्ठियों एवं कार्यशालाओं के आदान-प्रदान को सुगम बनाएगा।
• विवरणः
इस समझौता ज्ञापन के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों में ध्यान केन्द्रित दृष्टिकोण के साथ सहयोग की एक संरचना उपलब्ध कराएगाः-
परस्पर आपसी हितों के लिए संयुक्त अनुसंधान का योजना निर्माण एवं निष्पादन;
भारत में नवीनतम रेल अनुसंधान एवं विकास सुविधाओं की स्थापना में सहयोग;
तकनीकी संगोष्ठी या फोरम का योजना निर्माण एवं निष्पादन;
केआरआरआई द्वारा आरडीएसओ कर्मियों के लिए अल्पकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम;
विशिष्ट परियोजनाओं के लिए सीमित अवधि हेतु केआरआरआई और आरडीएसओ के बीच कर्मियों का विनिमय कार्यक्रम;
दोनों देशों के रेल उद्योग के विकास के लिए परामर्श; एवं
सहयोग कार्यकलापों का कोई दूसरा रूप जिस पर दोनों पक्षों द्वारा सहमति हो।
• पृष्ठभूमि
रेल मंत्रालय ने विभिन्न देशों की सरकारों तथा राष्ट्रीय रेलों के साथ रेल क्षेत्र में तकनीकी सहयोग के लिए समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। सहयोग के चिह्नित क्षेत्रों में हाई स्पीड कॉरिडोर, वर्तमान रूटों में गति में बढ़ोत्तरी करना, विश्व स्तरीय स्टेशनों का विकास, हेवी हॉल ऑपरेशंस एवं रेल अवसंरचना का आधुनिकीकरण आदि शामिल हैं। यह सहयोग रेल प्रौद्योगिकी एवं परिचालनों के क्षेत्र में प्रगतियों, ज्ञान साझा करने, तकनीकी दौरों, आपसी हित के क्षेत्रों में प्रशिक्षण एवं संगोष्ठी और कार्यशालाओं पर सूचना के आदान-प्रदान के जरिए अर्जित किया जाता है।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने भारतीय डाक भुगतान बैंक की स्थापना के लिए संशोधित लागत अनुमान को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय डाक भुगतान बैंक (आईपीपीबी) की स्थापना के लिए परियोजना खर्च 800 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1,435 करोड़ रुपये करने संबंधी संशोधन को मंजूरी दे दी है। संशोधित लागत अनुमानों में 635 करोड़ रुपये की अतिरिक्त धनराशि में से चार सौ करोड़ रुपये प्रौद्योगिकी खर्च के लिए और 235 करोड़ रुपये मानव संसाधन पर खर्च के लिए होंगे।
• विवरण:
आईपीपीबी सेवाएं 1 सितम्बर, 2018 से 650 आईपीपीबी शाखाओं और 3250 अभिगम इकाइयों और दिसम्बर 2018 तक सभी 1.55 लाख डाकघरों (अधिगम इकाइयों) में उपलब्ध होंगी।
इस परियोजना से करीब 3500 कुशल बैंकिंग पेशवरों और देशभर में वित्तीय साक्षरता का प्रसार करने के कार्य में लगे अन्य लोगों के लिए रोजगार के नये अवसर सृजित करेगी।
परियोजना का उद्देश्य आम आदमी के लिए आसानी से पहुंचने, वहन करने योग्य और विश्वसनीय बैंक का निर्माण करना, जहां बैंक नहीं है वहां इस बाधा को समाप्त करके वित्तीय समावेशन की दिशा में आगे बढ़ना और दरवाजे तक बैंकिंग सहायता के जरिए कम बैंकों वाली आबादी के वैकल्पिक खर्च को कम करना है।
यह परियोजना सरकार की ‘कम नगदी’ वाली अर्थव्यवस्था की कल्पना को पूरा करेगी और साथ ही आर्थिक वृद्धि और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देगी।
आईपीपीबी की जबरदस्त आईटी रूपरेखा बैंक ग्रेड प्रदर्शन, धोखाधड़ी और जोखिम कम करने के मानकों तथा भुगतान और बैंकिंग क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है।
• आईपीपीबी सेवाएं :
आईपीपीबी अपने प्रौद्योगिकी सक्षम समाधानों के जरिए भुगतान/वित्तीय सेवाएं प्रदान करेंगी जिन्हें डाक विभाग द्वारा कर्मचारियों/अंतिम मील के एजेंटों तक पहुंचाया जा सकेगा, ताकि वे डाकिएं के स्थान पर वित्तीय सेवाओं के अग्रदूत बन सके।
आईपीपीबी अपने अंतिम मील एजेंट (डाक कर्मचारी और ग्रामीण डाक सेवकों) को आईपीपीबी सेवाएं प्रदान करने के लिए सीधे उनके खाते में प्रोत्साहन/कमीशन का भुगतान करेंगी, ताकि वे ग्राहकों को आईपीपीबी डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित कर सकें।
डाक घरों के साधनों को बढ़ाने के लिए आईपीपीबी द्वारा भुगतान किए गए कमीशन के एक हिस्से का डाक विभाग द्वारा इस्तेमाल किया जाएगा।
