
--के• विश्वदेव राव, महासचिव - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।
7 अक्टूबर को एलन मस्क ने दुनिया को बताया कि भारत के “धनाड्य” ने उनकी कंपनी स्टारलिंक को भारत में आने से रोक रखा है। पर हकीकत इससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प और सीख देने वाली है।
एलन मस्क ने कुछ बेनाम “धनपतियों” पर एकाधिकार बचाने का आरोप लगाया। अगले दिन उन्होंने मुकेश अंबानी का मज़ाक उड़ाते हुए उन्हें भारत का असली मालिक और प्रधानमंत्री की उपाधि दे दी। अंबानी परिवार ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन कुछ ही घंटों में दिल्ली ने स्पष्ट किया कि उसका उपग्रह-सेवा का ढांचा “निष्पक्ष और न्यायसंगत” है।
यह झगड़ा पहली नज़र में उसी लम्पट कथा की तरह प्रतीत होता है, जिसमें एक विश्व प्रसिद्ध कारोबारी, साम दाम दंड भेद से सरकार पर दबाव बना कर अपनी बात मनवाना चाहता है। पर ऐसा अब होना मुश्किल है।
ज़रा तथ्यों पर गौर करें, तो आपको एक अलग तस्वीर सामने दिखेगी और वह तस्वीर स्टारलिंक या मस्क की सोशल मीडिया (एक्स) पर पोस्ट से बहुत अलग है।
वर्षों से किसी बड़े विकासशील देश में कारोबार शुरू करने का तरीका सरल था: विश्व प्रसिद्ध नाम लेकर आओ, खास सुविधाएँ मांगो और उपभोक्ताओं के जोश को ही राजनीतिक दबाव बनने दो। पर 2026 में यह तरीका भारत में अब काम नहीं करता। चाहे आने वाला स्टारलिंक (विश्व के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति का दोस्त एलोन मस्क) हो या बिजली से चलने वाली गाड़ी बनाने वाली चीनी कंपनी, दिल्ली का संदेश स्पष्ट है: विदेशी तकनीक का स्वागत है, पर भारत की शर्तों पर।
मस्क चाहते हैं कि स्टारलिंक को “विशेष वैश्विक सेवा” माना जाए, ताकि वह जल्दी भारत में आ सके, क्योंकि वह दूसरे देशों में पहले से सफल है। भारत का जवाब है: “तुम आ सकते हो, पर पहले यह साबित करो कि तुम्हारे नेटवर्क को भारत के भीतर नियंत्रित किया जा सकता है। ज़रूरत पड़ने पर पुलिस कानूनी तरीके से संचार की जड़ तक पहुँच सके। उपयोगकर्ताओं का आँकड़ा भारतीय अधिकार-क्षेत्र में ही रहे। और राष्ट्रीय आपात स्थिति में सरकार सेवा को रोक या बंद कर सके।”
ये कोई बहाने नहीं हैं। ये वे बुनियादी नियंत्रण हैं, जिनकी अपेक्षा हर देश करता है, इससे पहले कि कोई विदेशी कंपनी उसकी ज़मीन पर संचार-सेवा चलाए। अमेरिका भी सेवा देने वाली कंपनियों से कानूनी निगरानी में सहयोग की मांग करता है, जबकि चीन ने तो स्टारलिंक को बिल्कुल काम करने की इजाज़त ही नहीं दी है। भारत न रोक लगा रहा है, न किसी अन्य देश से ज़्यादा मांग कर रहा है।
मस्क की नाराज़गी व्यापारिक दृष्टि से समझ में आती है। उपग्रह से इंटरनेट सेवा के लिए भारत एक बहुत बड़ा बाज़ार है, और स्टारलिंक ने देश में लगभग 20 प्रवेश-केंद्र बना लिए हैं। पर सरकार की स्थिति साफ है: कोई भी कतार छोड़कर आगे नहीं जा सकता।
इतिहास भी यही कहता है। स्टारलिंक को जून 2025 में दूरसंचार विभाग से वैश्विक मोबाइल व्यक्तिगत संचार सेवा का अनुमति-पत्र मिला और जुलाई 2025 में भारतीय अंतरिक्ष प्रोत्साहन एवं प्राधिकरण की मंज़ूरी मिली। पर अनुमति-पत्र मिलना बिक्री की इजाज़त नहीं है।
स्टारलिंक, रिलायंस जियो-एसईएस और भारती एयरटेल-यूटेलसैट वनवेब, तीनों को अभी सुरक्षा जाँच और अंतिम रेडियो तरंगों का आवंटन पूरा करना है। स्टारलिंक को विदेशी पूँजी निवेश की मंज़ूरी भी चाहिए। शर्तों में कानूनी निगरानी की क्षमता, आँकड़ों को देश के भीतर रखना, देश के भीतर प्रवेश-केंद्र बनाना, ज़मीनी ढांचे की जाँच और आपात स्थिति में सेवा रोकने की क्षमता शामिल है।
मस्क के आरोप है कि भारत के ताकतवर व्यापारी उन्हें रोक रहे हैं, परन्तु इस पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई सबूत नहीं दिया कि अंबानी या किसी प्रतिद्वंद्वी ने लंबित मंज़ूरियों में रुकावट डाली। सरकार का कहना है कि तीनों कंपनियों के सामने सुरक्षा और रेडियो तरंगों की एक जैसी शर्तें हैं।
