--विजया पाठक
एडिटर -जगत विजन
●हथियारों को बेचने जबरदस्ती थोपता है युद्ध
●ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध में ट्रंप की हुई भारी किरकिरी
अमेरिका के लिए एक बात कही जाती है कि वह विश्व में अपनी बादशाहत को बरकरार रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। जिसके लिए भले ही उसे मानवता का खून ही क्यों न बहाना पड़े। अमेरिका के सभी युद्ध यही प्रदर्शित करते हैं कि उसने खास कारण से नहीं किये बल्कि अपने हितों को साधने और अपने मकसद पूरे करने के लिए अनेकों देशों को युद्ध में धकेला है। अमेरिका का युद्ध इतिहास यह दर्शाता है कि उसका उद्देश्य शायद ही कभी निर्णायक जीत रहा हो, बल्कि इसका मुख्य ध्यान अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने पर रहा है। अमेरिकी हथियार उद्योग इन युद्धों के माध्यम से अरबों डॉलर का मुनाफा कमाता है, जबकि आम जनता और सैनिक इन लड़ाइयों की कीमत अपनी जान देकर चुकाते हैं। जब तक 'सैन्य-औद्योगिक परिसर' अमेरिकी नीति को प्रभावित करता रहेगा, तब तक दुनिया भर में युद्ध और हथियार बिक्री का यह सिलसिला जारी रहने की संभावना है। यह भी सच है कि 1945 के बाद अमेरिका ने किसी भी 'वास्तविक युद्ध' को निर्णायक रूप से नहीं जीता है। सभी युद्धों को जबरदस्ती थोपा गया है। वह चाहे नैतिक हो या अनैतिक हो। हालियां ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध में भी यही हाल है। इजराइल के साथ मिलकर अमेरिका ने परमाणु परीक्षण की आड़ में ईरान पर जो हमला बोला और वहां के सुप्रीम लीडर खामनेई को मौत के घाट उतार दिया उसे क्या जायज ठहराया जा सकता है। सही मायने में तो यह युद्ध इजराइल और ईरान के बीच था लेकिन अमेरिका इसमें जबरदस्ती कूदा। इस युद्ध के कारण पूरे विश्व में जो हाहाकार मचा और सभी देशों पर जो प्रभाव पड़ा उसका जिम्मेदार अमेरिका ही है। यदि अमेरिका साथ नहीं देता तो निश्चित ही इजराइल, ईरान पर हमला नहीं करता।
• अमेरिका पर लगाना चाहिए विश्व को अंकुश
आखिर विश्व पर अमेरिका की दादागिरी कब तक चलती रहेगी। विश्व के तमाम देशों को अमेरिका की मनमानी पर अंकुश लगाना चाहिए। एक ओर जहां अमेरिका किसी भी देश पर पाबंदी लगा देता है और अपने इशारे पर नचाता रहता है वहीं जब अमेरिका अपनी मनमर्जी चलाता है तो उस पर कोई देश कार्यवाही ही नहीं करता है। यह भेदभावपूर्ण रवैया आखिर कब तक चलेगा। आखिर अमेरिका के भी दायरे होने चाहिए।
• अमेरिकी नीति: युद्ध से मुनाफा और हथियार बिक्री का व्यापार
आधुनिक वैश्विक राजनीति में अमेरिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में अमेरिका ने कई बड़े युद्धों और सैन्य अभियानों में भाग लिया है। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अमेरिका युद्ध जीतने के बजाय उन्हें लंबा खींचता है ताकि उसका हथियार उद्योग फल-फूल सके। