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एम.एल.सी. चुनाव और बैलेट पेपर की बेवफाई



--के. विश्वदेव राव, महासचिव - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

कहते हैं, चौसर की बिसात बिछाने वाला यह मानकर चलता है कि पासे उसी के इशारे पर चलेंगे। युधिष्ठिर भी यही मानकर बैठे थे। बिसात उनकी भी थी, नियम उनके भी, और हारे भी वे। महाभारत के उस प्रसंग को इतिहास का प्रमाण न मानें, तो भी वह एक प्रतीक तो है ही: जो खेल अपनी शर्तों पर खेला जाए, उसमें हार का दंश दोगुना होता है। 28 विधान परिषद सीटों के नतीजे पढ़ते हुए यही प्रसंग बार-बार याद आता है।

तथ्य संक्षेप में यह है कि चार राज्यों की अट्ठाईस सीटों पर 23 अक्तूबर को “मतपत्रों” से मतदान हुआ और 28 अक्तूबर को गिनती। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार भाजपा-राजग को सोलह सीटें मिलीं, अकेले भाजपा को तेरह, और कांग्रेस को केवल एक: नागपुर, जिसका ऐलान चालीस घंटे से अधिक चली गिनती के बाद अगली सुबह हुआ। जो पार्टी दो साल से यह कहती रही कि मतपत्र लौटेंगे तो चुनाव पर भरोसा लौटेगा, उसके लिए मतपत्र का यह फैसला असहज करने वाला है। पर मेरी दृष्टि में असल बात "एक" की संख्या नहीं, उन चेहरों की है जो कांग्रेस की जगह मतपत्र पर उभरे।

प्रधानमंत्री ने तकनीक को ही संदेश बना दिया। उन्होंने सवाल उछाला कि बताइए, कांग्रेस को कितनी सीटें मिलीं। उत्तर “एक” है, पर यथार्थ यह भी है कि उसी मतपत्र ने महाविकास अघाड़ी को महाराष्ट्र की पाँच में से तीन और समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश की ग्यारह में से पाँच सीटें दीं, जिनमें दो ऐसी थीं जो भाजपा के पास थीं। यानी मतपत्र की बहस कांग्रेस के काम नहीं आई। जिस तर्क को उसने दो साल सींचा, उसकी फसल सहयोगियों ने काट ली। अब सवाल यह है कि जो पार्टी दूसरों की जीत में अपनी दलील का प्रमाण ढूँढ़ती है, वह अपनी हार में क्या ढूँढ़ेगी?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और बसपा ने प्रत्याशी ही नहीं उतारे। दोनों ने कहा कि वे 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए संसाधन बचा रहे हैं। इसे शालीन भाषा में रणनीतिक संयम कहा जा सकता है, पर सीधी भाषा में "जब हाथ खाली हो तो मुट्ठी बाँधने का दिखावा" भी कहते हैं। ग्यारह सीटों पर मुकाबला सीधा भाजपा बनाम सपा रहा। भाजपा ने मेरठ की दोनों सीटें, आगरा स्नातक, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक, लखनऊ शिक्षक और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सहित छह जीतीं। सपा को वाराणसी स्नातक, वाराणसी शिक्षक, इलाहाबाद-झाँसी स्नातक, लखनऊ स्नातक और आगरा-अलीगढ़ शिक्षक मिलीं। गौर करने की बात है कि वाराणसी शिक्षक में लाल बिहारी यादव प्रधानमंत्री के अपने संसदीय क्षेत्र में सीट बचा ले गए। यह बढ़त नहीं, पकड़ थी, और पकड़ वही बनती है जहाँ संगठन पहले से मौजूद हो। लखनऊ स्नातक में कांति सिंह पटेल ने भाजपा के परिषद सदस्य अवनीश कुमार सिंह को हराकर बता दिया कि राजधानी की हवा भी स्थायी नहीं होती।

