--के. विश्वदेव राव
लखनऊ - उत्तर प्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे कानूनी जगत को झकझोर कर रख दिया। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और उसके अपीलीय प्राधिकरण के एक निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि उस फैसले में उद्धृत न्यायिक नजीरें, यानी केस लॉ, वास्तव में कभी अस्तित्व में ही नहीं थीं। वे तथाकथित संदर्भ जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उपकरणों द्वारा गढ़े गए काल्पनिक और पूर्णतः भ्रामक आंकड़े थे। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस प्रवृत्ति को न्याय के क्षेत्र में "मिथाइल आइसोसाइनेट" गैस के रिसाव जैसी अदृश्य, कपटी और सर्वनाशी त्रासदी बताया। यह तुलना केवल अलंकारिक नहीं है, जिस प्रकार भोपाल गैस त्रासदी में विष चुपचाप और बिना किसी चेतावनी के फैला था, उसी प्रकार एआई-जनित भ्रामक सूचना भी न्याय व्यवस्था की नींव को चुपचाप खोखला कर सकती है।
कानून एक विशाल, जटिल और निरंतर विकसित होने वाला क्षेत्र है। यह केवल धाराओं और उपधाराओं का संग्रह नहीं है, यह संविधान, संसदीय विधान, न्यायिक व्याख्याओं, नजीरों और न्यायशास्त्र की अनगिनत परतों से बना एक सजीव और संवेदनशील ढाँचा है। इसे समझने के लिए वर्षों की गहन पठन-पाठन, निरंतर अध्ययन और व्यावहारिक अनुभव की अनिवार्य आवश्यकता होती है। एक अधिवक्ता कोई साधारण सलाहकार नहीं होता। वह एक विधिक पेशेवर होता है जो अपने मुवक्किल को कानूनी परामर्श देता है, अनुबंध, वसीयत और याचिकाओं जैसे विधिक दस्तावेज़ तैयार करता है और न्यायालय में अपने मुवक्किल का पक्ष तर्कसंगत एवं विधिसम्मत ढंग से प्रस्तुत करता है। इस पूरी प्रक्रिया में उसे मानसिक रूप से सजग, तर्कशील और केस लॉ में पारंगत होना अनिवार्य है। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत उसका एक-एक शब्द और एक-एक संदर्भ प्रामाणिक और सत्यापित होना चाहिए, क्योंकि उसकी एक भूल किसी के जीवन, स्वतंत्रता और सम्मान को प्रभावित कर सकती है।
वहीँ एक न्यायाधीश की भूमिका तो और भी अधिक गुरुतर है। वे न्यायपालिका के वे निष्पक्ष अधिकारी होते हैं जिन्हें न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान साक्ष्यों का गहन मूल्यांकन करना होता है, पूर्व नजीरों और केस लॉ पर विचार करना होता है और ऐसे निर्णय देने होते हैं जो न केवल विधि के अनुरूप और बाध्यकारी हों, बल्कि जो समाज में न्याय की भावना को भी प्रतिबिंबित करें। इस संपूर्ण प्रक्रिया की विश्वसनीयता इसी एक तथ्य पर टिकी है कि हर संदर्भ, हर नजीर, हर उद्धरण, वास्तविक, सत्यापित और अस्तित्ववान हो। जब यही आधार डगमगा जाए, तो न्याय का पूरा भवन ही संदिग्ध हो जाता है।
आधुनिक न्याय प्रणाली मुकदमों के असाधारण बोझ से दबी हुई है। भारत में उच्चतम न्यायालय से लेकर अधीनस्थ न्यायालयों तक करोड़ों मामले लंबित हैं। ऐसे में वकीलों और जजों के लिए एआई उपकरणों का आकर्षण स्वाभाविक है। कानूनी शोध को त्वरित करने, पुराने दस्तावेज़ों को खंगालने, निर्णयों का अनुवाद करने और प्रारूप तैयार करने में एआई की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य अपनी मौलिक चिंतन-शक्ति और तर्क-क्षमता को पूर्णतः मशीन को सौंप देता है। जनरेटिव एआई मॉडल मूलतः सांख्यिकीय संभावनाओं पर आधारित होते हैं, वे किसी सत्यापित कानूनी डेटाबेस को खंगालने के बजाय यह अनुमान लगाते हैं कि "अगला शब्द या वाक्यांश क्या होना चाहिए।" परिणामस्वरूप वे अत्यंत विश्वसनीय प्रतीत होने वाले, किंतु पूर्णतः काल्पनिक केस लॉ, न्यायाधीशों के नाम, वाद संख्याएँ और उद्धरण तैयार कर देते हैं, जिसेसे मतिभ्रम कि स्तिथि हो जाती है। जब यही काल्पनिक सामग्री किसी न्यायिक निर्णय का आधार बन जाए, तो वह केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं रहती, वह पेशेवर कदाचार बन जाती है और उस निर्णय की वैधानिक नींव पूर्णतः खोखली हो जाती है।
