नई दिल्ली, 30 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
(■) कृषि यांत्रिकीकरण में तेजी आई
● कृषि यांत्रिकीकरण का लाभ उठाने के लिए भूमि जोतों के संघटन की जरूरत : आर्थिक सर्वेक्षण
केन्द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने 29 जनवरी को संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्तुत किया।
भारतीय किसान पहले की तुलना में तीव्र गति से कृषि यांत्रिकीकरण अपना रहे हैं। यह जानकारी केन्द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्तुत करने के दौरान दी। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि ट्रैक्टरों की बड़ी संख्या में बिक्री यांत्रिकीकरण के स्तर को प्रदर्शित करती है।
विश्व बैंक अनुमान के अनुसार, भारत की आधी आबादी 2050 तक शहरी हो जाएगी। ऐसा अनुमान है कि कुल श्रम बल में कृषि श्रमिकों का प्रतिशत 2001 के 58.2 प्रतिशत से गिरकर 2050 तक 25.7 प्रतिशत तक आ जाएगा। इसलिए, देश में कृषि यांत्रिकी के स्तर को बढ़ाने की आवश्यकता है। विभिन्न कृषि परिचालनों में श्रम की सघन भागीदारी के कारण कई फसलों में उत्पादन की लागत काफी अधिक है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान यांत्रिकी और बिजली के स्रोतों के उपयोग की दिशा में बदलाव आया है।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय कृषि में छोटे परिचालनगत जोतों की संख्या काफी अधिक है। इसलिए, कृषि यांत्रिकीकरण का लाभ उठाने के लिए भूमि जोतों के संघटन की जरूरत है।
(■) पुरूषों के शहर की तरफ पलायन करने से कृषि में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी
पुरूषों का गांव की तरफ से शहर में पलायन होने की वजह से महिलाओं की हिस्सेदारी कृषि के क्षेत्र में बढ़ रही है। इसकी वजह से महिलाएं कृषि को लेकर विभिन्न भूमिकाओं में दिख रही है। मसलन किसान, उद्यमी और श्रम में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है। वैश्विक स्तर पर देखा गया है कि महिलाओं ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में और स्थानीय जैव व कृषि को सुरक्षित बनाने में अहम भूमिका को निभाया है। ग्रामीण महिलाओं ने विभिन्न तरीके के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए प्रबंधन का एकीकृत ढांचा विकसित किया है जिससे रोजमर्रा की जरूरतें पूरी की जाती हैं। अब जरूरत इस बात की है कि महिलाओं तक जमीन, पानी, क्रेडिट और प्रौद्योगिकी पहुंच बढ़ाई जाए। भारत की स्थिति देखते हुए ग्रामीण महिलाओं को कृषि को लेकर प्रशिक्षण दिए जाने की जरूरत है। महिलाओं को अधिकार दिए जाने के बाद कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ है। महिला किसानों को अधिकार दिलाने को लेकर सरकार ने कई कदम उठाए है। महिलाओं को मुख्यधारा की कृषि में लाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं –
• सभी योजनाओं, कार्यक्रमों और विकास संबंधित गतिविधियों में किए जाने वाले आवंटन में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत निर्धारित किया जाना सुनिश्चित किया गया है।
• लाभदायक कार्यक्रमों, योजनाओं , महिला केंद्रित गतिविधियों पर जोर देने की शुरूआत की गयी है।
• क्षमता विकास गतिविधियों और छोटी बचत के जरिए महिला स्वयं सहायता समूह पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। विभिन्न निर्णय लेने वाले निकायों में उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए उन्हें तमाम तरीके की सूचनाएं मुहैया कराने के इंतजाम किए गए हैं।
• कृषि में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देते हुए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने प्रत्येक वर्ष 15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस घोषित किया है।
