खबर विशेष : आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्‍तुत



नई दिल्ली, 29 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

(■) वर्ष 2017-18 के दौरान औसत मुद्रास्फीति दर पिछले छह सालों में सबसे कम रही

केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने आज संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्‍तुत किया। उन्होंने बताया कि 2017-18 के दौरान देश में मुद्रास्फीति की दर मध्यम रही। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित महंगाई दर 3.3 फीसदी रही, जो कि पिछले छह वर्षों में सबसे कम है।

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक हाउसिंग, ईंधन और लाइट को छोड़कर सभी बड़े कमोडिटी क्षेत्रों में मुद्रास्फीति दर में यह कमी दर्ज की गई। नवबंर 2016 से अक्टूबर 2017 यानी पूरे 12 महीने के दौरान मुख्य मुद्रास्फीति दर 4 फीसदी से नीचे दर्ज की गई। जबकि चालू वित्त वर्ष अप्रैल-दिसंबर के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक औसतन करीब एक फीसदी रहा।

सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले चार सालों में अर्थव्यवस्था में क्रमिक बदलाव देखा गया, जिसमें एक अवधि के दौरान मुद्रास्फीति काफी ऊपर चढ़ने या काफी नीचे गिरने के बजाय स्थिर बनी रही। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के जरिये मापी जाने वाली प्रमुख मुद्रास्फीति दर पिछले चार सालों में नियंत्रित ही रही है। जाहिर है कि चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीने में मुद्रास्फीति दर में जो गिरावट देखी गई वह खाद्य पदार्थों में रही। इसकी दर (-) 2.1 से 1.5 प्रतिशत रही।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि यह कृषि के क्षेत्र में बेहतर उत्पादन के चलते ही मुमकिन हो पाया है। सरकार ने मूल्यों को लेकर लगातार निगरानी बनाए रखी है।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार हालांकि हाल के महीनों में खाद्य पदार्थों के मूल्यों में चढ़ाव देखा गया उसकी वजह सब्जी और फलों के दामों में वृद्धि रही है। 2016-17 में ग्रामीण इलाकों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के मुख्य घटक खाद्य पदार्थ रहे हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में हाउसिंग सेक्टर ने मुद्रास्फीति में मुख्य भूमिका अदा की है। 2016-17 के दौरान यदि हम राज्यवार मुद्रास्फीति की दर देखेंगे तो पाएंगे कि ज्यादातर राज्यों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में बड़ी गिरावट का ही दौर जारी रहा। चालू वित्त के दौरान 17 राज्यों में मुद्रास्फीति की दर 4 प्रतिशत से कम रही। सरकार की तरफ से कई स्तरों पर किए गए प्रयासों के चलते मुद्रास्फीति दर में यही कमी देखी गई।


(■) समावेशी रोजगार-केन्द्रित उद्योग को प्रोत्‍साहन एवं गतिशील अवसंरचना का निर्माण आर्थिक एवं सामाजिक विकास के अहम कारक : आर्थिक सर्वेक्षण 

● सरकार द्वारा की गई कई क्षेत्र विशिष्‍ट सुधार पहलों से समग्र कारोबारी माहौल में उल्‍लेखनीय सुधार आया

समावेशी रोजगार-केन्द्रित उद्योग को प्रोत्‍साहन एवं गतिशील अवसंरचना का निर्माण आर्थिक एवं सामाजिक विकास के अहम कारक हैं। सरकार इस दिशा में कई विशिष्‍ट कदम उठा रही है। केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री श्री अरुण जेटली ने आज संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्‍तुत करने के दौरान उक्‍त बाते कहीं। वस्‍तु एवं सेवा कर, दिवाला एवं दिवालियापन संहिता एवं व्‍यवसाय करने की सुगमता को बढ़ाने देने जैसे संरचनागत सुधारों के अतिरिक्‍त, सर्वेक्षण में रेखांकित किया गया है कि सरकार ने इस्‍पात, परिधान, चमड़ा एवं बिजली क्षेत्र से जुड़ी विशिष्‍ट चुनौतियों का समाधान करने के लिए इनमें से प्रत्‍येक क्षेत्र में क्षेत्र विशिष्‍ट सुधार आरंभ किए हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि पिछले तीन वर्षों के दौरान आरंभ किए गए विभिन्‍न सुधारों को मू‍डीज इंवेस्‍टर्स सर्विस जैसी अंतर्राष्‍ट्रीय रेटिंग द्वारा मान्‍यता दी गई है जबकि विश्‍व बैंक की 2018 की रिपोर्ट में व्‍यवसाय करने की सुगमता की रैकिंग में बढ़ोतरी की गई है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में यह भी कहा गया है कि औद्योगिक उत्‍पादन सूचकांक (आईआईपी), जो कि 2011-12 के आधार वर्ष के साथ एक वॉल्‍यूम सूचकांक है, में 2017-18 में अप्रैल-नवंबर के दौरान औद्योगिक उत्‍पादन में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि प्रदर्शित की गई है। आईआईपी ने 10.2 प्रतिशत की विनिर्माण वृद्धि के साथ 8.4 प्रतिशत की 25 महीने की उच्‍च वृद्धि दर दर्ज की।

आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में यह भी कहा गया है कि कोयला, कच्‍चा तेल, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम, रिफाइनरी उत्‍पाद, उर्वरक, इस्‍पात, सीमेंट एवं बिजली जैसे आठ प्रमुख अवसंरचना समर्थक उद्योगों में 2017-18 के अप्रैल नवंबर के दौरान 3.9 प्रतिशत की संचयी वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि के दौरान कोयला, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्‍पाद, स्‍टील, सीमेंट एवं बिजली की उत्‍पादन वृद्धि सकारात्‍मक रही। इस्‍पात उत्‍पादन में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई जबकि कच्‍चे तेल एवं उर्वरक उत्‍पादन में इस अवधि के दौरान मामूली गिरावट दर्ज की गई।

आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में यह भी कहा गया है कि उद्योग को सामान्‍य शेष ऋण वृद्धि नवंबर 2017 में पहली बार सकारात्‍मक होकर 1 प्रतिशत रही जो कि अक्‍टूबर 2016 से नकारात्‍मक वृद्धि दर्ज कर रही थी। ऋण मंदी के बाद भारतीय कंपनियों द्वारा निधियों की मांग की पूर्ति कुछ हद तक कॉरपोरेट बांडों एवं कॉमर्शियल पेपर जैसे वैकल्पिक स्रोतों द्वारा की गई है।

बजट पूर्व आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में यह भी कहा गया है कि कुल विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश आवक में 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई अर्थात यह पिछले वर्ष के 55.56 बिलियन डॉलर की तुलना में 2016-17 के दौरान 60.08 बिलियन डॉलर हो गया। 2017-18 (अप्रैल-सितंबर) में कुल एफडीआई की आवक 33.75 बिलियन डॉलर की रही।

व्‍यवसाय करने की सरलता पर, आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में रेखांकित किया गया है कि विश्‍व बैंक की व्‍यवसाय करने की सरलता रिपोर्ट 2018 में भारत ने पहले की अपनी 130वीं रैकिंग के मुकाबले 30 स्‍थानों की ऊंची छलांग लगाई है। क्रेडिट रेटिंग कंपनी मूडीज इंवेस्‍टर्स सर्विस ने भी भारत की रैकिंग को बीएए3 के न्‍यूनतम निवेश ग्रेड से बढ़ाकर बीएए2 कर दिया है। यह सरकार द्वारा यह वस्‍तु एवं सेवा कर, दिवाला एवं दिवालियापन संहिता एवं बैंक पुन: पूंजीकरण के क्रियान्‍वयन समेत सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्‍न कदमों से संभव हो पाया है। औद्योगिक वृद्धि को बढ़ाने के कई कदमों में मेक इन इंडिया कार्यक्रम, स्‍टार्टअप इंडिया एवं बौद्धिक संपदा नीति शामिल है।

आर्थिक सर्वेक्षण ने क्षेत्रवार पहलों की सूची बनाई:

Ø इस्‍पात: चीन, दक्षिण कोरिया एवं यूक्रेन से सस्‍ते इस्‍पात आयातों की डंपिंग रोकने के लिए सरकार ने फरवरी 2016 में सीमा शुल्‍क कर ने बढ़ोतरी की और एंटी डंपिंग शुल्‍क लगाया, कई वस्‍तुओं पर न्‍यूनतम आयात मूल्‍य (एमआईपी) लगाया। सरकार ने मई 2017 में एक नई इस्‍पात नीति भी आरंभ की।

