वैश्विक जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक, न्यायसंगत और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता: डॉ. प्रेम कुमार



--अभिजीत पाण्डेय
पटना - बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज।

जलवायु परिवर्तन अब किसी एक राष्ट्र या सीमा तक सीमित चुनौती नहीं रह गया है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के अस्तित्व से जुड़ा साझा संकट है।

‘जलवायु अनुकूलन और लचीलापन बढ़ाने में संसदीय नेतृत्व की भूमिका’ विषय पर अपने संबोधन में बिहार विधान सभा के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने वैश्विक जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक, न्यायसंगत और समन्वित प्रयासों का आह्वान किया।

अध्यक्ष ने वैश्विक मंच पर अपने विचार रखते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन अब किसी एक राष्ट्र या सीमा तक सीमित चुनौती नहीं रह गया है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के अस्तित्व से जुड़ा साझा संकट है।

संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विश्व की लगभग आधी आबादी, करीब 3.6 अरब लोग, भीषण सूखा, बाढ़, चक्रवात, बढ़ते तापमान तथा जल और खाद्य असुरक्षा जैसे जलवायु प्रभावों से प्रभावित हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि आपदाओं के बाद केवल राहत एवं बचाव तक सीमित रहने के बजाय भविष्य के जोखिमों का पूर्व आकलन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ करना तथा प्रकृति-संगत और आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचे का विकास आवश्यक है। उन्होंने जलवायु अनुकूलन को विकास की प्राथमिकताओं में शामिल करने पर बल दिया। भारत जैसे विकासशील देशों के सामने तीव्र आर्थिक विकास को गति देने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने की दोहरी चुनौती है। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यतागत जीवन-दृष्टि सदैव प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और संतुलन पर आधारित रही है।

डॉ. कुमार ने बताया कि भारत ने वर्ष 2023 में पेरिस समझौते के तहत अपना प्रारंभिक ‘एडप्टेशन कम्युनिकेशन’ प्रस्तुत कर यह स्पष्ट किया है कि जलवायु अनुकूलन देश के विकास मॉडल का अभिन्न अंग है। उन्होंने ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जन करने वाले विकासशील देशों पर जलवायु संकट के असमानुपातिक बोझ को देखते हुए ‘जलवायु न्याय’ की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।

उन्होंने भारत की विभिन्न जलवायु एवं पर्यावरणीय पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय कार्य योजनाओं, हरित ऊर्जा के विस्तार, इंटरनेशनल सोलर एलायंस, कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इन्फ्रास्ट्रक्चर, नमामि गंगे, मिष्टी योजना, आर्द्रभूमि संरक्षण, नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) तथा व्यक्तिगत आचरण से जुड़ी ‘मिशन लाइफ’ जैसी पहलों के माध्यम से भारत जलवायु कार्रवाई को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ रहा है। उन्होंने फरवरी 2026 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की 52.57 प्रतिशत हिस्सेदारी तथा 520.51 गीगावाट की कुल क्षमता का भी उल्लेख किया।

अपने संबोधन में डॉ. प्रेम ने वैश्विक जलवायु कार्रवाई को नई गति देने के लिए संसदों की भूमिका को रेखांकित करते हुए पाँच प्रमुख प्राथमिकताओं पर बल दिया। इनमें विधायी एवं बजटीय प्रक्रियाओं में जलवायु अनुकूलन को उचित स्थान देना, वैज्ञानिक आकलनों को नीति-निर्माण का आधार बनाना, जलवायु वित्त एवं तकनीकी हस्तांतरण को सुगम बनाना, राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के बीच एक साझा ‘क्लाइमेट पार्लियामेंट्री कोऑपरेशन नेटवर्क’ स्थापित करना तथा स्थानीय समुदायों और महिलाओं को जलवायु कार्रवाई में सक्रिय भागीदार बनाना शामिल है।

डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि एक सुरक्षित, स्वस्थ और संवहनीय भविष्य केवल सशक्त सरकारों के प्रयासों से नहीं, बल्कि सशक्त लोकतांत्रिक संस्थाओं के सहयोगात्मक प्रयासों से ही सुनिश्चित किया जा सकता है। उन्होंने ‘क्लाइमेट एक्शन’, ‘क्लाइमेट जस्टिस’, ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ और ‘क्लाइमेट कोऑपरेशन’ के समन्वित क्रियान्वयन को वर्तमान समय की आवश्यकता बताया।

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