• उत्पादकता बढ़ाने के लिए महिलाओं की कृषि मूल्य कड़ी की उत्पादन, फसल पूर्व, कटाई, पश्च प्रसंस्करण, पैकेजिंग, विपरण से सभी स्तरों पर अधिपत्य होने के चलते महिलाओं की विशिष्ट भागीदारी जरूरी है। छोटी खेत जोत क्षेत्रों की उत्पादकता बढ़ाने, ग्रामीण कार्याकल्प में सक्रिय एजेंटों के रूप में महिलाओं को जोड़ना और लैंगिक विशेषता के चलते विस्तार सेवाओं में पुरूषों व महिलाओं को लगाने के लिए समावेशी परिवर्तनकारी कृषि नीति महिला विशिष्ट हिस्सेदारी पर लक्षित होना चाहिए।
(■) कृषि उत्पादकता वृद्धि को बनाये रखने के लिए कृषि अनुसंधान एवं विकास की आवश्यकता : आर्थिक सर्वेक्षण
कृषि अनुसंधान एवं विकास नवोन्मेषण का मुख्य स्रोत है जिसकी आवश्यकता दीर्घकालिक स्थिति में कृषि उत्पादकता विकास को बनाये रखने के लिए पड़ती है। केन्द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्तुत करने के दौरान उक्त बातें कहीं। सर्वेक्षण में कहा गया है कि कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग/ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का वास्तविक व्यय 2017-18 के दौरान बढ़कर 6800 करोड़ (बजट अनुमान) तक पहुंच गया। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2016 के दौरान देश में विभिन्न कृषि पर्या क्षेत्रों में खेती के लिए अनाज की 155 उच्च पैदावार की किस्में/ नस्लें जारी की गईं।
अनाज, दलहन, तिलहन, वाणिज्यिक और चारा फसलों के लिए नई किस्में/ संकर नस्लें विकसित की गई हैं जो कि बढ़ी हुई गुणवत्ता के साथ विभिन्न जैविक और गैर जैविक दवाबों को सहन कर सकती है।
अनाज: वर्ष 2017 के दौरान देश के विभिन्न कृषि पर्यावरणों में खेती के लिए 117 उच्च पैदावार किस्में/ संकर किस्में जारी की गई जिनमें शामिल हैं- चावल की 65 किस्में, गेंहू की 14, मक्का की 24, रागी की 5, बाजरा की 3, ज्वार, जई, कंगनी, कोदो मिलेट, लिटिल मिलेट और प्रोसो मिलेट की एक-एक किस्म।
तिलहन: विभिन्न कृषि पर्यावरण क्षेत्रों के संबंध में 28 उच्च पैदावार वाली तिलहन की किस्में जारी की गई हैं जिनमें 8 सफेद सरसों की, 7 सोयाबीन की, 4 मूंगफली और अलसी की, 3 सूरजमुखी की, 2 अरंडी की और नाइजर की।
दलहन: विभिन्न कृषि पर्यावरण क्षेत्रों के संबंध में दहलन की 32 उच्च पैदावार की किस्में जारी की गई। लोबिया की 10, दाल की 6, मूंग की 3, अरहर, चना और फील्ड पी की 2-2, उड़द, राजमा और फावाबीन की एक-एक।
वाणिज्यिक फसलें: - विभिन्न कृषि पर्यावरण क्षेत्रों के संबंध में वाणिज्यिक फसलों की 24 उच्च पैदावार की किस्में जारी की गई जिसमें शामिल हैं – कपास की 13, गन्ने की 8, जूट की 3।
चारा फसलें: विभिन्न कृषि पर्यावरण क्षेत्रों के संबंध में खेती के लिए चारे की 8 उच्च पैदावार की किस्में/संकर किस्में जारी की गई जिनमें शामिल हैं- जई की 3, बाजरा, नेपियर संकर, चारा ज्वार, ग्रेन अमारन्यस, चारा चना और मारवल ग्रास की 1-1 किस्म।
(■) आर्थिक सर्वेक्षण व्यापार नीति के दो प्रमुख फैसलों का उल्लेख करता है
पिछले वर्ष व्यापार नीति के संदर्भ में दो प्रमुख फैसले लिए गए। पहला विदेश व्यापार नीति (एफटीपी) की मध्यावधि समीक्षा से तथा दूसरा दिसम्बर 2017 में विश्व व्यापार संगठन के बहुपक्षीय समझौतों से संबंधित है। इसके अलावा लॉजिस्टिक तथा एंटी-डम्पिंग प्रक्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
एफटीपी-मध्यावधि समीक्षा और तद्नुसार व्यापार से संबंधित नीतियां
5 दिसम्बर, 2017 को जारी एफटीपी मध्यावधि समीक्षा में भारत के व्यापार क्षेत्र की सहायता के लिए कुछ अतिरिक्त कदम उठाए गए हैं। 15 दिसम्बर, 2017 को बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए चमड़ा और जूता क्षेत्र में एक विशेष पैकेज को सरकार ने मंजूरी दी है। इससे इस क्षेत्र में निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा।
बहुपक्षीय समझौते
विश्व व्यापार संगठन का 11वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसीआईआई) बिना किसी मंत्रिस्तरीय घोषणा व ठोस परिणाम के समाप्त हो गया।