Ø एमएसएमई क्षेत्र: भारत में एमएसएमई क्षेत्र बड़े उद्योगों की तुलना में निम्‍न‍ पूंजी लागत पर बड़े स्‍तर पर रोजगार अवसर उपलब्‍ध कराने में तथा ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों के औद्योगीकरण में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार ने इस क्षेत्र के लिए कई योजनाएं और विशेष रूप से 2016-17 में सूक्ष्‍म औद्योगिक इकाइयों से संबंधित विकास एवं पुनर्वित कार्यकलापों के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आरंभ की।

Ø कपड़ा एवं परिधान : परिधान कंपनियों के सामने आने वाली कुछ बाधाओं को दूर करने के लिए केन्द्रिय मंत्रिमंडल ने जून 2016 में अपैरल क्षेत्र के लिए 6000 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की। सरकार ने दिसंबर 2017 में वर्ष 2017-2018 से 2019-2020 की अवधि के लिए 1300 करोड़ रुपये के साथ कपड़ा क्षेत्र में क्षमता निर्माण के लिए योजना (एससीबीटीएस) को मंजूरी दी।

Ø चमड़ा क्षेत्र : चमड़ा एवं फुटवियर क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से सरकार ने दिसंबर 2017 में 2017-18 से 2019-2020 के तीन वित्त वर्षों के लिए 2600 करोड़ रुपये के परिव्‍यय के साथ एक योजना आरंभ की है।

Ø रत्‍न एवं जवाहरात : रत्न एवं जवाहरात क्षेत्र का निर्यात 2014-15 के 0.7 प्रतिशत से बढ़कर 2016-17 में 12.8 प्रतिशत पहुंच गया है। आर्थिक सर्वेक्षण में दर्ज किया गया है कि वैश्विक अवसंरचना आउटलुक में अनुमान लगाया गया है कि आर्थिक विकास एवं सामुदायिक कल्‍याण में बेहतरी लाने के लिए अवसंरचना का विकास करने हेतु भारत द्वारा 2040 तक 4.5 ट्रिलियन डॉलर के बराबर निवेश की आवश्‍यकता है।

सर्वेक्षण के अनुसार सरकार भारत के दीर्घावधि विकास के लिए अवसंरचना विकास में अत्यधिक निवेश कर रही है। गुणवत्तापूर्ण परिवहन से संबंधित अवसंरचना क्षेत्र में भारत कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से आगे है। नए राष्ट्रीय राजमार्गों (एनएच) का निर्माण और राज्य उच्च पथों (एसएच) को राजमार्गों में परिवर्तन करना सरकार का प्राथमिक एजेंडा है। सितम्बर, 2017 में राष्ट्रीय राजमार्गों/एक्सप्रेसवे की कुल लम्बाई 1,15,530 किलोमीटर थी, जो सड़कों की कुल लम्बाई का 2.06 प्रतिशत है। दूसरी तरफ राज्य उच्च पथों की कुल लम्बाई 2015-16 में 1,76,166 किलोमीटर थी। सरकार को विभिन्न राज्य सरकारों से 64,000 किलोमीटर के उच्च पथों को राष्ट्रीय राजमार्गों में परिवर्तित करने का प्रस्ताव प्राप्त हुआ। सड़क और परिवहन मंत्रालय ने 10,000 किलोमीटर की सड़कों को नए राष्ट्रीय राजमार्ग में परिवर्तित करने की घोषणा की है। बिहार, ओडिशा, छ्त्तीसगढ़, झारखंड, जम्मू कश्मीर, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश जैसे निम्न सकल राज्य घरेलू उत्पाद वाले अविकसित राज्यों में अन्य लोक निर्माण विभाग (ओपीडब्ल्यूडी) सड़क/जिला सड़क का घनत्व बहुत निम्न है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार जिलों को जोड़ने वाली सड़कों सहित ओपीडब्ल्यूडी रोड को विकसित करने की आवश्यकता है ताकि आवागमन को बेहतर बनाया जा सके। इससे आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होगी।

सर्वेक्षण के अनुसार विलंब से चल रही परियोजनाओं को तेज गति से पूरा करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी शामिल है। नई महत्वाकांक्षी भारत माला परियोजना का लक्ष्य राजमार्ग विकास के लिए अधिकतम संसाधन आवंटन प्राप्त करना है।

रेलवे के संबंध में सर्वेक्षण कहता है कि 2017-18 (सितम्बर 2017 तक) के दौरान भारतीय रेल ने 558.10 मिलियन टन माल ढुलाई की, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 531.23 मिलियन टन थी, जो 5.06 प्रतिशत की वृद्धि दिखाता है। रेलवे अवसंचरना विकास पर विशेष ध्यान देने के अंतर्गत बड़ी लाइन निर्माण तथा रेल मार्गों के विद्युतीकरण में तेजी लाई गई है। भारत सरकार की वित्तीय सहायता से वर्तमान में 425 किलोमीटर लंबी मेट्रो रेल प्रणाली संचालन में है और देश के विभिन्न शहरों में 684 किलोमीटर की मेट्रो रेल लाइन निर्माण के विभिन्न चरणों में है। (दिसम्बर, 2017) 2017-18 में (31 दिसम्बर, 2017) प्रमुख बंदरगाहों पर कुल 499.41 मिलियन टन की कार्गो ढुलाई की गई, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 481.87 मिलियन टन थी। सागरमाला योजना के तहत 2.17 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 289 परियोजनाएं निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं।

सर्वेक्षण के अनुसार दूर संचार क्षेत्र में भारत नेट और डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रम भारत को एक डिजिटल अर्थव्यवस्था में परिवर्तित कर देंगे। सितम्बर, 2017 के अंत तक कुल मोबाइल कनेक्शन की संख्या 1207.04 मिलियन थी। इनमें से 501.99 मिलियन ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 705.05 मिलियन शहरी क्षेत्रों में थे।

विमानन क्षेत्र के बारे में आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि 2017-18 में घरेलू हवाई यात्रियों की संख्या 57.5 मिलियन थी। इसमें पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। सरकार हवाई सेवाओं को उदार बनाने, हवाई अड्डों को विकसित करने और उड़ान जैसी योजना के माध्यम से क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ाने का प्रयास कर रही है।

ऊर्जा क्षेत्र की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए सर्वेक्षण कहता है कि भारत की ऊर्जा क्षमता 3,30,860.6 मेगावाट हो गई है। (नवम्बर, 2017) 15,183 गांवों के विद्युतीकरण का काम पूरा हो गया है। सितम्बर, 2017 में एक नई योजना सौभाग्य (प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना) का शुभारम्भ किया गया। इस योजना के लिए 16,320 करोड़ रुपये की धनराशि निर्धारित की गई है।

सर्वेक्षण के अनुसार 160 बिलियन ड़ॉलर का लॉजिस्टिक उद्योग 7.8 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ोत्तरी कर रहा है। यह क्षेत्र 22 मिलियन से ज्यादा लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। सम्पूर्ण लॉजिस्टिक प्रदर्शन के आधार पर भारत जो 2014 में 54वें पायदान पर था, वह 2016 में 35वें पायदान पर आ गया है (विश्व बैंक 2016 लॉजिस्टिक प्रदर्शन सूचकांक)।


(■) मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उपाय

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना केंद्र सरकार की प्राथमिकता रही है। सरकार ने इसके लिए कई कदम उठाए हैं, जो निम्नलिखित हैं:

• जमाखोरी और कालाबाजारी के खिलाफ कार्रवाई करने, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 और कम आपूर्ति वाली वस्तुओं की कालाबाजारी निवारण एवं आवश्यक वस्तु अनुरूप अधिनियम, 1980 को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए जरूरत पड़ने पर समय-समय पर राज्य सरकारों को परामर्शिकाएं जारी की जा रही हैं।

• कीमत और उपलब्धता की स्थिति के आकलन के लिए नियमित तौर पर उच्च स्तरीय समीक्षा बैठकें की जा रही हैं। ये बैठकें सचिवों की समिति, अंतर मंत्रालय समिति, कीमत स्थिरीकरण निधि प्रबंधक समिति और अन्य विभागीय स्तर पर की जाती हैं।

• उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए खाद्य पदार्थों के अधिकतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा की गई। इसका उद्देश्य खाद्य पदार्थों उपलब्धता बढ़ाना भी है, जिससे कीमतों को कम रखने में मदद मिलेगी।

