भिंड में सत्ता, संरक्षण और विवादों के केंद्र बने राकेश शुक्ला



--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

●मंत्री राकेश शुक्ला ने बनवाया था मोदी की अवमानना करने वाले सज्जन सिंह यादव को भिंड जिला का किसान अध्यक्ष

●चंबल की रेत राजनीति में मंत्री शुक्ला पर बढ़ता दबाव, अवैध खनन से प्रशासनिक हस्तक्षेप तक

●अपने बेटे को बना रखा है मेहंगाँव का अन ऑफिशीयल मंत्री, बेटे के ससुर का क्षेत्र में है बाहुबल

●प्रदेश के नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री के रूप में हो गए है फेल, 1% मंत्रालय का बजट का कर पाए ईस्तेमाल, बड़े सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट में मांगे ज़ाते हैं एक लाख प्रति मेगावॉट की रिश्वत

मध्यप्रदेश के बीजेपी नेता और मंत्री नरेंद्र मोदी की नसीहत नहीं मान रहे हैं। भिंड के मेहगाँव के सज्जन सिंह यादव जिसे मंत्री राकेश शुक्ला ने जिला किसान मोर्चा का अध्यक्ष बनवाया था उन्होंने 700 गाड़ियों का काफिला लेकर रैली निकाली। हालांकि भाजपा ने उनको पद विहीन कर दिया। पर जिस मंत्री की पैरवी से बने वह अध्यक्ष उन्हें शिष्टाचार का पाठ क्यों नहीं पढ़ाया गया। आज राकेश शुक्ला से ज्यादा अकर्मण्य नेता मोहन कैबिनेट में नहीं है, जिन्होंने विभाग का कुल 1% बजट ईस्तेमाल कर पाए, खबर यह है कि सौर ऊर्जा के नाम पर ऊर्जा विकास निगम में हर मेगावॉट पर अनुमती के नाम पर एक लाख रुपये की रिश्वत मांगी जाती है। साथ ही चाहे अवैध रेत खनन हो या उनके पुत्र आलोक का हस्तक्षेप एवं क्षेत्र में बाहुबल का उपयोग, बेटे के ससुर की क्षेत्र में गुन्डागर्दी से लेकर भ्रष्टाचार तक सब कुछ हो रहा है। आखिर बीजेपी अपने इस नेता पर कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है। मध्यप्रदेश की राजनीति में समय-समय पर ऐसे प्रसंग सामने आते रहे हैं, जब सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हुए। इन दिनों प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री राकेश शुक्ला को लेकर भिंड जिले से जिस प्रकार की चर्चाएं और आरोप सामने आ रहे हैं, उन्होंने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्री का पद केवल सत्ता का प्रतीक नहीं होता, बल्कि वह जवाबदेही, नैतिकता और जनविश्वास का भी दायित्व लेकर चलता है। ऐसे में यदि किसी मंत्री के नाम के साथ अवैध खनन, प्रशासनिक हस्तक्षेप और असामाजिक तत्वों को संरक्षण जैसे आरोप जुड़ने लगें, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह बन जाता है।

• सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना पर उतरे शुक्ला

भिंड और चंबल क्षेत्र लंबे समय से रेत खनन और उससे जुड़े विवादों के कारण चर्चा में रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर सख्त निर्देश दिए गए, लेकिन इसके बावजूद यदि अवैध खनन के आरोप लगातार सामने आते हैं, तो यह प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि मंत्री राकेश शुक्ला के प्रभाव के कारण प्रशासन कई मामलों में दबाव में कार्य करने को मजबूर दिखाई देता है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन को कानून और संविधान के अनुसार कार्य करना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दबाव के आधार पर।

• खुद मुख्यमंत्री सचिवालय लाये थे किसान नेता को

पिछले दिनों भिंड जिले में एक किसान नेता और जिला अध्यक्ष के खिलाफ सैकड़ों ट्रैक्टरों के साथ रैली निकालने का मामला भी चर्चा का विषय बना। आरोप लगाए जा रहे हैं कि संबंधित व्यक्ति मंत्री के करीबी माने जाते हैं और राजनीतिक संरक्षण के कारण प्रशासन उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने से बचता रहा। यह स्थिति सत्ता और संगठन के उस खतरनाक गठजोड़ की ओर संकेत करती है, जिसमें जनप्रतिनिधि अपने प्रभाव का उपयोग कानून व्यवस्था से ऊपर दिखाई देने के लिए करने लगते हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक निकटता कभी भी कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

• प्रशासन पर हावी है शुक्ला का रौब

सबसे अधिक चिंता का विषय प्रशासनिक ढांचे में बढ़ता राजनीतिक हस्तक्षेप माना जा रहा है। भिंड जिले में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में मंत्री की अनुपस्थिति के बाद उनके पुत्र आलोक शुक्ला को मुख्य अतिथि बनाए जाने की चर्चा ने कई सवाल खड़े कर दिए। सरकारी कार्यक्रम किसी परिवार विशेष की निजी जागीर नहीं हो सकते। यदि प्रशासन किसी मंत्री के परिजन को केवल राजनीतिक प्रभाव के कारण मंच पर प्रमुखता देता है, तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता की भावना के विपरीत माना जाएगा। इससे यह संदेश जाता है कि जिले का प्रशासनिक ढांचा जनहित के बजाय राजनीतिक प्रभाव के अनुसार संचालित हो रहा है।

• आपराधिक गतिविधियों को संरक्षण देने का आरोप

चंबल क्षेत्र पहले ही अपराध और अवैध गतिविधियों की छवि से लंबे समय तक संघर्ष करता रहा है। ऐसे में यदि किसी जनप्रतिनिधि पर असामाजिक तत्वों को संरक्षण देने के आरोप लगते हैं, तो यह पूरे क्षेत्र की सामाजिक संरचना के लिए चिंता का विषय बन जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई ऐसे तत्व, जिनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, वे राजनीतिक संरक्षण के कारण खुले तौर पर सक्रिय हैं। यदि सत्ता का उपयोग कानून व्यवस्था मजबूत करने के बजाय संरक्षणवाद के लिए होने लगे, तो इससे जनता का विश्वास कमजोर होता है।

मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार लगातार सुशासन, पारदर्शिता और विकास की बात करती रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी प्रशासनिक कसावट और जवाबदेही पर जोर देते दिखाई देते हैं। ऐसे में यदि किसी मंत्री को लेकर लगातार विवाद सामने आते हैं, तो सरकार की छवि प्रभावित होना स्वाभाविक है। विपक्ष को भी ऐसे मुद्दों पर सरकार को घेरने का अवसर मिलता है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार इन आरोपों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे, ताकि सच्चाई जनता के सामने आ सके। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि लोकतंत्र में आरोप लगना और उनका सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी भी जनप्रतिनिधि को दोषी ठहराने से पहले तथ्यों और जांच की प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। लेकिन जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक एक जैसे आरोप और चर्चाएं बनी रहें, तो सरकार और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे स्थिति स्पष्ट करें।

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