कर्नाटक में कांग्रेस की कठिनाई भौगोलिक नहीं रहती, संरचनात्मक हो जाती है। उपमुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री बने डी. के. शिवकुमार के नेतृत्व में, विधानसभा में पूर्ण बहुमत के बावजूद, पार्टी चारों परिषद सीटें हार गई। तीन सीटें भाजपा ने जीतीं: उत्तर-पूर्व शिक्षक, जो कलबुर्गी यानी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के गृह-जनपद से होकर गुजरती है, पश्चिम स्नातक और दक्षिण-पूर्व स्नातक। चौथी सीट का विशेष महत्त्व है। बेंगलुरु शिक्षक में जद (एस) के ए. पी. रंगनाथ ने कांग्रेस के मौजूदा सदस्य पुट्टण्णा को 908 मतों से हराया, 10,810 बनाम 9,902।

बिहार में तस्वीर और तीखी है। दरभंगा शिक्षक में प्रशांत किशोर के जन सुराज के सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के निवर्तमान सदस्य मदन मोहन झा को 324 मतों से पराजित किया, 2,574 बनाम 2,187, जबकि माकपा के रामदेव राय को 1,498 मत मिले। जिस दल के पास विधायिका में उपस्थिति नहीं, कैडर की कोई पुरानी पूँजी नहीं, उसने अपने पहले ही परिषद चुनाव में एक पुराने खिलाड़ी की कुर्सी खिसका दी।

बिहार की आठ सीटों में राजग को चार मिलीं, राजद ने पटना शिक्षक में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को पछाड़ा, दो निर्दलीय जीते, और कांग्रेस के हिस्से कुछ नहीं आया।

महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी ने तीन, भाजपा ने एक और शिवसेना ने एक सीट जीती। राकांपा (शरदचंद्र पवार) ने पुणे स्नातक भाजपा से छीना और छत्रपति संभाजीनगर स्नातक में निवर्तमान सदस्य सतीश चव्हाण को हरा दिया। पुणे शिक्षक में भाजपा के कौस्तुभ गावड़े ने कांग्रेस के जयंत आसगावकर को गिरा दिया। नागपुर की कांग्रेसी जीत असली थी, पर संकरी। हस्तांतरित मतों की गिनती में वांजरी को 10,601 की बढ़त मिली, जो स्वतंत्र प्रत्याशी कराले के प्रथम-वरीयता मतों का लगभग 44 प्रतिशत है, और कोहले पर जीत 3,271 मतों की रही। "नागपुर अब भाजपा का गढ़ नहीं" वाला दावा इकतालीस घंटे की गिनती के बाद विजेता की स्वाभाविक वाणी है, और शायद सच भी हो। पर यह एक सीट है, जो एक एक मौजूदा सदस्य ने व्यक्तिगत पकड़ और वरीयता-गणित से जीती, उसी राज्य में जहाँ कांग्रेस का अपना एक निवर्तमान सदस्य दूसरी जगह हार गया।

इन अट्ठाईस सीटों से जितना सिद्ध होता है, उतना ही नहीं भी होता। यह भाजपा पर राष्ट्रीय जनादेश नहीं है। उसने लखनऊ स्नातक और आगरा-अलीगढ़ शिक्षक गँवाए, पुणे स्नातक और संभाजीनगर गँवाए, और महाराष्ट्र में सत्ताधारी गठबंधन पाँच में से केवल दो जीत पाया।

फिलवक्त फैसला कांग्रेस पर है, और वह "सत्ता-विरोधी लहर" जैसे सुविधाजनक शब्द से कहीं अधिक विशिष्ट है। जहाँ कांग्रेस का वोट था, वहाँ उसे वह दल ले गया जिसकी स्थानीय मशीनरी बेहतर थी, उत्तर प्रदेश में सपा, बिहार में जन सुराज, महाराष्ट्र में राकांपा (श.प.) और शिवसेना, कर्नाटक में जद (एस)। कांग्रेस हारी कम है, हटाई ज्यादा गई है। स्नातकों और शिक्षकों का पंजीकरण घर-घर जाकर करने जैसा नीरस, अनाकर्षक काम अब दूसरे कर रहे हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए प्रश्न यह नहीं कि कांग्रेस क्यों हारती है, बल्कि यह कि हारने पर विजेता लगभग कभी भाजपा नहीं, बल्कि कोई ऐसी क्षेत्रीय पार्टी क्यों होती है जो ज़मीन पर ज्यादा तैयार थी।

तो आज का सवाल भी वही है: मतदान-केंद्र पर कौन बैठा था, और अगर कांग्रेस नहीं, तो फिर वह लोकतंत्र की किस बिसात पर किसके भरोसे खेल रही है?

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