• दालों, प्याज आदि कृषि वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए कीमत स्थिरीकरण निधि (पीएसएफ) योजना लागू की जा रही है।

• खुदरा कीमतों को बढ़ने से रोकने के प्रयासों के तहत सरकार ने दालों के सुरक्षित भंडार (बफर स्टॉक) को 1.5 लाख मी. टन से बढ़ाकर 20 लाख मी. टन करने का अनुमोदन किया। इस क्रम में 20 लाख टन तक दालों का सुरक्षित भंडार तैयार किया गया।

• राज्यों/संघ शासित क्षेत्रों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से वितरित करने, मध्याह्न भोजन योजना आदि के लिए सुरक्षित भंडार से दालें दी जा रही हैं। इसके अलावा सेना और केन्द्रीय अर्द्ध सैन्य बलों की दाल की जरूरत को पूरा करने के लिए भी सुरक्षित भंडार से दालों का उपयोग किया जा रहा है।

• सरकार ने अप्रैल, 2018 तक चीनी के स्टॉकिस्टों/डीलरों पर स्टॉक होल्डिंग की सीमा तय कर दी है।

• सरकार ने उपलब्धता को बढ़ावा देने और कीमतों को कम बनाए रखने के लिए चीनी के निर्यात पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाया।

• शून्य सीमा शुल्क पर 5 लाख टन कच्ची चीनी के आयात को अनुमति दी गई। इसके बाद 25 प्रतिशत शुल्क पर 3 लाख टन अतिरिक्त आयात की अनुमति प्रदान की गई।

• साख पत्र पर सभी प्रकार के प्याज के निर्यात की अनुमति दी जाएगी, जो 31 दिसंबर, 2017 तक 850 डॉलर प्रति मी. टन न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) से संबद्ध होगा।

• राज्यों/संघ शासित क्षेत्रों को प्याज पर भंडारण सीमा लगाने की सलाह दी गई है। राज्यों से अपनी प्याज की जरूरत की सूचना देने का अनुरोध किया गया, जिससे उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों में कमी लाने के लिए आवश्यक आयात की दिशा में कदम उठाए जा सकें।


(■) भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी-बीते एक वर्ष की उपलब्धियां

सर्वेक्षण के मुताबिक, भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बीते एक वर्ष के दौरान किए गए कार्य इस प्रकार हैं:

• प्रकाशन

भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में प्रकाशनों और पेटेंट पर गौर करने से भारतीय अनुसंधान की उत्पादकता एवं गुणवत्ता का आकलन करने में मदद मिल सकती है। वर्ष 2013 में वैज्ञानिक प्रकाशन के मामले में भारत विश्व में छठे स्थान पर था। इस रैंकिंग में लगातार सुधार हो रहा है। 2009-14 के बीच वार्षिक प्रकाशन की वृद्धि दर लगभग 14 प्रतिशत रही थी। एससीओपीयूएस डाटाबेस के अनुसार, इससे 2009 से 2014 के बीच वैश्विक प्रकाशनों में भारत की हिस्सेदारी 3.1 प्रतिशत से बढ़कर 4.4 प्रतिशत हो गई।

मोटे तौर पर प्रकाशन के रुझान से स्पष्ट होता है कि प्रकाशनों की संख्या के मामले में भारत के प्रदर्शन का स्तर क्रमिक रूप से सुधर रहा है।

प्रकाशन में सुधार के अलावा गुणवत्ता में सुधार का रुझान भी देखने को मिल रहा है।

• पेटेंट

यदि पत्रिका प्रकाशन से विज्ञान में किसी देश का कौशल प्रदर्शित होता है तो पेटेंट, प्रौद्योगिकी में उसकी स्थिति को दर्शाते हैं। डब्ल्यूआईपीओ के मुताबिक, भारत विश्व में 7वां बड़ा पेटेंट फाइलिंग ऑफिस है। 2015 में चीन (1,101,864), यूएसए (589,410), जापान (318,721), कोरिया गणराज्य (213,694) और जर्मनी (91,726) की तुलना में भारत में 45,658 पेटेंट पंजीकृत हुए। हालांकि भारत प्रति व्यक्ति पेटेंट के मामले में काफी पीछे हैं।

भारत की घरेलू पेटेंट प्रणाली एक बड़ी चुनौती रही है। भले ही दूसरे देशों में भारत के पेटेंट आवेदन और स्वीकृतियों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन देश में यह स्थिति नहीं है। भारत के 2005 में अंतरराष्ट्रीय पेटेंट व्यवस्था से जुड़ने के बाद क्षेत्रीय आवेदनों की संख्या तेजी से बढ़ी है। हालांकि 2008 के बाद स्वीकृत पेटेंट की संख्या तेजी से घटी है और इनका स्तर कम बना हुआ है। जहां 2015 में विदेशी कार्यालयों में भारतीय नागरिकों के 5000 पेटेंट को स्वीकृति मिली, वहीं भारत में फाइल करने वाले नागरिकों की संख्या 800 से कुछ ज्यादा रही।

सरकार ने हाल में 450 अतिरिक्त पेटेंट परीक्षकों की नियुक्तियां कीं और 2017 में भारतीय नागरिकों के लिए एक त्वरित फाइलिंग व्यवस्था का निर्माण किया। पेटेंट फाइलिंग से जुड़ी समस्याओं के समाधान निकाले गए हैं। नवाचार को पुरस्कृत करने वाली प्रभावी पेटेंट व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिहाज से पेटेंट से जुड़ी मुकदमेबाजी का हल निकालना काफी अहम होगा।


(■) वर्ष 2017-18 के दौरान सेवा क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी प्रवाह 15.0 प्रतिशत बढ़ा

2017-18 (अप्रैल-अक्‍टूबर) के दौरान सेवा क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी प्रवाह में 15.0 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह भारत को एक आकर्षक निवेश गंतव्‍य बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा अनेक सुधारों को लागू करने से संभव हो पाया है, जिनमें राष्‍ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) नीति की घोषणा करने, वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने, कारोबार में सुगमता सुनिश्चित करने के लिए लागू किए गए सुधार शामिल हैं। इसका उल्‍लेख आज संसद के पटल पर पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में किया गया है।

इस अवधि के दौरान बड़े पैमाने पर सुधार लागू किए गए, जिसकी पुष्टि इस तथ्‍य से होती है कि सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों सहित 25 क्षेत्रों (सेक्‍टर) में सुधार लागू किए गए हैं। इनमें एफडीआई नीति से जुड़े 100 क्षेत्रों को भी कवर किया गया है। विभिन्‍न सेक्‍टरों जैसे कि निर्माण क्षेत्र के विकास, प्रसारण, खुदरा कारोबार, हवाई परिवहन, बीमा एवं पेंशन सेक्‍टर से जुड़ी एफडीआई नीति के प्रावधानों में व्‍यापक बदलाव किए गए। वर्तमान में 90 प्रतिशत से भी अधिक एफडीआई प्रवाह स्‍वत: रूट के जरिए होता है। ई-फाइलिंग के साथ-साथ विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) द्वारा एफडीआई से जुड़े आवेदनों की ऑनलाइन प्रोसेसिंग पर सफलतापूर्वक अमल के बाद सरकार ने केन्‍द्रीय बजट 2017-18 में एफआईपीबी को चरणबद्ध ढंग से भंग करने की घोषणा की। हाल ही में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने 10 जनवरी, 2018 को एफडीआई नीति में संशोधनों को मंजूरी दी, जिसके तहत एकल ब्रांड खुदरा कारोबार के लिए स्‍वत: रूट के जरिए 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति दी गई। विदेशी एयरलाइंस को भी एयर इंडिया में 49 प्रतिशत तक निवेश करने की अनुमति दी गई है।

