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कमलनाथ के सुशासन के संकल्प के आगे घिरी भाजपा की भ्रष्टाचारी नीतियों वाली सरकार



--विजया पाठक, एडिटर - जगत विजन, भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

■यदि कमलनाथ को पांच साल मिलते, तो मध्यप्रदेश की तस्वीर आज कुछ और होती

■कमलनाथ ने एक स्वस्थ और भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश की थी कल्पना

देश में विकास के नाम पर बड़े-बड़े निर्माण कार्यों की घोषणाएं होती हैं, करोड़ों और अरबों रुपये की परियोजनाओं का शिलान्यास किया जाता है और जनता को बेहतर सुविधाओं के सपने दिखाए जाते हैं। लेकिन जब इन्हीं परियोजनाओं की गुणवत्ता, खर्च और वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठने लगते हैं, तो सरकारों की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होने लगते हैं। धार्मिक आस्था से जुड़े स्थलों से लेकर सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं तक, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमलनाथ का एक ही सवाल है- आखिर सरकारी धन के उपयोग की जवाबदेही कौन तय करेगा? कमलनाथ ने यह सवाल सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से उठाया, जिस पर प्रदेश की जनता ने डॉ. मोहन यादव की सरकार को जबरदस्त ढंग से घेरा है। अपनी पोस्ट में कमलनाथ ने लिखा कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में महाकाल लोक निर्माण के विस्तार की योजना और आयोजनों के दौरान फर्जी बिलों के माध्यम से करोड़ों रुपये के घोटाले सामने आये हैं। इसी मुद्दे पर कमलनाथ ने भाजपा सरकार पर हमला किया है। कमलनाथ लंबे समय से पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित को शासन की प्राथमिकता बनाने की बात करते रहे हैं।

●कमलनाथ का 15 महीने का कार्यकाल

मध्यप्रदेश की राजनीति में कमलनाथ का मुख्यमंत्री कार्यकाल भले ही लगभग 15 महीने तक सीमित रहा, लेकिन कांग्रेस समर्थकों के लिए यह अवधि एक अधूरी संभावना का प्रतीक है। दिसंबर 2018 में सत्ता संभालने के बाद उनकी सरकार ने किसानों की कर्जमाफी, सामाजिक कल्याण और प्रशासनिक प्राथमिकताओं में बदलाव जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। उनकी सरकार ने जनता से किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में कदम उठाने का दावा किया था। वरिष्ठ राजनीतिकों के अनुसार यदि कमलनाथ को पांच साल का पूरा अवसर मिलता तो वे अपनी नीतियों को अधिक व्यापक रूप से लागू कर सकते थे। कृषि, उद्योग, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सुधारों के क्षेत्र में उनकी सरकार की योजनाओं को स्थायी रूप देने का अवसर मिलता। एक स्थिर सरकार दीर्घकालिक योजनाओं को लागू करने, उनके परिणामों की समीक्षा करने और कमियों को दूर करने की बेहतर स्थिति में होती है। यही कारण है कि आज भी उनके अधूरे कार्यकाल को मध्यप्रदेश की राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ मानते हैं।

●वैकल्पिक मॉडल जनता के सामने रखें

कमलनाथ और कांग्रेस के लिए यह अवसर है कि वे केवल भाजपा की आलोचना तक सीमित न रहें, बल्कि पारदर्शी शासन का ठोस वैकल्पिक मॉडल भी जनता के सामने रखें। सरकारी ठेकों की सार्वजनिक जानकारी, भुगतान का डिजिटल रिकॉर्ड, निर्माण कार्यों का स्वतंत्र ऑडिट, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और दोषियों को दंडित करने की व्यवस्था ऐसे कदम हैं, जिनसे भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस मध्यप्रदेश को ऐसी व्यवस्था देने का स्पष्ट संकल्प सामने रखती है, तो उनकी राजनीति को केवल विरोध की नहीं, बल्कि सकारात्मक विकल्प की राजनीति के रूप में भी देखा जा सकता है।

●पांच साल मिलते तो बदल सकती थी मध्यप्रदेश की तस्वीर

आज यह सवाल हर किसी के मन में है कि यदि कमलनाथ को पांच साल तक सरकार चलाने का अवसर मिलता, तो मध्यप्रदेश कहां होता। कमलनाथ के विजन अनुसार वे मध्यप्रदेश को ऐसे प्रदेश के रूप में विकसित करना चाह रहे थे जहां सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक पहुंचे, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता से समझौता न हो, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, युवाओं को रोज़गार के अवसर मिलें और सरकारी विभागों में जवाबदेही सुनिश्चित हो। ऐसे मध्यप्रदेश का निर्माण किसी एक नेता के दावे से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, पारदर्शी नीतियों और प्रभावी निगरानी से संभव है। कमलनाथ को यदि पूरा कार्यकाल मिलता, तो उनकी सरकार को अपने वादों और नीतियों के परिणाम साबित करने का अधिक समय अवश्य मिलता। जनता तब उनके कामकाज का मूल्यांकन अधिक व्यापक आधार पर कर सकती थी।

●सत्ता परिवर्तन और अधूरे रह गए जनादेश का सवाल

मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने और उनके समर्थक विधायकों के इस्तीफों के बाद मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई। अंततः कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और भाजपा की सरकार सत्ता में आई। प्रदेश की जनता इस घटनाक्रम को जनादेश के साथ विश्वासघात मानती है। जानकारों के अनुसार, जनता ने 2018 में भाजपा के बजाय कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर दिया था और सरकार को अपना कार्यकाल पूरा करने दिया जाना चाहिए था। इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद प्रदेश की सत्ता का समीकरण बदल गया। इसके बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार चलता रहा। यदि कमलनाथ की सरकार गिराई नहीं जाती, तो प्रदेश में विकास और प्रशासनिक सुधारों की दिशा अलग हो सकती थी।

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