
--राजीव रंजन नाग, नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।
चुनाव आयोग की विवादास्द पहल के विपरीत सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली में मतदाताओं के 'विशेष सघन पुनरीक्षण' से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि चुनाव आयोग फॉर्म 6, 7 और 8 में बदलाव नहीं कर सकता। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जो लोग पहले से ही मतदाता सूची में शामिल हैं, उनसे अपना नाम फिर से दर्ज कराने के लिए फॉर्म 6 क्यों भरवाया जा रहा है? फॉर्म 6 नए मतदाताओं के लिए होता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने कहा कि फॉर्म 6, 7 और 8 तय प्रारूप हैं, जिनमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। उन्होंने यह भी सवाल किया कि जब निकट भविष्य में राष्ट्रीय राजधानी में कोई चुनाव नहीं होने वाला है, तो चुनाव आयोग 30 अक्टूबर की समय-सीमा (डेडलाइन) तय करने पर क्यों जोर दे रहा है? पीठ ने कहा, "नामों को फिर से दर्ज कराने के लिए कोई अंतिम तारीख (कट-ऑफ डेट) तय न करें।"
न्यायाधीशों ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह उन मतदाताओं के लिए कोई आसान समाधान निकाले, जो अलग-अलग कारणों से अपने फॉर्म जमा नहीं कर पाए थे। बेंच ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति, जो पहले मतदाता सूची में शामिल था, अब उसमें नहीं दिख रहा है, तो उसे 'नया मतदाता' मानने के बजाय उसकी स्थिति के हिसाब से समाधान निकाला जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि बड़ी संख्या में मतदाताओं को या तो नामांकन फॉर्म नहीं मिले, या वे किन्हीं कारणों से उन्हें जमा नहीं कर पाए। इनमें वे लोग भी शामिल हैं जो दिल्ली के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में चले गए हैं।
उन्होंने कहा कि फॉर्म-8 पते में बदलाव के लिए है, जबकि फॉर्म-6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए है। इसलिए, पहले से मौजूद मतदाताओं को फॉर्म-6 के जरिए यह घोषणा करने के लिए मजबूर करना कि वे पहले किसी मतदाता सूची में शामिल नहीं थे, तर्कसंगत नहीं है। 'चुनाव आयोग को मतदाताओं तक पहुंचना चाहिए'।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि चुनाव आयोग को केवल मतदाताओं द्वारा आवेदन जमा करने का इंतजार नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, उसे सीधे मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि आयोग को फॉर्म-6 और फॉर्म-8 के जरिए आवेदन स्वीकार करने की प्रक्रिया जारी रखनी चाहिए और "सबसे सरल समाधान" अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। आयोग ने आवेदन जमा करने की समय-सीमा बढ़ाने पर सहमति जताई है।
●याचिकाएं
ट्रांस्परेंसी कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी द्वारा दायर याचिकाओं में कहा गया है कि जब दिल्ली में एसआईआर प्रक्रिया शुरू हुई, तो कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 1.45 करोड़ थी। इनमें से लगभग 97 लाख लोगों ने अपने नामांकन फॉर्म जमा किए, जबकि करीब 47 लाख लोगों के फॉर्म नहीं मिले।
भूषण ने बताया कि चुनाव आयोग के अनुसार, लगभग 43 लाख मतदाताओं को 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' या 'अनुपस्थित' की श्रेणी में रखा गया है। इस समूह में, लगभग 31.59 लाख मतदाताओं को 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' माना गया है, जबकि करीब 11 लाख लोगों को 'लापता' या 'पता न चलने वाले' के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसके अलावा, लगभग 2 लाख मतदाताओं को मृत घोषित किया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे लोग हो सकते हैं जिन्हें कभी नामांकन फॉर्म मिला ही नहीं, या जो किन्हीं कारणों से उसे जमा नहीं कर पाए।
https://www.indiainside.org/post.php?id=10691