वैसे तो सेवा क्षेत्र में एफडीआई के वर्गीकरण में कुछ विसंगतियां हैं, लेकिन शीर्ष 10 सेवा क्षेत्रों जैसे कि औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) की सेवा क्षेत्र संबंधी परिभाषा के दायरे में आने वाली वित्‍तीय एवं गैर-वित्‍तीय सेवाओं के साथ-साथ दूरसंचार, व्‍यापार, कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर, निर्माण, होटल एवं पर्यटन, अस्‍पताल एवं नैदानिक केंद्रों, परामर्श सेवाओं, समुद्री परिवहन और सूचना एवं प्रसारण क्षेत्र की संयुक्‍त एफडीआई हिस्‍सेदारी को सेवा क्षेत्र से जुड़े एफडीआई का सर्वोत्‍तम आकलन माना जा सकता है। वर्ष 2016-17 के दौरान सर्विस सेक्‍टर (निर्माण क्षेत्र सहित शीर्ष 10 सेक्‍टर) में एफडीआई इक्विटी प्रवाह 0.9 प्रतिशत घटकर 26.4 अरब अमेरिकी डॉलर के स्‍तर पर आ गया। हालांकि, समग्र रूप से एफडीआई इक्विटी प्रवाह में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। 2017-18 (अप्रैल-अक्‍टूबर) के दौरान कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह में 0.8 प्रतिशत की वृद्धि की तुलना में इन सेवा क्षेत्रों में एफडीआई इक्विटी प्रवाह में 15.0 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह मुख्‍यत: दो सेक्‍टरों यथा दूरसंचार और कम्‍प्‍यूटर सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर में अपेक्षाकृत अधिक प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) होने से ही संभव हो पाया है।


(■) 2017-18 की अप्रैल-सितंबर अवधि के दौरान सेवा निर्यात और सेवा आयात में क्रमश: 16.2 एवं 17.4 प्रतिशत की उल्‍लेखनीय वृद्धि

भारत 3.4 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी के साथ वर्ष 2016 के दौरान विश्‍व में वाणिज्यिक सेवाओं के आठवें सबसे बड़े निर्यातक के रूप में अपना रूतबा बनाए रखने में कामयाब रहा। यह विश्‍व में भारत के वाणिज्यिक निर्यात की 1.7 प्रतिशत हिस्‍सेदारी की तुलना में दोगुनी है। भारत के सेवा क्षेत्र ने वर्ष 2016-17 में 5.7 प्रतिशत की निर्यात वृद्धि दर दर्ज की थी। वर्ष 2017-18 की अप्रैल-सितंबर अवधि के दौरान सेवा निर्यात और सेवा आयात में क्रमश: 16.2 तथा 17.4 प्रतिशत की उल्‍लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि के दौरान सेवा क्षेत्र से जुड़ी शुद्ध प्राप्तियों में 14.6 प्रतिशत की वृद्धि आंकी गई है। सेवा क्षेत्र के शुद्ध अधिशेष (सरप्‍लस) से वर्ष 2017-18 की प्रथम छमाही के दौरान भारत के विनिर्माण क्षेत्र में दर्ज की गई कमी के लगभग 49 प्रतिशत का वित्‍त पोषण हुआ।

सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से सरकार ने विदेश व्‍यापार नीति 2015-2020 की अपनी मध्‍यावधि समीक्षा में भारत से सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस) के तहत दिए जाने वाले प्रोत्‍साहनों में 2 प्रतिशत की वृद्धि की है, जिसके परिणामस्‍वरूप 1140 करोड़ रुपये का अतिरिक्‍त वार्षिक प्रोत्‍साहन सुनिश्चित हुआ है। इससे होटल एवं रेस्‍तरां, अस्‍पताल, शैक्षणिक सेवाओं सहित सेवा निर्यात में उल्‍लेखनीय मदद मिल सकती है। वैसे तो वस्‍तुओं एवं सेवाओं के विश्‍व व्‍यापार की गति वर्ष 2018 में काफी तेज हो जाने का अनुमान है, लेकिन बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता, संरक्षणवाद और कठोर प्रवासन (माइग्रेशन) नियम भारत के सेवा निर्यात को विशिष्‍ट आकार देने में महत्‍वपूर्ण कारक साबित होंगे।


(■) जीएसटी युग के पहले आठ महीने में अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि--- सकल कर संग्रण सही दिशा में

राजस्व तेजी, व्यय गुणवत्ता, केन्द्र द्वारा राज्यों को दिये जाने वाले कर तथा घाटे जैसे अधिकांश वित्तीय संकेतकों में बेहतर सुधार से आए सुदृढ़ संतुलन के आधार पर सरकार ने राज्यों के साथ भागीदारी में जीएसटी युग का जुलाई 2017 से शुभारम्भ किया। जीएसटी को व्यापक तैयारी, आकलन तथा बहु-स्तरीय परामर्श के पश्चात लागू किया गया था तथापि इस व्यापक बदलाव की सावधानीपूर्वक व्यवस्था करने की आवश्यकता है। सर्वेक्षण के अनुसार सरकार पिछले महीने जीएसटी कर संग्रहण के पर्याप्त हिस्से के अगले वर्ष में अंतरित किए जाने की संभावना सहित बदलाव तथा चुनौतियों का दिशानिर्देशन कर रही है।

महालेखा नियंत्रक (सीजीए) से उपलब्ध नवम्बर, 2017 तक के केंद्रीय सरकार के वित्तीय आंकड़ों से पता चलता है कि चालू वर्ष 2017-18 के पहले आठ महीनों के दौरान सकल कर संग्रहण पर्याप्तः सही दिशा में है तथा गैर-कर राजस्व में धीमी गति के लिए काफी हद तक विनिवेश प्रतिपूर्ति में बेहतर प्रगति हुई है। केन्द्र की प्रत्यक्ष कर वसूली में वृद्धि पिछले वर्ष के अनुरूप रही है और 13.7 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ इसके लक्ष्य पर खरा उतरने की उम्मीद है जबकि अप्रत्यक्ष करों में अप्रैल-नवम्बर, 2017 के दौरान 18.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

इस वर्ष के दौरान प्रत्यक्ष करों में अंतिम प्राप्ति केन्द्र तथा राज्यों के बीच जीएसटी लेखों के अंतिम समाशोधन पर निर्भर करेगी तथा सम्भावना है कि केवल 11 महीनों के कर (आयातों पर आईजीएसटी को छोड़कर) जारी किए जाएंगे। अप्रैल-नवम्बर, 2017 के दौरान करों में राज्यों के हिस्से में 25.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो 12.6 प्रतिशत की शुद्ध कर राजस्व (केन्द्र को) की वृद्धि तथा 16.5 प्रतिशत के सकल कर राजस्व से काफी ज्यादा है।

सूचना कोष के रूप में सामान तथा सेवा कर (जीएसटी) से भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने की तीव्र परिवर्तन तथा अंतरदृष्टि का आभास मिलता है। सूचना के विश्लेषण से निम्नलिखित उपलब्धियों का पता चलता है। अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, स्वैच्छिक पंजीकरण में, विशेषतः लघु उद्यमियों द्वारा, जो बड़े उद्यमियों से खरीद करते हैं तथा इन्पुट कर क्रेडिट की सुविधा का लाभ उठाने के इच्छुक हैं, काफी वृद्धि हुई है। राज्यों के बीच जीएसटी वसूली का वितरण उनकी अर्थव्यवस्थाओं के आकार, बड़े उत्पादक राज्यों के इस भय की निवृत्ति से अत्यधिक जुड़ा है कि नई पद्धति अपनाने से उनकी कर वसूली कम आँकी जाएगी। राज्यों के अन्तर्राष्ट्रीय निर्यात आंकड़ों (भारत के इतिहास में पहली बार) से पता चलता है कि निर्यात निष्पादन तथा राज्यों के जीवन स्तर के बीच गहरा सम्बन्ध है। भारतीय निर्यात इस दृष्टिकोण से असामान्य है कि अन्य तुलनात्मक देशों की अपेक्षा बड़ी फर्मों की निर्यातों में भागीदारी बहुत कम है। भारत का आन्तरिक व्यापार जीडीपी का लगभग 60 प्रतिशत है, जो पिछले वर्ष के सर्वेक्षण में अनुमान से कही अधिक है तथा अन्य बड़े देशों से काफी हद तक बेहतर है। भारत का औपचारिक क्षेत्र, विशेषतः औपचारिक गैर-फार्म पे-रोल इस समय जैसा समझा जाता है उससे कही अधिक है। सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के दृष्टिकोण से औपचारिक गैर-कृषि कार्यबल के 31 प्रतिशत के लगभग औपचारिक क्षेत्र पे-रोल का अनुमान है जबकि जीएसटी तंत्र के हिस्से के रूप में औपचारिकता की दृष्टि से औपचारिक क्षेत्र पे-रोल का 53 प्रतिशत हिस्सा बनता है।