यदि एआई की भ्रामकता एक अदृश्य और अंतर्निहित खतरा है, तो सोशल मीडिया पर कानूनी सूचनाओं का अनियंत्रित प्रसार एक सार्वजनिक और दृश्यमान संकट है। आज के डिजिटल युग में एक नई और अत्यंत चिंताजनक प्रवृत्ति उभरी है, अनेक अधिवक्ता और स्वयंभू कानूनी जानकार इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, फेसबुक पोस्ट और व्हाट्सएप संदेशों के माध्यम से कानूनी जानकारी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। तीस से साठ सेकंड की "कानूनी सलाह" देना एक फैशन बन गया है। समस्या यह है कि कानून इतना सूक्ष्म और बहुआयामी विषय है कि उसे साठ सेकेंड में समेटना न केवल असंभव है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से खतरनाक भी है। एक रील में दी गई व्याख्या या संपत्ति अधिकार संबंधी जानकारी अधूरी, संदर्भहीन अथवा पूर्णतः गलत हो सकती है।
इससे भी अधिक गंभीर स्थिति तब उत्पन्न होती है जब ये अधिवक्ता स्वयं ऐसी सामग्री तैयार करने के लिए एआई उपकरणों की सहायता लेते हैं और वह सामग्री बिना किसी सत्यापन के लाखों दर्शकों तक पहुँच जाती है। एक साधारण नागरिक जो किसी कानूनी समस्या से जूझ रहा है, वह इन रीलों को प्रामाणिक कानूनी सलाह मानकर निर्णय ले सकता है और इसके परिणाम उसके जीवन पर दीर्घकालिक और दुखद प्रभाव डाल सकते हैं।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के व्यावसायिक आचरण नियमों के अनुसार अधिवक्ताओं को अपने व्यवसाय के प्रत्यक्ष विज्ञापन पर प्रतिबंध है, किंतु "सूचनात्मक सामग्री" और "व्यावसायिक प्रचार" के बीच की रेखा अत्यंत धुंधली होती जा रही है। यह केवल व्यावसायिक आचरण का प्रश्न नहीं अपितु यह सार्वजनिक हित का प्रश्न है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस समग्र संकट की गंभीरता को भलीभाँति समझते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेष समिति गठित करने और एआई के न्यायिक उपयोग पर सख्त अनुशासनात्मक नियम बनाने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया है कि यदि किसी निर्णय की प्रक्रिया में असत्य या भ्रामक सामग्री का एक अंश भी प्रवेश कर जाता है, तो वह निर्णय विधि की दृष्टि में शून्य हो जाता है। यह उद्घोषणा केवल एनसीएलटी के एक मामले तक सीमित नहीं है, यह समूची न्याय प्रणाली के लिए एक कड़ी चेतावनी है।
इस संकट से उबरने के लिए कई स्तरों पर एक साथ काम करना होगा। न्यायालयों को "शून्य-सहिष्णुता" की नीति अपनानी होगी जहाँ बिना मानवीय सत्यापन के किसी भी एआई-जनित संदर्भ को स्वीकार न किया जाए। विधि विश्वविद्यालयों और बार काउंसिल को पाठ्यक्रम में "डिजिटल विधिक साक्षरता" को अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना होगा ताकि नई पीढ़ी के अधिवक्ता एआई उपकरणों की सीमाओं और जोखिमों को भलीभाँति समझें। बार काउंसिल को सोशल मीडिया पर कानूनी सामग्री के प्रसार के संदर्भ में स्पष्ट और कठोर दिशानिर्देश जारी करने होंगे और प्रत्येक अधिवक्ता जो डिजिटल माध्यम पर कानूनी सूचना प्रसारित करे, उसे यह अस्वीकरण देना अनिवार्य किया जाए कि यह सामग्री किसी विशिष्ट कानूनी सलाह का विकल्प नहीं है। साथ ही न्यायालयों में केवल सरकार-अनुमोदित, सत्यापित और विश्वसनीय कानूनी डेटाबेस के संदर्भों को ही मान्यता दी जाए।
कानून और न्याय मानवीय सभ्यता की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक हैं। एक न्यायाधीश जब किसी मामले में निर्णय देता है, तो वह केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं करता, वह मानवीय विवेक, नैतिक चेतना और विधिक परंपरा का सम्मिलित प्रयोग करता है। एक अधिवक्ता जब न्यायालय में अपने मुवक्किल का पक्ष रखता है, तो वह केवल शब्द नहीं बोलता, वह किसी के जीवन, स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करता है। इस गुरुतर दायित्व को किसी एल्गोरिदम के हाथ सौंपना न केवल व्यावसायिक लापरवाही है, बल्कि उस विश्वास के साथ विश्वासघात भी है जो समाज ने न्यायपालिका और विधि व्यवसाय में रखा हुआ है।
तकनीक सदैव "सहायक" की भूमिका में रहे "निर्णायक" की नहीं।
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