नई दिल्ली, 24 मार्च 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
(●) स्वास्थ्य सेवाओं के लिए स्मार्ट कार्ड
छत्तीसगढ़ सरकार अपनी राज्य स्कीम अर्थात मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना (एमएसबीवाई) सहित एक केंद्रीय प्रायोजित स्कीम राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) कार्यान्वित कर रही है। आरएसबीवाई के तहत, बीपीएल परिवारों तथा असंगठित मजूदरों की 11 अन्य परिभाषित श्रेणियों को शामिल किया गया हे। आरएसबीवाई में जिन परिवारों को नहीं लिया गया है, उन्हें एमएसबीवाई के अंतर्गत शामिल किया गया है। एमएसबीवाई में नामांकित लाभार्थी 50,000/- रुपए के स्वास्थ्य बीमा कवर के हकदार हैं। आरएसबीवाई लाभार्थियों को एमएसबीवाई के अंतर्गत 20,000/- रुपए अतिरिक्त कवर प्रदान किया गया है। 24 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों, नामत: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिसा, महराष्ट्र, गोवा, केरल, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय, छत्तीसगढ़, दादरा एव नगर हवेली, दमन एवं द्वीप, राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, पुदुचेरी, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम अपनी स्वयं की स्कीमें कार्यान्वित कर रहे हैं। इनमें से अधिकतर स्कीम 30,000/- रुपए से लेकर 3 लाख रुपए तक की तृतीयक परिचर्या हेतु बीमा कवर प्रदान करती हैं।
वर्ष 2018-19 के बजट में, सरकार ने द्वितीय तथा तृतीयक परिचर्या हेतु अस्पताल में भर्ती कराने के लिए प्रतिवर्ष प्रति परिवार 5 लाख रुपए तक का कवर प्रदान करते हुए लगभग 10 करोड़ निर्धन तथा वंछित परिवारों (लगभग 50 करोड़ लाभार्थी) को शामिल करने के लिए एक प्रमुख राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा स्कीम (एनएचपीएस) शुरू करने की घोषणा की है। एक बार एनएचपीएस के शुरू होने के बाद, आरएसबीवाई को इसी में शामिल कर लिया जाएगा। प्रस्तावित एनएचपीएस एक अखिल भारतीय स्कीम है तथा सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के पास इसमें शामिल होने का विकल्प है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के द्वारा लोकसभा में लिखित में उत्तर दिया गया।
(●) सरकारी अस्पतालों का कार्यकरण
भारत सरकार ने देश में सरकारी अस्पतालों के कामकाज का मूल्यांकन करने के लिए कोई विशिष्ट सर्वेक्षण नहीं करवाया है। तथापि, अस्पतालों का कामकाज का मूल्यांकन करना एक नियमित सतत् प्रक्रिया है और पर्यवेक्षी प्राधिकारी नियमित रूप से इनके कामकाज की मॉनीटरिंग करते हैं।
डॉक्टरों की कमी की वजह से अस्पताल के विभिन्न विभागों में रोगी की प्रतीक्षा-सूची के संबंध में रोगियों से मंत्रालय में विभिन्न प्रकार की शिकायतें मिलती हैं। ऐसी शिकायतों को केन्द्र और राज्य सरकार, दोनों स्तरों पर संबद्ध प्राधिकारियों को भेजा जाता है, ताकि शिकायतों का निपटान किया जा सके।
केन्द्र सरकार के अस्पतालों और संस्थानों में उपचार के लिए आने वाले रोगियों की संख्या बिस्तरों की संख्या, कार्मिक शक्ति की संख्या और डॉक्टरों एवं अन्य संसाधनों के संदर्भ में उनकी निपटान क्षमता की अपेक्षा कहीं ज्यादा है। इन अस्पतालों और संस्थानों में व्यापक अवसंरचना और अन्य सेवाओं की उपलब्धता होने के बावजूद अवसंरचना और डॉक्टरों सहित उपलब्ध कार्मिक शक्ति पर दिनों-दिन बढ़ते हुए बोझ की वजह से कतिपय प्रक्रियाओं के लिए प्रतीक्षा अवधि है, जो इन अस्पतालों में विभाग-दर-विभाग भिन्न-भिन्न है। अत: विभिन्न विभाग रोगियों की स्थिति, अपेक्षित उपचार की तात्कालिकता और किसी दिवस विशेष को उपलब्ध बिस्तरों पर विचार करके दाखिले की आवश्यकता वाले रोगियों की अपनी खुद की प्रतीक्षा-सूची बनाते हैं। तथापि, बहिरंग रोगी विभाग (ओपीडी) में पंजीकृत सभी रोगियों को उस दिवस विशेष को डॉक्टरों द्वारा उपचार प्रदान किया जाता है।
