एक शाम : मन महुए की डारि !



सच में एक मीठी शाम थी। एक अलिखित संदर्भ था। अनुभव का आनंद और कथारस से भरी शाम। कुछ-कुछ नास्ट्राल्जिक, प्रवाहयुक्त और उद्वेग रहित। रसना के लिए कुरकुरी बाटियाँ और सोंधी-सोंधी चटनी, साथ में पीला टीका लगाये मुस्काते कालाजाम; माने कथारस और रसना-रस, अहा !

बतरस पाना हो तो शिवमूर्ति जी थे, जिनका मन अब भी झूलता है महुए की डारि पर, तो उनसे कभी सुनिए महुआ-पुरान, आसपास से आने लगती है अलसी के साथ कूटा हुआ लाटा की भीनीभीनी खुश्बू।

विजय राय जी की दृढ़ आत्मानुशासन की कथा सुनते हुए आप सोचते रह जायेंगे कि इतने तरल और सरल 'राय साहब' इस बात को लिपिबद्ध करते तो क्या बात होती! वीआरसी (ले चुके) राय साहब का मसाला-मुक्ति अभियान नजीर होगी और कुआदती मनुष्य के बदलाव की कथा अलग से बनेगी।

साहित्यकार और बैंककर्मी राजेन्द्र बर्मा अजलस्थ और पायमाल व्यवस्था का जब खाका खींच रहे हों तो आप आक्रोश और कातरता से भरे बिना नहीं रह सकते। गजब्ब है जी ! दस-बीस हजार रुपये का कर्जदार जमीन में धँसकर मर जाता है और माल्यवा जैसा लोग मस्त ऐय्याशी करता फिरता है, करोड़ों का लोन लेकर कैसे ठेंगा दिखा दिया जाता है इस व्यवस्था में। कैसे संगठित भ्रष्टाचार भलमनई की जान लील रहा है, आदि-आदि।

इतिहासबोध भी कोई चीज होती है, कलाकार-कार्टूनिस्ट रामबाबू जब यह चर्चा करते हैं तो आप सहज ही इतिहास के दूसरे छोर, हजारों बरस पुरानी सैंधव सभ्यता, से वर्तमान तक संतरण करने लग जाते हैं। दजला और फरात नदियों का जल झलकने लगता है। हड़प्पा के खंडहर और उनकी ईंटों से समय बुदबुदाने लगता है। इतिहास की दृष्टि हो और समय पर नजर तो चर्चा का फलक बढ़ जाता है और आश्चर्य कि हम फिर सोचते हैं लोहे, पहिये और आग के आविष्कार पर।

साथ ही, मेजबान तरुण निशांत जी जैसे कविवर तो बाटी और भी चोखी हो जाती है। थैंक्स भाई तरुण जी। भइये, चटिया जुटे और फोटू-फाटू ना हो तो लगता है कि अतीत ही कहीं छोड़ आये। फोटू भी खिंची, सेल्फी भी हुई, सो तो अटैच है ही। ओके ! तरुण जी के दौलतखाने की अभी एक और चाय ड्यु है।

सी यू अगेन ब्रदर्स !

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