एमसीआईआई के दौरान भारत ने बहुपक्षवाद, नियम आधारित आपसी मशविरा के आधार पर निर्णय लेना, एक स्वतंत्र और विश्वसनीय विवाद सुलझाने तथा अपील की प्रक्रिया, विकास की केन्द्रीयता जो दोहा विकास एजेंडा (डीडीएक्यू) को रेखांकित करता है और सभी विकासशील देशों को विशेष दर्जा जैसे डब्ल्यूटीओ के मौलिक सिद्धांतों पर दृढ़ता बनाए रखी।
विदेशी मुद्रा भंडार
देश का विदेशी मुद्रा भंडार दिसम्बर, 2017 में 409.4 बिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा भंडार में वर्षवार 14.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह दिसम्बर, 2016 में 358.9 बिलियन डॉलर से बढ़कर दिसम्बर, 2017 में 409.4बिलियन डॉलर हो गया। मार्च, 2017 से दिसम्बर, 2017 के दौरान विदेशी मुद्रा भंडार में 10.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 12जनवरी, 2018 को कुल विदेशी मुद्रा भंडार 413.8 बिलियन डॉलर हो गया है।
मार्च, 2017 में 11.3 महीनों के लिए देश में विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध था। सितम्बर, 2017 में 11.1 महीनों के आयात के लिए विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध है। जहां विश्व की अधिकांश बड़ी अर्थव्यवस्थाएं चालू खाता घाटे का सामाना कर रही हैं, वहीं भारत विश्व के सर्वाधिक विदेशी मुद्रा भंडार वाला देश बन गया है। विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में भारत पूरी दुनिया में छठे स्थान पर है।
(■) 2017-18 में किसानों के लिए 20,339 करोड़ रुपये मंजूर
कृषि क्षेत्र में उच्च उत्पादकता और समग्र उत्पादन प्राप्त करने के लिए क्रेडिट एक महत्वपूर्ण आगत है। लघु अवधि फसल ऋण पर किसानों को प्रदान की जाने वाली ब्याज सहायता से उत्पन्न होने वाली विभिन्न देयताओं को पूरा करने के लिए 2017-18 में भारत सरकार द्वारा 20,339 करोड़ रुपये की धनराशि अनुमोदित की गई है। इसके साथ ही फसल कटाई के बाद भंडारण संबंधी ऋण देश में किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण आगत अपेक्षा को पूरा करता है। विशिष्टया छोटे और सीमांत किसान जो कि मुख्य उधार लेने वालों में से है।
आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक यह संस्थागत क्रेडिट किसानों को क्रेडिट के गैर-संस्थागत स्रोत से अलग करने में मदद करेगी। जहां पर यह ब्याज की ऊंची दरों पर उधार लेने के लिए मजबूर होते हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत फसल बीमा, फसलों के ऋण से जुड़ा है। लिहाजा किसान फसल ऋणों का फायदा उठाते हुए सरकार की दोनों किसानों के अनुकूल पहलों से लाभ ले सकेंगे।
आर्थिक सर्वे के मुताबिक यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कि किसान बाजार में अपने उत्पादन के संबंध में लाभदायक कीमतों का लाभ उठाएं, सरकार सुधार को लेकर कदम उठा रही है। इलेक्ट्रानिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) जो सरकार द्वारा अप्रैल 2016 से आरंभ किया गया था, का उद्देश्य इलेक्ट्रोनिक प्लेटफॉर्म के माध्यम से बिखरे हुए एपीएमसी को एकीकृत करना और किसानों को ऑनलाइन व्यापार करने की सलाह दी जाती है, यह भी अहम है कि वे मान्यता प्राप्त गोदामों में अपने उत्पादन का भंडारण करके फसल की कटाई के बाद ऋण का फायदा उठाएं। यह ऋण ऐसे छोटे और सीमांत किसानों जिनके पास किसान क्रेडिट कार्ड है, को 6 माह की अवधि के संबंध में ऐसे भुगतान पर 2 प्रतिशत की ब्याज सहायता उपलब्ध है। इसमें किसानों को बाजार में उछाल आने के समय अपनी बिक्री करने और मंदी के दौरान बिक्री से बचने में मदद मिलेगी। अतः छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए आवश्यक है कि वे अपने केसीसी को बनाए रखें।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करना चाहती है। इसके लिए बीज से लेकर बाजार तक सरकार ने तमाम तरह की पहल की है। संस्थानात्मक स्रोतों से क्रेडिट, सभी ऐसे सरकारी प्रयासों जैसे सायल हेल्थ कार्ड, इनपुट प्रबंध, प्रधानमन्त्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), PMFBY, E-NAM इत्यादि में पर ड्रापमोरक्रॉप को विभुषित करेगा।
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