रोगियों के प्रभावी शिकायत निपटान के लिए प्रत्येक अस्पताल में एक शिकायत निवारण अधिकारी नामोद्दिष्ट है। इसके अतिरिक्त, रोगी और उनके संबंधियों से शिकायतें लेने के लिए अस्पतालों की विशेष जगहों पर अनेक शिकायत पेटिकाएं लगाई गई हैं।
डॉक्टरों के मामले में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा अनुमानित रिक्तियों के आधार परप्रतिवर्ष संघ लोक सेवा आयोग द्वारा केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा के जीडीएमओ उप संवर्ग के चिकित्सा अधिकारियों की भर्ती के लिए संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा आयोजित की जाती हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा के विशेषज्ञ संवर्ग के रिक्त पदों को भरने के लिए मांग सूची संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को भी भेजी जाती है। यूपीएससी से प्राप्त सिफारिशों के आधार पर अभ्यर्थियों को नियुक्ति का प्रस्ताव दिया जाता है। यूपीएससी की सिफारिश के लंबित रहने तक संबंधित यूनिटों को पद पर अभ्यर्थी द्वारा नियमित आधार पर कार्यभार ग्रहण करने तक जनहित में कामचलाऊ व्यवस्था के रूप में रिक्त पदों पर संविदात्मक नियुक्तियां करने की अनुमति दी जाती है।
चूंकि ‘स्वास्थ्य’ राज्य का विषय है, अत: लोगों को पर्याप्त स्वास्थ्य परिचर्या सेवाएं प्रदान करने हेतु प्रयास करने का उत्तरदायित्व राज्य सरकार का है। केन्द्र सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना आदि जैसी योजनाओं/कार्यक्रमों के जरिए राज्य सरकार को सहायता प्रदान करके उनके प्रयासों में मदद करती है।
राज्य सरकारी स्वास्थ्य परिचर्या सुविधा केन्द्रों में अपेक्षित चिकित्सा अधिकारियों और विशेषज्ञों को नियुक्त करने के लिए अपने स्वयं के उपाय करती है और कार्यविधि कार्यान्वित करती है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के द्वारा लोकसभा में लिखित में उत्तर दिया गया।
(●) संतुलित आहार
राष्ट्रीय पोषण निगरानी बोर्ड की रिपोर्ट 2012 के अनुसार, अनाज और बाजरा ग्रामीण भारतीय आबादी के भोजन के प्रमुख भाग हैं। सामान्य रूप से, ग्रामीण आबादी अपर्याप्त आहार पर आधारित होती है क्योंकि जड़ों और कंदों को छोड़कर सभी खाद्य समूहों के कम ग्रहण के रूप में भारतीयों के लिए अनुशंसित आहार के सेवन (आरडीआई) से कम है।
संतुलित आहार से वंचित देश की आबादी की प्रतिशतता संबंधी कोई विशेष डेटा नहीं है।
कमजोर आयु वर्ग जैसे 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों, किशोरों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को संतुलित आहार प्रदान करने के लिए, सरकार ने अंब्रेला आईसीडीएस योजना की आंगनवाड़ी सेवाओं के तहत पूरक पोषण कार्यक्रम (एसएनपी) के माध्यम से पूरक पोषण के प्रावधान किए हैं।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की अनुसूची-II के तहत इस योजना के अंतर्गत बच्चों और गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए दैनिक पोषण पात्रता का विवरण इस प्रकार है:
क्र.सं.
श्रेणी
भोजन का प्रकार
कैलोरी(केसीएएल)
प्रोटीन (ग्राम)
1.
बच्चें (6 माह से 3 साल की आयु तक)
घर ले जाने हेतु राशन
500
12-15
2.
