अंकल सैम का वीजा महंगा, भारत की चाँदी



--के. विश्वदेव राव
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
इंडिया इनसाइड न्यूज।

पिछले साल सितंबर में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एच-1बी वीजा पर एक लाख डॉलर (तक़रीबन एक करोड़ रुपए) वार्षिक शुल्क लगाने की घोषणा की, तो भारतीय आईटी पेशेवरों में हड़कंप मच गया था। जो वीज़ा दो से पाँच हज़ार में मिल जाता था, उसमें बीस गुना इज़ाफ़ा हो गया। उस समय तो यह फैसला अमेरिका की अदालत में अटक गया था, फिर इस साल जून में एक संघीय न्यायाधीश ने इस पर रोक भी लगा दी थी, लेकिन अब वाशिंगटन का इरादा साफ हो चुका है। खबर है कि प्रशासन इस शुल्क को एक लाख तीन हज़ार डॉलर तक बढ़ाकर, स्थायी रूप देने की तैयारी में है। एच-1बी वीजा पाने वालों में करीब 70 प्रतिशत भारतीय हैं, इसलिए इस नीति की सबसे बड़ी चोट भारत को ही झेलनी पड़ेगी।

लेकिन अमेरिका की इस संरक्षणवादी नीति बनाने वालों को शायद अंदाज़ा नहीं था कि यह भारत के आर्थिक और तकनीकी भविष्य को हमेशा के लिए बदल देगी। ऊँची फीस, लॉटरी प्रणाली की अनिश्चितता और ग्रीन कार्ड के लिए दशकों के इंतज़ार ने जो दबाव भारतीय इंजीनियरों पर डाला, वह अंततः अमेरिकी कंपनियों के लिए ही उलटा साबित हो रहा है, क्योंकि उन्हें एहसास हो चुका है कि प्रतिभा को अमेरिका बुलाना महँगा और पेचीदा है, जबकि काम को भारत ले जाना कहीं ज़्यादा किफ़ायती और रणनीतिक है।

नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी (एनएफएपी) द्वारा अगस्त 2026 में जारी नीति विश्लेषण पर आधारित आँकड़ों की मानें तो, अगर आपने जनवरी 2026 में वीजा लगाया था तो आपको स्थायी निवास (ग्रीन कार्ड) के लिए संभावित इंतज़ार 179 वर्ष तक हो सकता है। अर्थात आपका अमेरिका का नागरिक बनना असंभव है। यह कोई भविष्य की संभावना नहीं, बल्कि एक वास्तविकता है।

दशकों तक भारत जिस “ब्रेन ड्रेन” (प्रतिभा पलायन) का दंश झेलता रहा, वह अब धीरे-धीरे “रिवर्स ब्रेन ड्रेन” (प्रतिभा की घर-वापसी) और स्वदेशी आत्मनिर्भरता में बदल रहा है।

एक समय भारतीय आईटी क्षेत्र का मतलब सिर्फ सस्ते सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को विदेश भेजना समझा जाता था। अब तस्वीर बदल रही है। अमेरिकी वीजा नीतियों ने भारतीय व बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कम-मुनाफे वाले सर्विस मॉडल से आगे बढ़कर अपने एआई प्लेटफॉर्म, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और बौद्धिक संपदा भारत में ही विकसित करने पर मजबूर कर दिया है।

नैसकॉम-जिन्नोव, (नैसकॉम भारत के तकनीकी उद्योग का शीर्ष निकाय है और जिन्नोव एक प्रमुख ग्लोबल मैनेजमेंट और स्ट्रैटेजी कंसल्टेंसी फर्म है) के आंकड़ों के मुताबिक, आज भारत में 1,700 से ज़्यादा “ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स” कार्यरत हैं, जो करीब 65 अरब डॉलर का सालाना कारोबार करते हैं और 19 लाख से अधिक लोगों को रोज़गार देते हैं। उद्योग अनुमानों के अनुसार, 2030 तक इनकी संख्या 2,100 से 2,400 के बीच पहुँच सकती है और कारोबार 100 अरब डॉलर के पार जा सकता है। ये केंद्र अब महज़ बैक-ऑफिस नहीं रहे; सिलिकॉन वैली के उत्पाद, अनुसंधान और एआई आर्किटेक्चर अब यहीं भारत में गढ़े जा रहे हैं, और अनुभवी इंजीनियर व उत्पाद प्रबंधक पश्चिमी देशों की प्रशासनिक जटिलताओं को छोड़कर स्वदेश लौट रहे हैं।