अंबानी पर आरोप से पहले, स्टारलिंक और जियो ने इस बात पर बहस की थी कि रेडियो तरंगें कैसे बाँटी जाएँ, और भारत सरकार ने प्रशासनिक आवंटन चुना था, वही रास्ता, जिसके लिए स्टारलिंक और एलोन मस्क खुद प्रयास कर रहे थे।
अगर पुरानी ताकतें नीति को अपने हिसाब से चला रही होतीं, तो मस्क अपनी मुख्य बहस हार गए होते। पर विरोधाभास और गहरा है। मार्च 2025 में स्पेसएक्स ने रिलायंस जियो और भारती एयरटेल दोनों से समझौते किए, ताकि सरकारी मंज़ूरी मिलने पर भारत में स्टारलिंक के उपकरण और सेवाएँ बेची जा सकें। जियो अपनी दुकानों और ऑनलाइन माध्यमों से बिक्री करता तथा स्थापना और चालू करने में मदद करता। एयरटेल अपनी दुकानों में स्टारलिंक रखने, कंपनियों और गाँवों को सेवा देने तथा संभवतः अपने ज़मीनी ढांचे का उपयोग करने पर विचार कर रहा था। यानी रिलायंस जियो और भारती एयरटेल भारत में स्टारलिंक के साझेदार होते।
मार्च 2025 में एलन मस्क भारत के उसी परिवेश में काम करने को बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे इन्ही धनपतियों (जैसा वे अब कहते हैं) उनके साथ साझेदारी में और तब उन्हें विदेशी पूँजी का भारतीयकरण स्वीकार था।
भारत सरकार की माँग स्पष्ट है, स्टारलिंक भारतीय बिक्री-माध्यमों से काम करे, भारतीय सुरक्षा नियमों का पालन करे और भारतीय कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करे। यही तर्क बिजली से चलने वाली गाड़ियों पर भी लागू होता है। भारत के जेएसडब्ल्यू समूह और चीन की एसएआईसी मोटर के साझा उपक्रम जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया ने अपना रास्ता देश में निर्माण, देशी स्रोतों से सामग्री खरीदने, उत्पादन बढ़ाने और भारत के लिए बनी गाड़ियों पर रखा है।
आचार्य चाणक्य ने लगभग ढाई हज़ार वर्ष पहले कहा था कि संचार और सूचना शक्ति है, और जो इनको नियंत्रित करता है, वही यह तय करता है कि उसमें क्या होगा।
मस्क नियंत्रण के बिना कारोबार चाहते हैं, जबकि भारत को अपने नागरिकों के आँकड़े और निजता बचाने का पूरा अधिकार है, जैसा अधिकार हर देश को है। यूक्रेन, जो युद्ध में स्टारलिंक को अपनी जीवनरेखा मानता है, ने भी स्वीकार किया है कि सेवा का अंतिम नियंत्रण मस्क के हाथ में है, और उन्होंने रूस के क्षेत्र में उसे चालू करने से इनकार किया है। अगर युद्ध झेलता देश एक व्यक्ति के फैसले पर निर्भर है, तो 140 करोड़ लोगों के देश का यह कहना स्वाभाविक है कि उस पर निर्भर होने से पहले सुरक्षा-कवच ज़रूरी है।
मस्क के सखा, डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी निर्माताओं को फायदा देने के लिए आयात-शुल्क का उपयोग करता है। भारत का तरीका शायद अधिक खुला है: उपग्रह-इंटरनेट और बिजली से चलने वाली गाड़ियों के लिए कानूनी और एक जैसा रास्ता, साथ में शर्तें, बंद दरवाज़े नहीं।
मस्क को याद रखना चाहिए कि भारत ने कभी टेस्ला को विशेष प्रवेश-सौदा नहीं दिया था। उसने इसके बजाय बिजली से चलने वाली गाड़ियों के लिए एक व्यापक नीति बनाई। जो कंपनियाँ देश में निर्माण में कम से कम 50 करोड़ डॉलर लगाती हैं और स्थानीय मूल्य-वृद्धि का लक्ष्य पूरा करती हैं, वे हर साल सीमित संख्या में गाड़ियाँ 15 प्रतिशत शुल्क पर आयात कर सकती हैं, जबकि पहले यह शुल्क 70 से 100 प्रतिशत था। उद्देश्य विदेशी निर्माताओं को आकर्षित करना था, साथ ही उन्हें भारतीय उत्पादन, रोजगार और आपूर्ति-श्रृंखला की ओर खींचना।
अब सोचिये अगर स्टारलिंक जियो और एयरटेल के ज़रिए शुरू होता है, तो वह ऐसे बाज़ार में आएगा जहाँ पहले से कड़ी दूरसंचार प्रतिस्पर्धा और दुनिया की सबसे कम कीमतें हैं। अगर टेस्ला, बीवाईडी, जेएसडब्ल्यू एमजी, टाटा और महिंद्रा देश में जड़ें जमाए परिवेश में प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो दबाव यह बनेगा कि उन्नत उत्पाद केवल लॉन्च न हों, बल्कि बड़े पैमाने पर सस्ते बनें।
विश्व तकनीक के लिए नये भारत का निर्णय सीधा है: आप अपने कारोबारी मॉडल के अनुसार भारत की दिशा नहीं बदल सकते। आपको अपना कारोबारी मॉडल भारत के अनुसार बदलना होगा।
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