बच्चें (3 साल से 6 साल की आयु तक)
सुबह की नमकीन और पकाया हुआ गर्म भोजन
500
12-15
3.
बच्चें (6 माह से 6 साल की आयु तक) जो कुपोषित हैं
घर ले जाने हेतु राशन
800
20-25
4.
गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली माताएं
घर ले जाने हेतु राशन
600
18-20
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा निर्धारित भारतीयों के लिए अनुशंसित आहार भत्ते और राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आधार पर आबादी द्वारा औसत आहार सेवन के बीच अंतर को पाटने के लिए आंगनवाड़ी सेवा योजना के अंतर्गत अनुपूरक पोषण प्रदान किया जाता है। तदनुसार, इस अंतर को पाटने के लिए इस कार्यक्रम के तहत पोषण मानदंड तैयार किए जाते हैं।
जनसंख्या स्तर पर संतुलित आहार की अपर्याप्त उपभोग का कारण उपलब्धता की कमी के साथ ही संतुलित आहार के महत्व के बारे में जानकारी की कमी है।
सरकार पौष्टिक और संतुलित आहार के उपभोग के महत्व के बारे में समुदाय की जागरूकता बढ़ाने के लिए मासिक ग्राम स्वास्थ्य और पोषण दिवस आयोजित कर रही है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के द्वारा लोकसभा में लिखित में उत्तर दिया गया।
(●) मूल कोशिका का उपचार
भारत में मूल कोशिका उपचार अभी भी अनुसंधान मोड के अधीन है और सरकार विभिन्न आधारभूत नैदानिक पूर्व तथा क्लीनिक अनुसंधानों को सहायता प्रदान कर रही है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने वर्ष 2002 में ‘मूल कोशिका अनुसंधान के लिए मसौदा दिशानिर्देश/विनियम’ जारी किए थे जिन पर जैव प्रौद्योगिकी विभाग में व्यापक स्तर पर कार्य किया गया है जिसके परिणामस्वरूप मूल कोशिका अनुसंधान एवं थेरेपी के लिए दिशानिर्देश (2007) जारी किए गए थे। सभी पणधारकों से प्राप्त सूचना और परामर्श को सम्मिलित करके मसौदा दिशानिर्देश को ‘’नेशनल गाईडलाईंस फॉर स्टेम सेल रिसर्च (एनजीएससीआर)-2013’’ के तौर पर अंतिम रूप से तैयार किया गया है। यह दस्तावेज इस क्षेत्र में कार्य कर रहे चिकित्सकों और वैज्ञानिकों को वैज्ञानिक तौर पर उत्तरादायी और शिष्टाचार में संवेदनशील तरीके से अनुसंधान करने के लिए मार्ग दर्शन करता है। वर्ष 2013 के दस्तावेज में हाल ही में किए गए संशोधनों को सम्मिलित करके तथा मौजूदा नियमों और विनियमों के सम्मिश्रण के साथ संशोधन किया गया है। इस दस्तावेज को 11 अक्तूबर, 2017 को जारी किया गया। इन दिशानिर्देशों के बारे में जागरूकता पैदा करने तथा सभी पणधारकों को शिक्षित करने के लिए देश के विभिन्न भागों में संवितरण कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। मूल कोशिका अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश-2017 के अनुसार केवल रक्त संबंधी विकारों (रक्त कैंसर और थैलिसिमिया सहित) के लिए बोन मैरो/हेमारोपोइटिक मूल कोशिका प्रत्यायोजन के लिए मूल कोशिका के उपयोग की मंजूरी दी गई है, अन्य सभी शर्तों की अनुपालना केवल मूल कोशिका अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश-2017 के अनुरूप नैदानिक परीक्षणों के कार्यक्षेत्र के अधीन की जानी है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली हेमाटोलॉजी पेइडियाट्रिक ऑनकोलॉजी, मेडिकल ऑनकोलोजी विभाग, इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हास्पीटल (आईआरसीएच) और स्टेम सेल फैसिलिटी जैसे विभिन्न विभागों के जरिए कैंसर और थैलिसिमिया के रोगियों के लिए मूल कोशिका इलाज की व्यवस्था कर रहा है।
टाटा मेमोरियल सेंटर, मुंबई जैसे अन्य अस्पताल भी मूल कोशिका इलाज उपलब्ध करवा रहे हैं।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल के द्वारा लोकसभा में लिखित में उत्तर दिया गया।