॥■॥ मंत्रिमंडल ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की व्यापक योजना ‘महासागरीयसेवाओं, प्रौद्योगिकी, निगरानी, संसाधन प्रतिरूपण और विज्ञान (ओ-स्मार्ट)’को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने व्यापक योजना ‘महासागरीय सेवाओं, प्रौद्योगिकी, निगरानी, संसाधन प्रतिरूपण और विज्ञान(ओ-स्मार्ट)’ को अपनी मंजूरी दे दीहै। 1623 करोड़ रुपये की कुल लागत की यह योजना 2017-18 से 2019-20 की अवधि के दौरानलागू रहेगी। इस येाजना में महासागर विकास से जुड़ी 16 उप-परियोजनाओं जैसे – सेवाएं, प्रौद्योगिकी, संसाधन, प्रेषण और विज्ञान कोशामिल किया गया है।
• प्रभाव:
ओ-स्मार्ट के अंतर्गत दी जाने वाली सेवाओं से तटीय और महासागरीय क्षेत्रों के अनेक क्षेत्रों जैसे – मत्स्य पालन, समुद्र तटीय उद्योग, तटीय राज्यों, रक्षा, नौवहन, बंदरगाहों आदि को आर्थिक लाभ मिलेगा। वर्तमान में पांच लाख मछुआरों को मोबाइल के जरिए रोजाना सूचना मिलती है, जिसमें मछली मिलने की संभावनाएं और समुद्र तट में स्थानीय मौसम की स्थिति की जानकारी शामिल है। इससे मछुआरों का तलाशी वाला समय बचेगा जिसके परिणाम स्वरूप ईंधन की बचत होगी।
ओ-स्मार्ट के कार्यान्वयन से सतत विकास लक्ष्य -14 से जुड़े मुद्दों के समाधान में मदद मिलेगी, जिनका उद्देश्य महासागरों के इस्तेमाल, निरंतर विकास के समुद्री संसाधनों का संरक्षण करना है। यह योजना (ओ-स्मार्ट) नीली अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक वैज्ञानिक और तकनीकी पृष्ठभूमि प्रदान करेगी।
ओ-स्मार्ट योजना के अंतर्गत स्थापित आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियां, सुनामी, झंझावात जैसी समुद्री आपदाओं से प्रभावी तरीके से निपटने में मदद करेंगी।
इस योजना के अंतर्गत विकसित प्रौद्योगिकियां भारत के आस-पास के समुद्रों से विशाल समुद्री सजीव और निर्जीव संसाधनों को उपयोग में लाने में मदद करेंगी।
• विवरण
महासागरीय क्षेत्र में राष्ट्रीय हितों और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं वालीबहु-विषयक योजनाओं के कार्यान्वयन के महत्व को पहचानते हुए मंत्रालय ने व्यापक योजना (ओ-स्मार्ट) के एक हिस्से के रूप में वर्तमान योजनाओं को केन्द्र में रखकर विशेष रूप से जारी रखने का प्रस्ताव रखा है। चूंकि भविष्य की मांगों को पूरा करने के लिए जमीन पर पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, भारत भी सतत तरीके से विशाल महासागरीय संसाधनों के उपयोगी और प्रभावशाली इस्तेमाल के लिए नीली अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे रहा है, जिसके लिए महासागर विज्ञान के बारे में जानकारी, प्रौद्योगिकी के विकास और सेवाएं प्रदान करने की आवश्यकता होगी। साथ ही दीर्घकालिक विकास के लिए महासागरीय, समुद्री और समुद्री संसाधनों के संरक्षण और उसके स्थायी इस्तेमाल के लिए संयुक्त राष्ट्र स्थायी विकास लक्ष्य-14 को हासिल करने के संदर्भ में तटवर्ती अनुसंधान और समुद्री जैव विविधता वाली गतिविधियां जारी रखना जरूरी है। इसे (ओ-स्मार्ट) योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है। योजना के अंतर्गत दी जाने वाली और विकसित महासागरीय परामर्श सेवाएं और प्रौद्योगिकियां दर्जनों क्षेत्रों की विकास गतिविधियों, भारत के तटवर्ती राज्यों सहित समुद्र तट के परिवेश के कामकाजमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ हीजीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इसके अलावा महासागरीय आपदाओं जैसे सुनामी, झंझावात आदि के लिए स्थापित आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियां भी भारत और हिंद महासागर के देशों को 24 घंटे सेवाएं प्रदान कर रही हैं, जिसे यूनेस्को द्वारा मान्यता दी गई है।
अगले दो वर्षों के दौरान विचार किये जाने वाले महत्वपूर्ण विषयों में शामिल हैं।
(i) महासागरीय निगरानी और प्रतिरूपण में वृद्धि
(ii) मछुआरों के लिए महासागरीय सेवाओं में वृद्धि
(iii) 2018 में समुद्र तटीय प्रदूषण की निगरानी के लिए समुद्र तट पर वेधशालाओं की स्थापना