बजट क्रम तथा प्रक्रियाओं के एक महीना पूर्व शुरू किए जाने, खर्च करने वाली एजेंसियों को अग्रिम योजना बनाने तथा वित्त वर्ष में इसका कार्यान्वयन शीघ्र शुरू करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा जिससे केन्द्रीय खर्च में तेजी आएगी।

• सुदृढ़ सार्वजनिक वित्तीय प्रबन्ध पिछले तीन वर्षों में भारत की वृहद आर्थिक स्थिरता का एक आधार स्तम्भ है। इसके अनुसरण में पिछले तीन वर्षों में वित्तीय घाटा, राजस्व घाटा एवं प्राथमिक घाटे में भी कमी आई है

• जीडीपी के प्रतिशत के रूप में वित्तीय संकेतक

व्यय की शीघ्र शुरूआत तथा कुछ अतिरिक्त व्यय, ब्याज में बढ़ोत्तरी से वित्तीय घाटे में वृद्धि हुई जो नवम्बर 2017 तक बजट अनुमानों के 112 प्रतिशत तक पहुंच गई। साल जाते-जाते इस वृद्धि का बड़ा भाग सामान्य स्थिति में आने की संभावना है।

यदि संकेतकों और इस व्यवस्था-क्रम को नवम्बर तक बनाए रखा गया तो कुल मिलाकर राज्य 2017-18 में वित्तीय घाटे के अपने लक्ष्य को पूरा करने में सक्षम हो सकते हैं।


(■) आर्थिक सर्वेक्षण में निम्‍न संतुलन जाल से बचने के लिए वित्तीय संघवाद एवं जवाबदेही पर जोर

अगर वित्तीय संघवाद अर्जित नहीं किया जाता है तो क्‍या निम्‍न‍ संतुलन जाल पैदा हो सकता है ? केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली द्वारा आज संसद के पटल पर प्रस्‍तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में यह प्रश्‍न पूछा गया था।

सर्वेक्षण में बताया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्‍थानीय सरकारों द्वारा कर संग्रह के निम्‍न स्‍तर से वित्तीय संघवाद एवं जवाबदेही के मामले में चुनौती सामने आ रही है। पंचायतों ने अपने राजस्‍व का 95 प्रतिशत के‍न्‍द्र/राज्‍यों से फंड प्राप्‍त किया जबकि अपने खुद के संसाधनों से केवल 5 प्रतिशत सृजित किया। केरल, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक जैसे राज्‍यों में पंचायतें कुछ प्रत्‍यक्ष कर का संग्रह करती हैं जबकि उत्तर प्रदेश जैसे राज्‍यों में गांव लगभग पूरी तरह अंतरित निधियों पर निर्भर रहते हैं। कुछ अन्‍य उदाहरणों में भले ही ग्रामीण स्‍थानीय सरकारों को कर लगाने का अधिकार नहीं दिया गया है फिर भी संपत्तियों पर लागू निम्‍न आधार मूल्‍य एवं लगाये गए करों की निम्‍न दरों के कारण भूमि राज्‍स्‍व संग्रह 7 से 19 प्रतिशत की निम्‍न दर पर बना हुआ है। केरल और कर्नाटक, जो पंचायतों को अधिकार देने में दूसरे से आगे हैं, के ग्रामीण क्षेत्रों में गृह कर राजस्‍व संग्रह क्षमता का केवल एक तिहाई है।

आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया कि आर्थिक और राजनीतिक विकास का संबंध कुल करों में प्रत्‍यक्ष करों के बढ़ते हिस्‍से के साथ जुड़ा हुआ है। प्रत्‍यक्ष करों का हिस्‍सा यूरोप में कुल करों का लगभग 70 प्रतिशत है जबकि भारत में यह संख्‍या लगभग 35 प्रतिशत की है। दूसरे देशों के विपरीत भारत में प्रत्‍यक्ष करों पर निर्भरता गिरती प्रतीत हो रही है। इसके अतिरिक्‍त, सर्वेक्षण में रेखांकित किया गया कि वित्तीय विकेन्‍द्रीकरण को न केवल एक वांछनीय आर्थिक बल्कि एक राजनीतिक और दार्शनिक सिद्धांत के रूप में भी अंगीकार किया जाता है। भारत में राज्‍य प्रत्‍यक्ष करों से अपने राजस्‍व का बहुत निम्‍न हिस्‍सा, लगभग 6 प्रतिशत प्राप्‍त करते हैं जबकि ब्राजील में यह संख्‍या 19 प्रतिशत और जर्मनी में 44 प्रतिशत है। तीसरी श्रेणी में, भारत में ग्रामीण स्‍थानीय सरकारें अपने खुद के संसाधनों से केवल 6 प्रतिशत राजस्‍व का सृजन करती हैं जबकि ब्राजील एवं जर्मनी में यह 40 प्रतिशत से अधिक है। भारत में शहरी स्‍थानीय सरकारें अंतर्राष्‍ट्रीय मानदंडों के अधिक करीब हैं और वे ब्राजील के 19 प्रतिशत एवं जर्मनी के 26 प्रतिशत की तुलना में प्रत्‍यक्ष करों से कुल राजस्‍व का 18 प्रतिशत संग्रह करती हैं। इसके अतिरिक्‍त, भारत में शहरी स्‍थानीय सरकारें अपने खुद के संसाधनों से अपने कुल राजस्‍व का 44 प्रतिशत सृजन करती हैं। यह स्‍पष्‍ट है कि शहरी स्‍थानीय सरकारें भारत में ग्रामीण स्‍थानीय सरकारों की तुलना में वित्तीय रूप से अधिक सशक्‍त बनकर उभरी हैं।

भारत की संघीय संरचना इसके शासन और जवाबदेही पर 73वें एवं 74वें संवैधानिक संशोधन (जो क्रमश: ग्रामीण और शहरी स्‍थानीय सरकारों को अधिक शक्ति प्रदान करता है) के प्रभाव का मूल्‍यांकन करने के लिए बेहतर डाटा और साक्ष्‍य की मांग करते हुए आर्थिक सर्वेक्षण में निष्‍कर्ष के रूप में कहा गया है कि भारत में श्रेणी 2 और श्रेणी 3 में स्‍थानीय सरकारें प्राप्‍त संसाधनों पर अधिक निर्भर करती हैं। वे निम्‍न कर संसाधन सृजित करती हैं और कम प्रत्‍यक्ष कर संग्रह करती हैं। इसका कारण ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उनके पास पर्याप्‍त कराधान अधिकार नहीं है बल्कि इसका कारण यह है कि वे वर्तमान कराधान अधिकारों का पूरा उपयोग नहीं कर रही हैं।


(■) 15 राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों में सेवा क्षेत्र का निष्‍पादन सबसे अच्‍छा, जिसका योगदान ग्रॉस स्‍टेट वैल्‍यू एडेड का आधे से भी अधिक था

आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में भारत में निजी क्षेत्र के निष्‍पादन की एक विशिष्‍ट राज्‍य-वार तुलना दर्शाई गई है।

32 राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों (यूटी) में से, 15 राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों में सेवा क्षेत्र का निष्‍पादन सबसे अच्‍छा पाया गया, जिसका योगदान ग्रॉस स्‍टेट वैल्‍यू एडेड (जीएसवीए) का आधे से भी अधिक था। अधिकतर राज्‍यों में प्रमुख सेवाओं में व्‍यापार, होटल और रेस्‍टोरेंट तथा उनके बाद रियल स्‍टेट, आवास क्षेत्र का स्‍वामित्‍व और बिजनेस सेवाएं थीं।

तथापि सेवा जीएसवीए के अंश और वृद्धि के आधार पर, उसमें काफी अंतर है। 32 राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों, जिनके लिए 2016-17 के लिए डाटा उपलब्‍ध है (या वर्तमान वर्ष, जिसके लिए डाटा उपलब्‍ध है), में से सेवा जीएसवीए अंश के आधार पर, दिल्‍ली और चंडीगढ़ 80 प्रतिशत अंश के साथ शीर्ष पर हैं, जबकि 31.7 प्रतिशत अंश के साथ सिक्किम सबसे निचले स्‍थान पर है। सेवा जीएसवीए के आधार पर, वर्ष 2016-17 में 14.5 प्रतिशत और 7.0 प्रतिशत के साथ क्रमश: बिहार शीर्ष स्‍थान पर और उत्‍तर प्रदेश निचले स्‍थान पर है।