(●) चिकित्सा उपकरण जांच प्रयोगशालाओं की स्थापना
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 एवं उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के प्रावधानों से अंतर्गत चिकित्सा यंत्रों की 15 अधिसूचित श्रेणियों को विनियमित करता है। तथापि, चिकित्सा उपस्कर को औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 की धारा 3(ख) (iv) के अंतर्गत चिकित्सा यंत्र के रूप में अधिसूचित नहीं किया जाता है।
औषधि तकनीकी परामर्श बोर्ड (डीटीएबी) की 12 फरवरी, 2018 को आयोजित 78वीं बैठक में बोर्ड अल्ट्रासाउंड उपस्करों तथा समतुल्य इमेजिंग उपस्करों को इनके आयात, विनिर्माण, वितरण एवं विक्रय को विनियमित करने के उद्देश्य से चिकित्सा यंत्र के रूप में औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 की धारा 3(ख) (iv) की सीमा में लाने के लिए सहमत हो गया है।
चिकित्सा यंत्र नियमावली, 2017 के अनुसार केंद्र सरकार चिकित्सा यंत्रों की जांच एवं मूल्यांकन करने की सुविधा वाली किसी भी प्रयोगशाला को केंद्रीय चिकित्सा यंत्र परीक्षण प्रयोगशाला के रूप में नामित कर सकती है। इस संबंध में सीडीएससीओ ने राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशाकंन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएल) प्रत्यायित प्रयोगशालाओं जिनकी इन विट्रो नैदानिक सहित चिकित्सा यत्रों के परीक्षण एवं मूल्यांकन की क्षमता तथा सामर्थ्य है, से सीडीएससीओ में पंजीकरण कराने और अपने कार्यों के विवरण की सूचना देने के लिए 1.3.2018 को अनुरोध किया है।
यह उल्लेखनीय है कि चिकित्सा उपस्कर/सामान्य वैज्ञानिक सुविधाओं आदि के लिए परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित करने हेतु पहले की निर्यात अवसंरचना विकास योजना के लिए राज्यों को सहायता एवं वर्तमान निर्यात व्यापार अवसंरचना योजना के अंतर्गत वित्त वर्ष 2015-16 से निधि अनुमोदित/संवितरित की गई हैं।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के द्वारा लोकसभा में लिखित में उत्तर दिया गया।
(●) औषधियों हेतु मानक
यूएसएफडीए सहित किसी विदेशी विनियामक एजेंसी से प्राप्त चेतावनी पत्रों /आयात चेतावनियों को सीधे कंपनियों के पास भेजा जाता है। औषधियों के निर्यात के लिए भारतीय भेषज कंपनियों द्वारा आयातक देश के विनियामक प्रावधानों का अनुपालन किया जाना अपेक्षित है। औषधियों के मानक जिनका अनुपालन किया जाना होता है, तत्संबंधी भेषज कोष में विनिर्धारित किए गए हैं। इन मानकों का समय-समय पर निरंतर रूप से उन्नयन किया जाता है।
सरकार ने विहित किए गए गुणवत्ता मानदंडों के गैर अनुपालन के साथ-साथ औषधियों के विनिर्माण, आपूर्ति और विक्रय के मामलें में कठोर अभियोजन/शास्तियों के लिए सख्त प्रवर्तन व्यवस्था स्थापित करने के लिए निम्नलिखित उपाए किए हैं/ कर रही है:
1. नकली एवं मिलावटी दवाइयों के विनिर्माण हेतु सख्त दंड का प्रावधान करने के लिए औषध एवं प्रसाधन सामग्री (संशोधन) अधिनियम, 2008 के तहत औषध एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 को संशोधित किया गया था। कुछ अपराधों को संज्ञेय व गैर-जमानती भी बनाया गया है। और विशेष न्यायालय स्थापित किए गए हैं।
2. शीघ्र निस्तारण हेतु औषध एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत अपराधों के अभियोजन हेतु विशेष न्यायालयों की स्थापना करने के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों से अनुरोध किया गया था। अब तक 22 राज्य नामित विशेष न्यायालयों की स्थापना कर चुके हैं।