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से, संयुक्त राज्य अमेरिका ने खुद को वैश्विक पुलिसकर्मी के रूप में स्थापित किया है। अमेरिका ने वियतनाम से लेकर इराक और अफगानिस्तान तक दर्जनों सैन्य हस्तक्षेप किए हैं। हालाँकि, इन हस्तक्षेपों की एक कड़ी समीक्षा करने पर एक चौंकाने वाला सच सामने आता है। क्या अमेरिका वास्तव में युद्ध जीतता है, या युद्ध केवल हथियार बेचने और मुनाफा कमाने का एक जरिया है? अमेरिका अक्सर सीधे युद्ध में उतरने के बजाय अपने सहयोगियों को हथियार बेचकर या सैन्य सहायता देकर अपने हितों की रक्षा करता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा रक्षा बजट और हथियार निर्यात पर निर्भर है। युद्ध केवल विदेशी नीति नहीं, बल्कि एक 'बिजनेस मॉडल' बन गया है। जब भी कोई देश किसी दूसरे देश पर हमला करता है, तो अमेरिकी हथियारों की मांग बढ़ जाती है। इराक और लीबिया जैसे देशों पर हमले अक्सर उन सरकारों को हटाने के लिए हुए जो अमेरिकी डॉलर के बजाय किसी अन्य मुद्रा में तेल बेचने की कोशिश कर रही थीं।
• युद्ध का इतिहास: जीत बनाम हार
वियतनाम युद्ध (1955-1975): अमेरिका ने वर्षों तक लड़ने के बाद अपने सैनिकों को वापस बुला लिया और वियतनाम पर कम्युनिस्टों का कब्जा हो गया, जिसे एक बड़ी हार माना जाता है।
अफगानिस्तान युद्ध (2001-2021): 20 साल के खर्चीले युद्ध के बाद, अमेरिकी सेना वापस लौट आई और तालिबान ने फिर से सत्ता हथिया ली। यह युद्ध हथियार उद्योग के लिए एक 'अंतहीन खजाना' बना रहा।
इराक युद्ध (2003-2011): सामूहिक विनाश के हथियारों के दावों के साथ शुरू हुआ युद्ध, बाद में तेल संसाधनों पर नियंत्रण और डॉलर के वर्चस्व को बनाए रखने के लिए लड़े गए युद्ध के रूप में देखा गया।
इजराइल-ईरान-अमेरिका युद्ध (2026): इजराइल-ईरान-अमेरिका युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है। केवल अस्थाई रूप से स्थगित हुआ है। इस युद्ध में भी ईरान को अमेरिका हरा नहीं पाया है। एक हिसाब से देखा जाये तो ईरान हमेशा अमेरिका पर भारी पड़ा और अमेरिका को ही युद्ध विराम के लिए आगे आना पड़ा।
व्यापार रणनीति: युद्ध के मैदान में इस्तेमाल हो चुके हथियारों को 'परीक्षित और प्रभावी' बताकर दुनिया भर के देशों को बेचा जाता है। मध्य पूर्व और यूक्रेन के संघर्षों में अमेरिकी हथियारों की भारी खपत और बिक्री ने इसे हथियार बाजार का राजा बना दिया है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है, जो वैश्विक हथियारों के व्यापार का लगभग 37-40% हिस्सा रखता है। हथियार उद्योग अमेरिकी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है।
इन संघर्षों में सैन्य ताकत के बावजूद राजनीतिक और सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करना कठिन साबित हुआ। अमेरिका के युद्धों के पीछे कई कारण रहे अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बनाए रखना और आर्थिक हित। यह सही है कि युद्धों के दौरान हथियारों की मांग बढ़ती है, जिससे रक्षा कंपनियों को लाभ होता है। हालांकि, द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने नाजी जर्मनी और जापान को पराजित किया। इसी तरह खाड़ी युद्ध में अमेरिका ने इराकी सेना को कुवैत से बाहर निकालने में सफलता प्राप्त की। कुछ युद्ध ऐसे रहे हैं जहां अमेरिका को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। वियतनाम युद्ध इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां लंबे संघर्ष के बाद अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। इसी तरह अफगानिस्तान युद्ध में भी 20 साल के बाद तालिबान की वापसी ने अमेरिका की रणनीति पर सवाल खड़े किए।
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