--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
■क्या छत्तीसगढ़ के बाद पंजाब में भी कांग्रेस की नैय्या डुबायेंगे भूपेश?
■प्रदेश कांग्रेस संगठन में उलझन, घेरे में भूपेश बघेल
■बैठक में बवाल के बाद पंजाब कांग्रेस में तेज हुई अंदरूनी कलह
■स्थानीय नेताओं से दूरी भूपेश बघेल पर पड़ रही भारी
■नेतृत्व संकट से प्रभारी बघेल की कार्यशैली पर नाराजगी
पंजाब कांग्रेस इन दिनों जिस राजनीतिक असमंजस और आंतरिक असंतोष के दौर से गुजर रही है, उसके केंद्र में पार्टी के प्रदेश प्रभारी और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है। जिस उम्मीद के साथ कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें पंजाब की जिम्मेदारी सौंपी थी, वह अब पार्टी के भीतर ही सवालों के घेरे में दिखाई देने लगी है। हाल के घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि पंजाब कांग्रेस में संगठनात्मक समन्वय की कमी और नेतृत्व को लेकर असंतोष तेजी से बढ़ रहा है। पिछले दिनों पंजाब में आयोजित कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण बैठक में जिस प्रकार का माहौल देखने को मिला, उसने पार्टी की अंदरूनी स्थिति को सार्वजनिक कर दिया। सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान कई नेताओं ने संगठनात्मक कार्यशैली और संवादहीनता को लेकर नाराजगी जाहिर की। कहा जा रहा है कि स्थानीय नेताओं को यह महसूस होने लगा है कि प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के बजाय शीर्ष नेतृत्व केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित रह गया है।
● क्या जांच एजेंसियों के डर और बीजेपी को खुश करने के लिए कांग्रेस को खत्म करना चाहते हैं बघेल?
यहां सवाल उठता है कि क्या भूपेश बघेल बीजेपी के प्लान के मुताबिक काम कर रहे हैं और छत्तीसगढ़ के बाद अब पंजाब से भी कांग्रेस को पूरी तरह से खत्म करना चाहते हैं। इसके पीछे बघेल के अपने निजी स्वार्थ हैं। वर्तमान में भूपेश बघेल ईडी, आयकर विभाग और अन्य जांच एजेंसियों के दायरे में हैं और कई केस चल रहे हैं। इन केसों से बचने के लिए वह बीजेपी को खुश करना चाहते हैं। अगले साल पंजाब में चुनाव होने वाले हैं और बीजेपी वहां अपने पैर जमाना चाहती है। इसके लिए भूपेश बघेल परदे के पीछे से विभीषण की भूमिका में बीजेपी को मदद कर रहे हैं। पंजाब का हालिया मामला इसी से संबंधित है।
● स्थानीय नेताओं को पहचाने से किया इनकार
सबसे अधिक चर्चा उस घटना की हुई, जब पार्टी के वरिष्ठ नेता और दो बार विधायक रहे अवतार सिंह हेनरी को लेकर कथित रूप से ऐसी स्थिति बनी कि प्रभारी नेतृत्व उन्हें पहचानने तक की स्थिति में नजर नहीं आया। पंजाब जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में, जहां क्षेत्रीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक संतुलन बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, वहां इस प्रकार की घटनाएं कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर डालती हैं। कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं का मानना है कि यदि प्रभारी को प्रदेश के विधायकों, वरिष्ठ नेताओं और जमीनी समीकरणों की समुचित जानकारी नहीं होगी, तो संगठन को मजबूत करना कठिन हो जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि पंजाब कांग्रेस को इस समय एक ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो राज्य की जटिल परिस्थितियों को समझते हुए सभी गुटों को साथ लेकर चले। लेकिन वर्तमान स्थिति में पार्टी के भीतर संवाद और विश्वास का संकट दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि बैठकों में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है।
● राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर लगातार जारी
भूपेश बघेल के राजनीतिक अतीत को लेकर भी विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में सक्रिय रहने के दौरान उन पर कई प्रकार के आरोप लगे और उनकी ही पार्टी के लोगों ने समय-समय पर उनकी कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाए। अब पंजाब में भी विरोधी गुट इसी पृष्ठभूमि को मुद्दा बनाकर उनकी भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर लगातार जारी है। कुछ राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस के आंतरिक दस्तावेजों और रणनीतियों को लेकर गोपनीयता का संकट पैदा हो रहा है। पार्टी के भीतर बढ़ती अविश्वास की भावना इन चर्चाओं को और हवा दे रही है। पंजाब कांग्रेस के कई नेता मानते हैं कि यदि समय रहते संगठनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो आगामी चुनावों में पार्टी को गंभीर राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
● भूपेश की भूमिका पर पुन: विचार करे आलाकमान
दरअसल, पंजाब कांग्रेस पहले ही कई चुनौतियों से जूझ रही है। राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार, शिरोमणि अकाली दल की सक्रियता और भाजपा की नई रणनीतियों के बीच कांग्रेस को मजबूत विपक्ष की भूमिका निभानी थी। लेकिन आंतरिक खींचतान और नेतृत्व को लेकर बढ़ती असहमति ने पार्टी की स्थिति को कमजोर किया है। ऐसे समय में प्रभारी नेतृत्व से अपेक्षा थी कि वह संगठन को एकजुट करने का कार्य करेगा, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां इसके उलट दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस आलाकमान के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह पंजाब में संगठनात्मक संतुलन कैसे स्थापित करे। यदि स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी लगातार बढ़ती रही, तो इसका सीधा प्रभाव पार्टी के जनाधार पर पड़ सकता है। राजनीतिक दलों में नेतृत्व केवल पद से नहीं, बल्कि संवाद, समन्वय और विश्वास से स्थापित होता है। पंजाब कांग्रेस में यही तत्व फिलहाल कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। जिस व्यक्ति ने छत्तीसगढ़ जैसे कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले प्रदेश से पार्टी को समाप्त कर दिया। ऐसे व्यक्ति को पंजाब का प्रभारी बनाकर भेजना कांग्रेस आलाकमान की सबसे बड़ी भूल साबित होगी। इतिहास में दर्ज है कि जहां-जहां भूपेश बघेल को प्रभारी बनाकर भेजा वहां कांग्रेस की नैया डूबी ही है। इससे लगता है कि बघेल कहीं न कहीं बीजेपी को भी लाभ पहुंचाना चाहते हैं। अभी भी समय है कि आलाकमान भूपेश की भूमिका पर पुन: विचार करे।
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