3. देश में नकली दवाइयों के चलन की पहचान करने में सतर्क सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा व्हिसल ब्लोअर स्कीम की घोषणा की गई हैं।
4. औषध एंव प्रसाधन सामग्री (संशोधन) अधिनियम, 2008 के तहत बढ़ाए गए दंडों के परिप्रेक्ष्य में नकली घोषित या अवमानक गुणवत्ता वाली औषधियों के नमूनों पर कार्रवाई करने के लिए एक समान कार्यान्वयन हेतु राज्य औषध नियंत्रकों को दिशानिर्देश अग्रेषित किए गए थे।
5. निरीक्षणालय कर्मचारियों को देश में चल रही औषधियों की गुणवत्ता की निगरानी के लिए सतर्कता रखने तथा जांच व विश्लेषण हेतु औषधियों के नमूने लेने का निदेश दिया गया है।
6. केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) में स्वीकृत पदों की संख्या (वर्ष, 2008 में) 111 से बढ़ाकर (वर्ष 2017 में) 510 कर दी गयी है।
7. सीडीएससीओ के अधीन केंद्रीय औषध परीक्षण प्रयोगशालाओं की परीक्षण क्षमताओं को सतत् रूप से बढ़ाया जा रहा है ताकि देश में औषधियों नमूनों के परीक्षण में तेजी लाई जा सके।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के द्वारा लोकसभा में लिखित में उत्तर दिया गया।
(●) अस्पतालों में चिकित्सीय उपकरणों की दशा
सभी चिकित्सा उपस्करों की कार्यात्मक स्थिति सहित इनवेंट्री का पता लगाने के लिए विस्तृत कार्रवाई की गई थी। मार्च 2017 में सभी राज्यों में 13% से 34% तक की रेंज में उपस्कर खराब पाए गए थे।
जिन राज्यों में कार्यक्रम कार्यान्वित किया गया है उनके चिकित्सा उपस्करों के अनुरक्षण समय का राज्यवार/संघ राज्य क्षेत्रवार ब्यौरा वास्तविक आधार पर राज्यों के डैशबोर्ड पर उपलब्ध है। 15 राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों के डैशबोर्ड के वेब-लिंक अनुलग्नक-I पर हैं। महाराष्ट्र और पंजाब का अपना सॉफ्टवेयर है जिनका लिंक उपलब्ध नहीं है।
इसमें चिकित्सा प्रबंधन और अनुरक्षण कार्यक्रम (बीएमएमपी) के लिए आदर्श आरएफपी सहित व्यापक दिशा-निर्देश बनाए गए हैं। इन्हें सभी राज्यों को प्रसारित किया गया है ताकि वे स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सा उपस्करों की कार्यात्मकता और अनुरक्षण के लिए उपयुक्त तंत्र स्थापित कर सकें। राज्य डैशबोर्ड के माध्यम से उपस्करों की कार्यात्मक स्थिति की वास्तविक आधार पर निगरानी की जाती है।
दिशा-निर्देश http://nhsrcindia.org/sites/default/files/practice_file/ Biomedical% 20 Equipment% 20Revised%20@2810-02-2015%29%282%29.pdfलिंक पर उपलब्ध हैं।
चिकित्सा उपस्कर अनुरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रम संबंधी व्यापक दिशा-निर्देश विकसित किए गए हैं। कार्यक्रम दिशा-निर्देश सभी जिला अस्पतालों में 95%, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 90% और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 80% अपटाईम सुनिश्चित करते हैं। कभी भी खराबी के पंजीकरण की तारीख और समय से एकल ब्रेकडाऊन सात दिन से अधिक नहीं होता है। इससे चिकित्सा उपस्करों का समय से अंशांकन और एहतियाती अनुरक्षण तथा आवधिक प्रयोगता प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाता है।
17 राज्यों ने कार्यक्रम कार्यान्वित कर दिया है। 13 राज्यों ने एनएचएम दिशा-निर्देशों के अनुसार सेवा प्रदाता को रखने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और 4 राज्यों में सेवा प्रदानगी का इन-हाऊस मॉडल अपनाया गया है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के द्वारा लोकसभा में लिखित में उत्तर दिया गया.
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