
--के. विश्वदेव राव, महासचिव - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के हालिया दीक्षांत भाषणों पर सोशल मीडिया में तीखी बहस छिड़ी है। मेरा मानना है कि उनकी कई बातें अधूरे रूप में फैलीं, और जिस ज़मीनी हक़ीक़त की ओर उन्होंने इशारा किया, वह बहस से गायब हो गई। हमें अपनी सुनने और परखने की आदत को सुधारना होगा, अक्सर सत्य और बात का तात्पर्य विडियो और रील में बोझिल हो जाता है।
आज की पीढ़ी रील और साउंडबाइट में देखती, सुनती और राय बनाती है। 15 सेकंड की क्लिप में वक्ता का मंच, उसके श्रोता और उससे पहले-बाद के वाक्य, सब कट जाते हैं। हम उसी विडियो/क्लिप पर अपना फ़ैसला सुना देते हैं और उसे आगे भी बढ़ा देते हैं।
मनोविज्ञान इसका कारण समझाने में मदद करता है। नोबेल विजेता डैनियल काह्नमैन ने अपनी पुस्तक “थिंकिंग, फ़ास्ट एंड स्लो” में सोच की दो प्रणालियाँ बताईं: सिस्टम-1 तेज़, स्वचालित और भावनात्मक है, जबकि सिस्टम-2 धीमी, सोची-समझी और विश्लेषणात्मक। इस सिद्धांत की रोशनी में देखें तो 15 सेकंड की क्लिप हमें तुरंत प्रतिक्रिया और तुरंत राय की ओर धकेलती है, जबकि किसी पूरे भाषण का संदर्भ समझने के लिए सिस्टम-2 चाहिए, जिसमें समय और मेहनत लगती है, जो आज हम भूल गए है या इस्तेमाल करने से कतराते हैं। वहीँ यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, इर्विन की प्रोफ़ेसर ग्लोरिया मार्क ने कार्यालयों में लोगों की स्क्रीन-गतिविधि मापी है। उनके अनुसार 2004 के आसपास लोग औसतन ढाई मिनट एक स्क्रीन पर टिकते थे, जबकि हाल के अध्ययनों में यह औसत लगभग 47 सेकंड रह गया है। उनका यह भी कहना है कि ध्यान भटकने के बाद मूल काम पर लौटने में औसतन करीब 25 मिनट लगते हैं। उनके अध्ययन बताते हैं कि हम सोचने में असमर्थ हो रहें हैं और हमारी आदतें हमें टुकड़ों में ध्यान देने की ओर ले जा रही हैं।
इन सबका निचोड़ अब आपको सरलता से समझ आगया होगा कि क्यूँ हमारा ध्यान एक-दो पंक्तियों के इर्द-गिर्द सिमट जाता है और पूरा सुनने का एक सचेत प्रयास नहीं हो पाता है।
अब राज्यपाल के हालिया भाषणों का स्मरण करें, एकेटीयू में उन्होंने कहा कि वे प्रेम विवाह के ख़िलाफ़ नहीं हैं। उनका आग्रह यह था कि बेटियाँ विवाह से पहले आत्मनिर्भर बनें, क्योंकि पढ़ाई के दौरान कम उम्र में माँ बनने और भागकर विवाह करने की स्थिति में बच्चों के पालन की ज़िम्मेदारी अक्सर सरकार पर आ जाती है। विवाद उठने पर उन्होंने स्पष्ट भी किया कि उनका आशय प्रेम विवाह का विरोध नहीं था। इसके बावजूद क्लिपें यही संदेश देती रहीं कि राज्यपाल प्रेम विवाह के विरुद्ध हैं।
कानपुर में उन्होंने हाल की उन घटनाओं का ज़िक्र किया जिनमें महिलाओं ने जबरन विवाह के दबाव में चरम कदम उठाए, और जिन्हें उन्होंने “अकल्पनीय” कहा। उनका ज़ोर इस पर था कि बेटियों को निर्णय लेने की ताक़त दी जाए और माता-पिता बच्चों से संवाद रखें, ताकि भागने या टकराव की नौबत न आए। यह करियर या प्रेम विवाह के विरोध की नहीं, पारिवारिक संवाद और बेटियों की सुरक्षा की बात है। हम सबने देखा है कि सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के अभाव में उच्च शिक्षा भी हर लड़की को शोषण से नहीं बचा पाती। उसी भाषण की रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने महिलाओं से विवाह के बाद भी पढ़ाई और करियर जारी रखने को कहा, माता-पिता से बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखने को कहा, और घरेलू हिंसा तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर चिंता जताई।