(■) प्रमुख सेवाएं : क्षेत्रवार प्रदर्शन और सरकार की हाल की कुछ नीतियां जिससे विकास में तेजी आई

• 2017-18 के दौरान जीवीए की वृद्धि दर में सेवा क्षेत्र की कुल 72.5 फीसदी हिस्सेदारी रही

केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि भारत के सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में 55.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ सेवा क्षेत्र भारत के आर्थिक विकास का मुख्य घटक बना रहा। 2017-18 के सकल मूल्य वर्धन में सेवा क्षेत्र का 72.5 प्रतिशत हिस्सेदारी रही। जबकि सेवा क्षेत्र के 8.3 फीसदी की दर से वृद्धि करने की संभावना है। 2017-18 में सेवा क्षेत्र में निर्यात के 16.2 प्रतिशत रहा। डिजिटलीकरण, ई-वीजा, लॉजिस्टिक क्षेत्र में बुनियादी ढांचा, स्टार्टअप, हाउसिंग क्षेत्र की योजना सहित कई योजनाएं शुरू की है जिससे सेवा क्षेत्र में तेजी आने की उम्मीद है।

• पर्यटन

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के विश्व पर्यटन संगठन (दिसंबर 2017) के अनुसार 2016 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटक आगमन कुल मिलाकर 1.2 बिलियन तक पहुंच गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 46 मिलियन अधिक रहा। हालांकि 3.9 प्रतिशत की वृद्धि दर 2015(4.6प्रतिशत) की तुलना में मामूली सी कम थी। भारत में 2016 में 8.8 मिलियन विदेशी पर्यटक आए। (9.7 प्रतिशत) वृद्धि हुई है और 22.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर की प्राप्ति हुई (8.8 प्रतिशत) की वृद्धि। वृद्धि के साथ पर्यटन क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। पर्यटन मंत्रालय के आंकडों के अनुसार 2017 के दौरान 15.6 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 10.2 मिलियन विदेशी पर्यटकों का आगमन हुआ जबकि 2016 की तुलना में 20.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 27.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर विदेशी मुद्रा अर्जित की गई।

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई उपाय किए है। हाल ही में उठाए गए कदमों में 163 देशों के नागरिकों के लिए पर्यटकों/मेडिकल एवं बिजनेस की तीन श्रेणियों के अंतर्गत ई-वीजा की शुरूआत की गई। विभिन्न चैनलों पर 2017-18 के लिए ग्लोबल मीडिया अभियान की शुरूआत भारत में विश्व धरोहर स्थलों को लोकप्रिय बनाने के लिए ‘द हेरिटेज ट्रेन’, भारतीयों का अपने देश के प्रति जागरूक करने की दृष्टि से ‘देखों अपना देश’ जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।

• सूचना प्रौद्योगिकी – बीपीएम सेवाएं

9.19 भारत की सूचना प्रौद्योगिकी-बीपीएम में 8.1 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई और नासकॉम के आंकडों के अनुसार 2015-16 में 129.4 बिलियन अमरीकी डॉलर से बढ़कर 2016-17 में 139.9 बिलियन अमरीकी डॉलर (ई-कॉमर्स तथा हार्डवेयर को छोड़कर) हो गया। आईटी-बीपीएम निर्यातों में 7.6 प्रतिशत वृद्धि हुई और इसी अवधि के दौरान यह 107.8 बिलियन अमरीकी डॉलर से बढ़कर 116.1 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गया। 2016-17 में ई-कॉमर्स बाजार में 19.1 प्रतिशत वृद्धि दर के साथ व्यापार तकरीबन 33 बिलियन अमरीकी डॉलर होने का अनुमान है। बहरहाल, आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, सॉफ्टवेयर निर्यातों में वर्ष 2016-17 में (-) 0.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। 217-18व पहली छमाही में इसमें 2.3 प्रतिशत का इजाफा हुआ। अमेरिका-इंग्लैंड यूरोपियन यूनियन देशों के आईटी-आईटीईएस निर्यातकों ने तकरीबन 90 प्रतिशत का योगदान है। हालांकि इन पारंपरिक देशों में नई चुनौतियां उभरकर सामने आ रही है। इपेक लैटिन अमेरिका और मिडल ईस्ट एशियाई देशों से मांग बढ़ रही है और यूरोप महाद्वीप जापान, चीन, अफ्रीका में विस्तारण के लिए औसत प्राप्त हो रहे हैं।

• स्वास्थ्य संपदा और आवासन

स्वास्थ्य संपदा क्षेत्र का हिस्सा जिसमें मकानों का स्वामित्व भी शामिल है, 2015-16 में भारत की संपदा जीवीए का 7.7 प्रतिशत था, पिछले तीन वर्षों में इस क्षेत्र की विभिन्न कमी आई है जो कि 2013-14 में 7.5 प्रतिशत से कम होकर 2014-15 में 6.6 प्रतिशत हो गई और यहां 215-16 में और घटकर 4.4 प्रतिशत हो गई। ऐसा मुख्यतः रिहाइशी क्षेत्र के स्वामित्व की वृद्धि के कारण हुआ जो कि समग्र जीवीए का 6.8 प्रतिशत था जो 2013-14 में 7.2 प्रतिशत घटकर 2015-16 में 3.2 प्रतिशत हो गया। निर्माण क्षेत्र जिसमें इमारतें, बांध, पुल, सड़क इत्यादि शामिल है, की वृद्धि में कमी आई जो 2015-16 में 5.4 प्रतिशत से कम होकर 2016-17 में 1.7 प्रतिशत रह गया। हालांकि भारतीय रियल स्टेट निवेश के मामले में बढ़ोत्तरी करता हुआ दिख रहा है। 2017 के दौरान इस क्षेत्र में 257 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश हुआ जो कि 2016 की तुलना में दुगना है।

• अनुसंधान और विकास

अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) के लिए अलग से कोई शीर्षक नहीं है जिसमें व्यवसायिक, वैज्ञानिक तकनीकी गतिविधियों की हिस्सेदारी होती है। इन सेवाओं में क्रमशः 2014-15 और 2015-16 में 17.5 प्रतिशत और 41.1 की वृद्धि हुई है। भारत आधारित आर एंड डी सेवाओं में 22 प्रतिशत की वैश्विक बाजार की हिस्सेदारी से 12.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आर एंड डी क्षेत्र में भारत का कुल खर्च जीडीपी का लगभग एक प्रतिशत है। ग्लोबल इन्वेशन इंडेक्स (जीआईआई) 2017 में भारत 127 देशों में 60वें स्थान पर है। 2016 में यह 66th वें पायदान पर था।

• अंतरिक्ष

उपग्रह प्रक्षेपण के मामले में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में शानदार प्रदर्शन किया है। मार्च 2017 में 254 उपग्रहों के के प्रक्षेपण के साथ भारत ने सैटलाइट के क्षेत्र में मिसाल कायम की। इससे भारत को काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। 2015-16 और 2016-17 क्रमशः 394 करोड़ और 275 करोड़ रूपये का उपग्रह प्रक्षेपण से राजस्व हासिल हुआ। इसी तरह 2014-15 में 149 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल हुआ।

वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण से प्राप्त होने वाले राजस्व में भारत की हिस्सेदारी बढ़ रही है। इसमें 2015-16 में 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। 2014-15 में 0.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।


(■) जलवायु परिवर्तन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता सतत विकास के लक्ष्यों में परिलक्षित होती है : आर्थिक सर्वेक्षण

सतत विकास, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन प्रखंड, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का उल्लेख करता है। यह सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों से स्पष्ट होता है। पेरिस घोषणा पत्र में उत्सर्जन स्तर को 2030 तक 2005 के स्तर का 33-35 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। समानता और सहभागी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए भारत ने जलवायु परिवर्तन के खतरे की जवाबी कार्रवाई प्रणाली को सशक्त बनाया है।

सतत विकास के संदर्भ में सर्वेक्षण कहता है कि भारत की शहरी जनसंख्या 2031 तक 600 मिलियन हो जाएगी। शहरी स्थानीय निकाय नगर पालिका बॉन्ड, सार्वजनिक निजी समझौता तथा क्रेडिट जोखिम गारंटी जैसे वित्तीय व्यवस्थाओं के माध्यम से संसाधन निर्माण करते हैं। सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आधार है- सतत, आधुनिक और सस्ती ऊर्जा। 30 नवंबर, 2017 तक कुल ऊर्जा क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा 18 प्रतिशत था और यह पिछले 10 वर्षों में तीन गुणा बढ़ा है।

जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता के संदर्भ में सर्वेक्षण ने 8 वैश्विक प्रौद्योगिकी निगरानी समूहों के गठन का उल्लेख किया है। इससे जलवायु परिवर्तन कार्य योजना जो 2014 में शुरू हुई थी, को 2017-18 से 2019-20 तक का विस्तार दिया गया है। इसके लिए 132.4 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की गई है। राष्ट्रीय अनुकूलन कोष को भी 31 मार्च, 2020 तक विस्तार दिया गया है। इसके लिए 364 करोड़ रुपये की धनराशि निर्धारित की गई है।


(■) भारत को ज्ञान प्रदाता के रूप में विकसित होने की आवश्यकता है : आर्थिक सर्वेक्षण

विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में उभरने के पश्चात् भारत को ज्ञान के एक उपभोक्ता के स्थान पर ज्ञान प्रदाता के रूप में परिवर्तित होने की आवश्यकता है।

केन्द्रीय वित्त और कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली द्वारा संसद के पटल पर प्रस्तुत किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में इस बात पर जोर दिया गया है।

एक तरफ वैज्ञानिक शोध और ज्ञान का विस्तार हो रहा है और दूसरी तरफ भारत के युवा इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रबंधन एवं सरकारी नौकरियों को उच्च प्राथमिकता देते हैं। भारत को वैज्ञानिक उद्यम के क्षेत्र में उत्साह को बढ़ाने व लक्ष्य को पुर्ननिर्धारित करने की आवश्यकता है ताकि अधिक से अधिक युवा वैज्ञानिक उद्यम के प्रति आकर्षित हो सकें। इससे ज्ञान भंडार का आधार मजबूत होगा। विज्ञान में निवेश, भारत की सुरक्षा व्यवस्था की मूलभूत आवश्यकता है। नागरिकों की सुरक्षा के लिए, जलवायु परिवर्तन से होने वाली अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए तथा नए खतरों जैसे साइबर युद्ध, ड्रोन जैसी स्वायत्त सैन्य प्रणाली से राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने की चुनौती के लिए भी विज्ञान में निवेश की आवश्यकता है।


(■) आर्थिक सर्वेक्षण में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था से जुड़े 10 नए आर्थिक तथ्‍यों की ओर ध्‍यान आकर्षित किया गया है

आर्थिक सर्वेक्षण में 10 नए आर्थिक तथ्‍यों पर प्रकाश डालने के लिए नए आंकड़ों के विश्‍लेषण पर भरोसा जताया गया है :

1. वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को एक नया परिप्रेक्ष्‍य दिया है और नए आंकड़े उभर कर सामने आए हैं। अप्रत्‍यक्ष करदाताओं की संख्‍या में 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी तरह स्‍वैच्छिक पंजीकरण, विशेषकर वैसे छोटे उद्यमों द्वारा कराए गए पंजीकरण में भी उल्‍लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो बड़े उद्यमों से खरीदारी करते हैं, क्‍योंकि ये स्‍वयं भी इनपुट टैक्‍स क्रेडिट से लाभ उठाना चाहते हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि नई प्रणाली अपनाने से प्रमुख उत्‍पादक राज्‍यों के कर संग्रह में कमी आने की आशंका निराधार साबित हुई है, क्‍योंकि राज्‍यों के बीच जीएसटी आधार के वितरण को उनकी अर्थव्‍यवस्‍थाओं के आकार से जोड़ दिया गया है।

इसी तरह नवम्‍बर, 2016 से लेकर अब तक व्‍यक्तिगत आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्‍या में लगभग 18 लाख की वृद्धि दर्ज की गई है।

2. भारत का औपचारिक क्षेत्र, विशेषकर औपचारिक गैर-कृषि पे-रोल को वर्तमान अनुमान की तुलना में बहुत अधिक पाया गया है। यह स्‍पष्‍ट हुआ है कि जब सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों जैसे कि ईपीएफओ/ईएसआईसी की दृष्टि से ‘औपचारिकता’ को परिभाषित किया गया, तब औपचारिक क्षेत्र से जुड़े पे-रोल को गैर-कृषि श्रम बल का लगभग 31 प्रतिशत पाया गया। जब ‘औपचारिकता’ को जीएसटी दायरे का हिस्‍सा होने की दृष्टि से परिभाषित किया गया, तब इस तरह के औपचारिक क्षेत्र संबंधी पे-रोल की हिस्‍सेदारी 53 प्रतिशत पाई गई।

3. भारत के इतिहास में पहली बार राज्‍यों के अंतर्राष्‍ट्रीय निर्यात से जुड़े आंकड़ों को आर्थिक सर्वेक्षण में परिलक्षित किया गया है। इन आंकड़ों से निर्यात प्रदर्शन और राज्‍यों में रहने वाले लोगों के जीवन स्‍तर के बीच मजबूत आपसी जुड़ाव के बारे में संकेत मिलता है। वैसे राज्‍य जो अंतर्राष्‍ट्रीय निर्यात करते हैं और अन्‍य राज्‍यों के साथ व्‍यापार करते हैं, वे अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध अधिक पाए गए हैं। इस तरह का आपसी जुड़ाव खुशहाली और अंतर्राष्‍ट्रीय व्‍यापार के बीच कहीं अ‍धिक पाया गया है।

4. भारत से होने वाला निर्यात इस दृष्टि से आसमान्‍य है कि निर्यात में सबसे बड़ी कंपनियों की हिस्‍सेदारी अपेक्षाकृत बहुत कम पाई गई है, जबकि अन्‍य तुलनीय राष्‍ट्रों में इसके विपरीत स्थिति देखी जा रही है। निर्यात में शीर्ष एक प्रतिशत भारतीय कंपनियों की हिस्‍सेदारी केवल 38 प्रतिशत आंकी गई है, जबकि ठीक इसके विपरीत कई देशों में इन शीर्ष कंपनियों की हिस्‍सेदारी बहुत अधिक पाई गई है (ब्राजील, जर्मनी, मेक्सिको और अमेरिका में क्रमश: 72, 68, 67 और 55 प्रतिशत हिस्‍सेदारी है)। शीर्ष 5 अथवा 10 प्रतिशत भारतीय कंपनियों के मामले में भी कुछ इसी तरह की स्थिति देखी जा रही है।

5. इस ओर ध्‍यान आकर्षित किया गया है कि राज्‍यों के शुल्‍कों में छूट (आरओएसएल) से सिले-सिलाए परिधानों (मानव निर्मित फाइबर) का निर्यात लगभग 16 प्रतिशत बढ़ गया है, जबकि अन्‍य के मामलों में ऐसा नहीं देखा गया है।

6. आंकड़ों के जरिए इस तथ्‍य पर भी प्रकाश डाला गया है कि भारतीय समाज में लड़कों के जन्‍म के प्रति तीव्र इच्‍छा दिखाई जाती है। आर्थिक सर्वेक्षण में इस ओर भी ध्‍यान दिलाया गया है कि अधिकतर माता-पिता तब तक बच्‍चों की संख्‍या बढ़ाते रहते हैं, जब तक कि उनके यहां जन्‍म लेने वाले लड़कों की संख्‍या अच्‍छी-खासी नहीं हो जाती है। सर्वेक्षण में विभिन्‍न तरह के परिदृश्‍य का विवरण दिया गया है, जिससे बालक-बालिका अनुपात के अपेक्षाकृत कम रहने का पता चलता है। इसके साथ ही आर्थिक सर्वेक्षण में भारत और इंडोनेशिया में जन्‍म लेने वाले बालक-बालिका अनुपात की भी तुलना की गई है।

7. सर्वेक्षण में यह बात भी रेखांकित की गई है कि भारत में कर विभागों ने कई कर विवादों में चुनौती दी है, लेकिन इसमें सफलता की दर भी कम रही है। यह दर 30 प्रतिशत से कम आंकी गई है। लगभग 66 प्रतिशत लंबित मुकदमे दांव पर लगी रकम का केवल 1.8 प्रतिशत हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि 0.2 प्रतिशत मुकदमे दांव पर लगी रकम का 56 प्रतिशत हैं।

8. आंकड़ों का विवरण देते हुए आर्थिक सर्वेक्षण में इस ओर ध्‍यान दिलाया गया है कि बचत में वृद्धि से आर्थिक विकास नहीं हुआ, जबकि निवेश में वृद्धि से आर्थिक विकास निश्चित तौर पर हुआ है।

9. आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात का उल्‍लेख किया गया है कि भारतीय राज्‍यों और अन्‍य स्‍थानीय सरकारों, जिन्‍हें कर संग्रह का अधिकार दिया गया है, का प्रत्‍यक्ष कर संग्रह अन्‍य संघीय राष्‍ट्रों के समकक्षों की तुलना में बहुत कम पाया गया है। आर्थिक सर्वेक्षण में भारत, ब्राजील और जर्मनी में स्‍थानीय सरकारों के प्रत्‍यक्ष कर-कुल राजस्‍व अनुपातों की तुलनात्‍मक तस्‍वीर पेश की गई है।

10. आर्थिक सर्वेक्षण में भारतीय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन दर्शाने वाले स्‍थलों और इसके कारण कृषि पैदावार पर हुए व्‍यापक प्रतिकूल असर को भी रेखांकित किया गया है। तापमान में हुई अत्‍यधिक बढ़ोतरी के साथ-साथ बारिश में हुई कमी को भी भारतीय नक्‍शे पर दर्शाया गया है। इसके साथ ही इस तरह के आंकड़ों से कृषि पैदावार में हुए परिवर्तनों को भी ग्राफ में दर्शाया गया है। इस तरह का असर सिंचित क्षेत्रों की तुलना में गैर-सिंचित क्षेत्रों में दोगुना पाया गया है।


(■) भारत को अभी ‘लेट कंवर्जर स्टाजल’ का सामना नहीं करना पड़ रहा है

● विकास चक्र को कायम रखने हेतु मानव पूंजी और कृषि उत्‍पादकता में त्‍वरित सुधार किए जाने की विशेष आवश्‍यकता

एक अध्‍याय में सर्वेक्षण ने यह समीक्षा की है कि भारत के लिए आवश्‍यक ‘लेट कंवर्जर स्टाजल’ की अवधारणाएं किस हद तक सही हैं और क्या् इस स्टासल से आने वाले वर्षों में भारत के विकास पर प्रभाव पड़ने की संभावना है।

सर्वेक्षण में यह दर्शाया गया है कि वर्तमान युग आर्थिक समन्वसयन का है, जहां भारत सहित गरीब देश, समृद्ध देशों की तुलना में ज्या‍दा तेजी से आगे बढ़े हैं और उन्हों्ने अपने जीवन-यापन की स्थिति में अंतराल को भरा है। 1960 में भारत एक कम आय वाला देश से भारत 2008 में निम्नत मध्यै आय वाला देश बन गया था और अब यह मध्या आय स्तहर हासिल करने की दिशा में प्रयासरत है। तथापि, ऐसी कुछ चिंताएं हैं कि भारत जैसे लेट कंवर्जर देशों के लिए समन्व य की प्रक्रिया में सुस्तीम आ सकती है, जो वैश्विक वित्तीजय संकट के पश्चा त इस परिवर्तन को सार्थक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। सर्वेक्षण में यह कहा गया है कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया में आवश्यसक ‘लेट कंवर्जर स्टाजल’ की चिंताओं से निपटने के लिए भारत को चार चुनौतियों का हल करना होगा। इन चार चुनौतियों में वैश्विकीकरण के विरुद्ध विवाद, जिससे निर्यात अवसरों में कमी आती है, कम उत्पादकता क्षेत्रों से उच्च उत्पापदकता क्षेत्रों (ढांचागत परिवर्तन) में संसाधनों के अंतरण में समस्याएं, प्राद्योगिकी-सघन कार्यस्थारन के मांगों के अनुरूप मानव पूंजी के उन्ननयन की चुनौती तथा जलवायु परिवर्तन-प्रेरित कृषि दबाव से निपटना शामिल है।

क. वैश्विकरण के विरुद्ध बढ़ता अस्वीीकरण या विवाद –

जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे अर्ली कंवर्जर देश अपने कंवर्जेंस अवधियों के 30 वर्षों तक 15 प्रतिशत से अधिक पोस्ट एवरेज विकास दर प्राप्तज करने में सक्षम रहे। तथापि, भारत जैसे लेट कंवर्जर देशों के लिए व्याकपार वातावरण बदल चुका है। त्वंरित वैश्विकरण के विरुद्ध विकसित देशों में विवाद से 2011 से विश्वव व्यालपार जीडीपी अनुपातों में गिरावट आई है। इसका अर्थ है कि निर्यात अवसरों में गिरावट, विशेष रूप से जब विकसित देशों में राजनीति निचले जीडीपी अनुपातों की दिशा में प्रत्यवक्ष रूप से अग्रसर हो रही है।

ख. कम उत्पा‍दकता वाले क्षेत्रों से उच्च उत्पानदकता वाले क्षेत्रों में संसाधनों के अंतरण की कठिनाइयां या बाधित ढांचागत परिवर्तन

सफल विकास के लिए संसाधनों को कम उत्‍पादकता वाले क्षेत्रों से उच्‍च उत्‍पादकता वाले क्षेत्रों में परिवर्तित किए जाने की आवश्‍यकता होती है। ढांचागत परिवर्तन तब निष्‍फल होता है जब अनौपचारिक, कम उत्पाजदकता वाले क्षेत्रों से मामूली रूप से कम अनौपचारिक या अधिक उत्पाादकता वाले क्षेत्रों में संसाधनों को परिवर्तित किया जाता है। भारत में अध्यपयनों में समग्र विकास और बेहतर विकास के बीच एक कमजोर सह-संबंध दर्शाया गया है।

ग. प्रौद्योगिक-सघन कार्यबल की मांगों के अनुरूप मानव पूंजी का उन्नकयन

भारत जैसे लेट कंवर्जर देश ढांचागत परिवर्तन के लिए आवश्य्क प्राथमिक शिक्षा उपलब्धी कराने में भी विफल रहे हैं। सर्वेक्षण के निष्क र्ष में यह दर्शाया गया है कि 3 से 8 वीं तक की कक्षाओं में लगभग 40 से 50 प्रतिशत ग्रामीण बच्चेय प्राथमिक शिक्षण मानकों की पूर्ति नहीं कर सकते हैं। यह विफलता काफी महंगी पड़ेगी क्योंीकि नये ढांचागत परिवर्तन के लिए मानव पूंजी क्षेत्र और दूर चला जाएगा और प्रौद्योगिकी कौशल युक्तढ मानव पूंजी की मांग करेगी। फिर भी, यह एक अच्छीज बात है कि 2014 से इस दिशा में सुधार आने लगा है।

घ. जलवायु परिवर्तन-प्रेरित कृषि दबाव

विकासशील देशों की तुलना में, विकसित देशों की कृषि उत्‍पादकता की विकास दरें निरंतर अधिक रहीं हैं। भारत के संबंध में कृषि उत्‍पादकता विकास दर स्‍थायी रही है, जो कि पिछले 30 वर्षों के दौरान औसतन रूप से लगभग 3 प्रतिशत रही है। तापमान में वृद्धि से कृषि प्रभावित होती है और बरसात पर काफी ज्याशदा निर्भर रहती है। लेट कंवर्जर देशों के लिए कृषि उत्पापदकता न केवल लोगों के आहार के लिए महत्वनपूर्ण है, बल्कि उन क्षेत्रों में मानव पूंजी उपलब्धंता सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वहपूर्ण है जो कृषि से आधुनिक क्षेत्रों की ओर तब्दीाल हो रहे हैं।

सर्वेक्षण में यह वर्णन किया गया है कि भारत में विकास, कम उत्पाोदकता वाले क्षेत्रों से उच्चे उत्पायदकता और गत्यावत्म क क्षेत्रों में श्रम संसाधनों के सीमित अंतरण के कारण हुआ है और यह कृषि विकास दर में अपेक्षाकृत मामूली वृद्धि के बावजूद है। तेजी से बढ़ती मानव पूंजी भारत की गत्याकत्मपक विकास दर चक्र को कायम रखने के लिए काफी महत्वतपूर्ण होगी। बेहतर स्था यी विकास हासिल करने हेतु जलवायु परिवर्तन और जल अभाव जैसे ज्वमलंत मुद्दों की तुलना में, तेजी से बढ़ती कृषि उत्पाुदकता की भूमिका अहम होगी। आज भारत को ‘लेट कंवर्जर स्टा,ल’ का सामना नहीं करना पड़ रहा है, लेकिन इससे बचे रहने के लिए भारत को समय पर सही कदम उठाने होंगे।

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