एक पत्रकार के तौर पर मैंने लंबे समय तक उत्तर प्रदेश और बिहार के मेधावी युवाओं को आजीविका और सम्मान की तलाश में अपना घर-परिवार छोड़ते देखा है। किंतु तकनीकी क्षेत्र में आ रही यह जीसीसी क्रांति अब इन दोनों राज्यों के लिए एक अभूतपूर्व आर्थिक अवसर बनकर सामने आ रही है।

इस सुनहरे अवसर को स्थायी सफलता में बदलने के लिए सरकार और नीति-निर्माताओं को दो मोर्चों पर तुरंत काम करना होगा। पहला, बुनियादी ढाँचा - बेंगलुरु और मुंबई जैसे पुराने तकनीकी केंद्र अब क्षमता से अधिक दबाव झेल रहे हैं। यदि लखनऊ, पटना, वाराणसी और कानपुर को नए तकनीकी हब के रूप में विकसित करना है, तो वहाँ निर्बाध बिजली आपूर्ति, विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी और गुणवत्तापूर्ण कार्यालयीय स्थान को प्राथमिकता देनी होगी। दूसरा, कौशल - टियर-2 और टियर-3 शहरों के अधिकांश इंजीनियरिंग कॉलेजों का पाठ्यक्रम अब भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। युवाओं को पारंपरिक कोडिंग से आगे बढ़ाकर एआई, मशीन लर्निंग और डेटा साइंस में तेज़ी से कुशल बनाना समय की सबसे बड़ी माँग है।

उत्तर प्रदेश को अपनी कृषि-प्रधान राज्य की छवि तक सीमित नहीं रहना है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा पहले ही उत्तर भारत के सबसे बड़े जीसीसी हब के रूप में उभर चुके हैं, जहाँ दुनिया की प्रमुख तकनीकी कंपनियों के अनुसंधान-विकास केंद्र स्थापित हैं। पर अब फोकस नोएडा-ग्रेटर नोएडा से आगे बढ़कर लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और प्रयागराज जैसे टियर-2 शहरों तक तेजी से पहुँचना होगा, जो अभी कुछ हद तक हुआ है, इनको और विकसित कर इनको आईटी क्रांति के नए केंद्र बनाने पर जोर देना होगा।

बिहार का प्रतिभाशाली युवा वर्ग दशकों से देश के आईटी क्षेत्र की रीढ़ रहा है, किंतु उसे मजबूरन बेंगलुरु, हैदराबाद या विदेश का रुख करना पड़ता रहा। इसी साल जुलाई में बेंगलुरु में आयोजित “बिहार आईटी इंडस्ट्री मीट 2026” में क्वेस कॉर्प, हनीवेल, एडोब, एमफैसिस, ओरेकल और सेल्सफोर्स जैसी कंपनियों ने राज्य में जीसीसी और आईटी पार्क स्थापित करने में गहरी दिलचस्पी दिखाई। मुज़फ्फरपुर-दरभंगा क्षेत्र में नए औद्योगिक पार्कों पर भी काम शुरू हो चुका है। यदि यह दिलचस्पी ठोस निवेश में बदलती है, तो हाइब्रिड कार्य-संस्कृति के इस दौर में पटना, मुज़फ्फरपुर और भागलपुर के युवाओं को अपने ही गृह राज्य में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की नौकरियाँ मिलना संभव हो सकेगा। जब उच्च वेतन पाने वाले पेशेवर अपने घर में रहकर कमाते-खर्च करते हैं, तो स्थानीय रियल एस्टेट, खुदरा बाज़ार और सेवा क्षेत्र में रोज़गार का एक नया चक्र भी शुरू होता है।

अमेरिका के दरवाज़े भले पूरी तरह बंद न हुए हों, पर वे निश्चित रूप से सिकुड़ रहे हैं। भारत के लिए यह घड़ी मायूस होने की नहीं, बल्कि अपने भीतर के सामर्थ्य को पहचानने और उत्तर प्रदेश-बिहार जैसे राज्यों को इस नई अर्थव्यवस्था की धुरी बनाने की है।

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