सबसे ज़्यादा आलोचना उस पंक्ति की हुई जिसमें उन्होंने कहा कि आईएएस बनें या शिक्षक, पहले “एक्सपर्ट मदर” बनें। अकेले पढ़ने पर यह परिवार को करियर से ऊपर रखने जैसा लगता है, और यह आपत्ति समझ में आती है। विरोधी दलों और टिप्पणीकारों ने इसे पुरातनपंथी कहा। मेरी राय में ज़िम्मेदारी स्त्री-पुरुष दोनों की है, और पुरुषों को भी आत्मनिर्भर बनकर अपने उत्तरदायित्व निभाने चाहिए। पर उसी भाषण के बाकी हिस्से को सुने बिना एक पंक्ति पर निर्णय देना अधूरा होगा।
इसी गुरुवार लखनऊ में महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के दीक्षांत समारोह में राज्यपाल ने लड़कियों को रिश्तों में सतर्क रहने को कहा, पर साथ ही लड़कों को सीधे संबोधित किया। उन्होंने कहा कि उन्हें “गर्लफ़्रेंड” से आपत्ति नहीं है, पर जो लड़का विवाह का वादा करे, वह उसे निभाए: कुछ कमाए, पत्नी का भरण-पोषण करने लायक बने और इतना आत्मनिर्भर हो कि विवाह कर सके।
उन्होंने यह भी कहा कि 13-14 वर्ष की आयु में किसी लड़की को गर्भवती करके नहीं छोड़ देना चाहिए। जिन भाषणों को लड़कियों पर नसीहत के रूप में देखा गया, उनके ताज़ा भाषण में ज़िम्मेदारी की माँग साफ़ तौर पर लड़कों से भी थी।
उसी दीक्षोत्सव पर राजभवन की आधिकारिक विज्ञप्ति (लखनऊ, 22 अक्टूबर 2026) बताती है कि भाषण का दायरा कितना बड़ा था: शोध और नवाचार, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर अत्यधिक निर्भर न होने की सलाह, माता-पिता का सम्मान और वंचित बच्चों की शिक्षा। इसी भाषण में उन्होंने बाल गृहों में रह रही बच्चियों का उल्लेख किया, जो शिक्षा और संस्कार ग्रहण करने की उम्र में कई बार भ्रमित हो जाती हैं और जिनका उत्पीड़न होता है। उन्होंने कहा कि बेटियों के साथ अन्याय करने वालों को माफ़ नहीं किया जाएगा। राज्यपाल के अनुसार प्रदेश के 12 जिलों में पॉक्सो मामलों के पीड़ित बच्चों को जन भवन की ओर से गोद लेकर शिक्षा से जोड़ा जा रहा है। मेरी राय में 13-14 वर्ष की उम्र वाली उनकी टिप्पणी को इसी ज़मीनी पृष्ठभूमि में पढ़ा जाना चाहिए।
इन्हीं भाषणों का एक और पहलू चर्चा से बाहर रहा। गोरखपुर में उन्होंने पूछा कि समान अवसर के बावजूद बेटियाँ बेटों से आगे क्यों निकल रही हैं, और इसके कारणों पर मंथन की ज़रूरत बताई। उन्होंने यह भी पूछा कि लड़कों के छात्रावासों में मेस क्यों नहीं है जबकि लड़कियों के छात्रावासों में है, और भोजन के नमूने जाँच के लिए भिजवाए गए। यानी वे केवल नैतिक उपदेश नहीं दे रही थीं, संस्थाओं से जवाबदेही भी माँग रही थीं।
अब एक बात जो आपको विडियो में नहीं देखने को मिली थी, राज्यपाल ने प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालय से पाँच-पाँच गाँव गोद लेकर शिक्षा, स्वच्छता और पोषण पर काम करवाया जा रहा हैं, यह लगभग 200 गाँवों में चल रहा है। पिछले छह वर्षों में जनसहयोग से तक़रीबन 75,000 आंगनवाड़ी केंद्र बेहतर किए गए हैं, जिन पर लगभग 180 करोड़ रुपये व्यय हुए।
असहमति का हक़ सबको है, और विरोधी दलों व महिला नेताओं की आपत्ति भी लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है। पर असहमति उस बात से होनी चाहिए जो कही गई, उस क्लिप से नहीं जो बनाई गई।
राज्यपाल से सहमत या असहमत होना हमारा अधिकार है। पर किसी भी वक्ता के बारे में राय बनाने से पहले उसका पूरा भाषण, मंच और संदर्भ जानना हमारी ज़िम्मेदारी है। जो पीढ़ी रील और साउंडबाइट में जीती है, उसे सबसे पहले यही आदत सीखनी होगी: पूरी बात सुनो, फिर राय बनाओ, फिर आगे बढ़ाओ। वरना हम एक कटी हुई पंक्ति से उपजे विवाद में उलझे रहेंगे, और जिन असली सवालों पर बात होनी थी, यानी बेटियों की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता, युवाओं की ज़िम्मेदारी और संबंधों में ईमानदारी, वे अनसुने रह जाएँगे।
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