(iv) कावारात्ती में महासागर ताप ऊर्जा परिवर्तन संयंत्र (ओटीईसी) की स्थापना
(v) तटीय अनुसंधान के लिए दो तटीय अनुसंधान पोतों का अधिग्रहण
(vi) महासागरीय सर्वेक्षण जारी रखना और खनिज तथा सजीव संसाधनों का अन्वेषण
(vii) गहरे समुद्र में खनन- गहरी खनन प्रणाली के लिएप्रौद्योगिकी विकसित करना
(viii) मानव युक्त पनडुब्बियां और
(ix) लक्षद्वीप में छह विलवणीकरण संयंत्रों की स्थापना।
• पृष्ठभूमि
नवम्बर, 1982 में बनाई गई महासागरीय नीति के विवरण के अनुसार मंत्रालय
(i) महासागर सूचना सेवाओं का समूह प्रदान करने
(ii) समुद्री संसाधनों को निरंतर उपायोग में लाने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित करने
(iii) अग्रिम श्रेणी के अनुसंधान को बढ़ावा देने और
(iv) महासागरीय वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने के लिए महासागर विकास के क्षेत्र में अनेक बहुविषयक परियोजनाओंको लागू कर रहा है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के कार्यक्रमों/नीतियों को उसके स्वायत्ताशासी संस्थानों यानी राष्ट्रीय महासागरीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय राष्ट्रीय महासागरीय सूचना सेवा केन्द्र, राष्ट्रीय अंटार्कटिक और महासागरीय अनुसंधान केन्द्र, तथा संबद्ध कार्यालय, समुद्र तट सजीव संसाधन और पारिस्थितिकी केन्द्र, राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केन्द्र और अन्य राष्ट्रीय संस्थानों के जरिए लागू किया जा रहा है। आवश्यक अनुसंधान सहायता प्रदान करने के लिए अनुसंधान पोतों का बेड़ा यानी प्रौद्योगिकी प्रदर्शन करने वाले पोत सागरनिधि, समुद्र विज्ञानअनुसंधानपोत सागर कन्या, मत्स्य पालन और समुद्र विज्ञान अनुसंधान पोत सागर संपदा तथा तटीय अनुसंधान पोत सागर पूर्वी को प्राप्त किया गया है।
अवधि के दौरान, विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत अनेक प्रमुख उपलब्धियां प्राप्त की गई हैं, जिनमें पीएमएन के अन्वेषण के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण (आईएसबीए) द्वारा आवंटित हिन्द महासागर के केन्द्र में 75000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में पोली-मेटेलिक नोडयूल्स (पीएमएन) के गहरे समुद्र में खनन के बारे में पथ प्रदर्शक दर्जा प्रदान करना, हाईड्रो थरमल सल्फाइड के अन्वेषण के लिए हिंद महासागर में 10,000 किलोमीटर आवंटन शामिल है। मंत्रालय विभिन्न तटीय साझेदारों जैसे मछुआरों, तटीय राज्यों, अपतटीय उद्योग, नौसेना, तटरक्षक आदि को समुद्र से जुड़ी अनेक सूचना सेवाएं प्रदान कर रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र के पड़ोसी देशों को इनमें से कुछ सेवाएं दी गई हैं। भारत की महासागर सम्बन्धी गतिविधियों का विस्तार अब आर्कटिक से अंटार्कटिक क्षेत्र तक हो गया है, जिसमें बड़ा महासागरीय क्षेत्र शामिल है, जिस पर यथास्थान व्यापक क्षेत्र में और उपग्रह आधारित वेधशालाओं के जरिए निगरानी रखी जा रही है। भारत ने समुद्री आपदाओं जैसे सुनामी, समुद्री तूफान, झंझावातआदि के लिए आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियां स्थापित की हैं। भारत अंटार्कटिक संधि प्रणाली पर हस्ताक्षर कर चुका है और संसाधनों के उपयोग के लिए अंटार्कटिक समुद्र तटीयआजीविका संसाधन के संरक्षण आयोग (सीसीएएमएलआर) में शामिल हो चुका है। महासागरीय संसाधनों के इस्तेमाल की प्रौद्योगिकियों का विकास विभिन्न चरणों में है। इनमें से कुछ जैसे द्वीपों के लिए कम तापमान वाली तापीय विलवणीकरण प्रणाली काम कर रही है। इसके अलावा मंत्रालय तटरेखा में बदलावों और समुद्र तटीय पारिस्थितिकी प्रणाली सहित भारत के तटीय जल की सेहत की निगरानी कर रहा है। अन्य जैसे दूर से संचालित पनडुब्बी और मृदा परीक्षक, दोनों 6000 मीटर पानी की गहराई तक कार्य करने में सक्षम हैं, कम गहरी खनन प्रणाली जैसी कुछ अग्रणी प्रौद्योगिकियां विकसित की गई हैं।
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