--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■जहरीली शराब ने बुझाए घरों के चिराग, जिम्मेदारी पर उठे सवाल
■जहरीली शराब कांड से संदेह के घेरे में गोविंद सिंह राजपूत
■पहले कांग्रेस में अब भाजपा में चला रहे अवैध गोरखधंधे
■शराब माफियाओं से राजपूत के गहरे संबंध
सागर जिले के बंडा-शाहगढ़ क्षेत्र में संदिग्ध जहरीली शराब से हुई मौतों ने मध्यप्रदेश में अवैध शराब के कारोबार और प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस क्षेत्र के सबसे प्रमुख नेता खादय, आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत हैं। क्षेत्र में होने वाले सभी अवैध धंधों में मंत्री की और इनसे जुड़े गुर्गो का नाम सबसे पहले आता है। शराब कांड को भी ऐसे ही जोड़ा जा रहा है। जब राजपूत कांग्रेस में हुआ करते थे तब भी इनका नाम अवैध कारोबार से जुड़ता रहा है। आज जब वह भाजपा सरकार में मंत्री हैं तो इनका अवैध गोरखधंधा फिर चल पड़ा है। सूत्रों का कहना है कि राजपूत का क्षेत्र के शराब माफियाओं से गहरे ताल्लुकात हैं। इनके संरक्षण और शह पर शराब माफिया बेखौफ होकर अपना अवैध कारोबार करते हैं। इससे पहले भी हमने राजपूत के विभाग में होने वाली राशन वितरण प्रणाली की धांधली को लेकर पोस्ट लिखी थी। पीडीएस व्यवस्था में भी उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े हुए हैं। सवाल यह है कि यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय से अवैध शराब का कारोबार चल रहा था, तो निगरानी तंत्र को इसकी भनक पहले क्यों नहीं लगी?
●मंत्री की जवाबदेही पर उठते सवाल
सागर से जुड़े राजनीतिक विमर्श में मंत्री और स्थानीय नेता गोविंद सिंह राजपूत की प्रशासनिक तथा राजनीतिक जवाबदेही को लेकर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। किसी भी सरकार में मंत्री से यह अपेक्षा रहती है कि उसके प्रभाव क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और जनसुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों की जानकारी समय पर शासन तक पहुंचे। यदि अवैध शराब की बिक्री का नेटवर्क सक्रिय था, तो उसकी सूचना स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों तक क्यों नहीं पहुंची? यदि सूचना पहुंची थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि कार्रवाई हुई थी तो इतनी बड़ी त्रासदी को रोकने में वह प्रभावी क्यों नहीं रही?
●सागर में फिर वही सवाल क्यों?
सागर की वर्तमान घटना ने पुराने अनुभवों के बावजूद निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा किया है। बंडा क्षेत्र में कथित रूप से कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही शराब, नकली पहचान और स्थानीय स्तर पर बिक्री की बात जांच में सामने आई है। पुलिस ने कई आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किए और गिरफ्तारियां की हैं। यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि अवैध शराब का कारोबार संगठित रूप से चल रहा था, तो उसे रोकने की जिम्मेदारी केवल किसी एक पुलिसकर्मी या छोटे अधिकारी की नहीं हो सकती। आबकारी विभाग, पुलिस प्रशासन, स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व सभी की भूमिका की जांच होनी चाहिए। केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई करके मामला समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि किसी स्तर पर संरक्षण, मिलीभगत, लापरवाही या सूचना छिपाने के प्रमाण मिलते हैं तो कार्रवाई जिम्मेदारी की वास्तविक सीमा तक पहुंचनी चाहिए।
●सवाल कार्रवाई की निष्पक्षता का है
सरकार ने मामले में जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने न्यायिक जांच के आदेश के साथ अवैध शराब के खिलाफ प्रदेशव्यापी कार्रवाई की बात कही है। अब आवश्यकता इस बात की है कि जांच का दायरा किसी व्यक्ति या दल की राजनीतिक सुविधा के अनुसार सीमित न हो। इसमें शराब के निर्माण से लेकर परिवहन, बिक्री, स्थानीय नेटवर्क, लाइसेंस व्यवस्था, आबकारी अधिकारियों की भूमिका और पुलिस की सूचना प्रणाली तक प्रत्येक कड़ी की जांच हो। गोविंद सिंह राजपूत के क्षेत्र में किसी अधिकारी, कारोबारी या शराब माफिया की मिलीभगत सामने आती है तो कार्रवाई होनी चाहिए। सागर की त्रासदी को केवल एक शराब कांड मानकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ी भूल होगी। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जो शराब के अवैध कारोबार पर निगरानी रखने के लिए जिम्मेदार है। मृतकों के परिवारों को मुआवजा और आरोपियों की गिरफ्तारी जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि यह पता चले कि जहरीली शराब उन गांवों तक पहुंची कैसे और उसे रोकने वाली व्यवस्था विफल क्यों हुई। उसी रिपोर्ट से तय होना चाहिए कि दोषी कौन है, लापरवाही किस स्तर पर हुई और किसकी जवाबदेही बनती है।
●आंकड़े बताते हैं कि समस्या नई नहीं है
मध्यप्रदेश में अवैध और जहरीली शराब से मौतों का संकट केवल सागर तक सीमित नहीं रहा है। गृह मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में अवैध/मिलावटी शराब के सेवन से 2016 में 184, 2017 में 216, 2018 में 410, 2019 में 190 और 2020 में 214 मौतें दर्ज हुई थीं। यानी 2016 से 2020 के बीच ही राज्य में 1,214 मौतें दर्ज की गईं। इससे भी पहले 2012-14 के दौरान अवैध/मिलावटी शराब से होने वाली मौतों का राष्ट्रीय स्तर पर अलग से सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध है।
●विधायक-मंत्री की जवाबदेही पर उमा भारती ने उठाये सवाल
उमा भारती ने कहा कि केवल अधिकारियों पर कार्रवाई से काम नहीं चलेगा। उन लोगों की भी भूमिका की जांच होनी चाहिए, जो आरोपियों के साथ लगातार संपर्क में थे या उनके साथ उठते-बैठते थे। उन्होंने सागर के स्थानीय नेताओं की भूमिका की जांच की मांग करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों की भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। विधायक और मंत्री गोविंद सिंह के साथ आरोपी की तस्वीर सामने आने को लेकर भी उमा भारती ने सवाल उठाए।
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