भरोसा रखिए; बेटियाँ बहुत बहादुर हैं!



@ अरुण सिंह

पूरी दुनिया में माना जाता है कि बेटियाँ जैविक रूप से कमजोर होती हैं। इसी धारणा के चलते पिछले हजारों वर्षों से वे न सिर्फ हाशिए पर रहीं, बल्कि तरह-तरह के दमन और शोषण का शिकार भी होती रहीं हैं। यह दमन-शोषण आज भी लगभग सभी समाजों और सभी देशों में किसी ने किसी रूप में विद्यमान है। भारतीय परिवेश में तो सदा ही स्त्रीपूजा की मान्यता रही है, फिर भी यहां स्त्रियां उस मुकाम पर नहीं पहुंच पाईं जहां उन्हें पहुंचना चाहिए था।

दरअसल, स्त्री-पक्ष को लेकर हमारा नजरिया बड़ा दुविधा भरा और कभी-कभी साजिशों भरा रहा है। दुविधा यह कि हम स्त्रियों पर भरोसा करें या न करें। और साजिश यह कि वे पुरुषों से आगे न निकल जाएं। उन पर काबिज न हो जाएं, उन पर राज न करने लगें। प्रगतिशील कहे जाने वाले पश्चिमी देशों में भी स्त्री-शोषण की यदा-कदा घटनाएं अभी भी सामने आ ही जाती हैं। दुनिया के अन्य हिस्सों खाकर तीसरी दुनिया के तो लगभग सभी देशों में स्त्रियों की हालत आज भी असामान्य और असम्मानजनक बनी हुई है।

जहाँ तालिबानी काबिज हैं; वहाँ तो जिन्दा जहन्नुम जी रही हैं। भारतीय प्रायद्वीप और मध्य एशिया के कई इस्लामिक देशों में तो हालत बेहद दर्द विदारक है। तालिबानी प्रवृत्ति तो एक छोटी-सी मिसाल भर है। इसी तरह, भारत में भी कई समाजों में स्त्रियों की दशा सोचकर मन भर आता है। खाप पंचायतें कितनी खौफनाक हैं, यह तस्वीर पूरी दुनिया के सामने है। खासतौर पर तब, जब हम पूरी दुनिया में सभ्य-समाज के रूप में अपना डंका पीटते हैं, चाँद सितारों की सैर करते हैं, अन्तरिक्ष को मापते हैं, नायाब इजादें करते हैं और तमाम तरह की शेखियां बघारतें हैं; लेकिन बच्चियों के साथ हम कैसा व्यवहार करते हैं, यह सोच कर आँख भर आती है कि मानव-जीवन में भी ऐसा विभेद हो सकता है, वैसे तो यह भेद मनुष्यों में ही होता है, पशुओं या अन्य जीवधारियों में नहीं कारण की वे प्रकृति से संचालित होते हैं। जबकि मनुष्य मस्तिष्क से संचालित होता है।

बड़ी विचित्र बात है कि पूरी कायनात में कोवल मनुष्य को ‘विचारशील-प्राणी’ कहा जाता है। लेकिन मनुष्य-मनुष्य के बीच लिंगभेद की ऐसी खाँईं, कि मनुष्यता शरमा जाए। लेकिन धन्य हैं बेटियाँ, जो अपने प्रति होने वाले इन तमाम अवरोधों को दर किनार करते हुए बुलंदियों पर पहुँच रही हैं। अजेय कहे जाने वाले तमाम दुर्गों-दीवारों को ध्वस्त कर रहीं हैं। और जिन्हें जमीदोज किये जाने की कोशिशें होती रहीं हैं, वे फलक पर चमक उठती हैं। वे मरियम हैं, मलाला हैं, मीरा हैं, महादेवी हैं, वे मैरीकॉम हैं, वे कर्णममल्लेश्वरी हैं, वे कल्पना हैं, वे अरुणिमा हैं, वे लता हैं, आशा हैं, वे सुनीता नारायण हैं। ऐसे कितने नाम हैं जो इस धरती पर न आतीं तो हमारा सौंदर्य, हमारा रूप, हमारा स्वर, हमारी कल्पनाएं, हमारा प्रतिरोध, हमारा स्नेह, हमारी ताकत, हमरी उड़ान, हमारी जिद, हमारा जय, हमारा विजय, जैसे तमाम विशेषण कदाचित अधूरे रह जाते।

अभी इक्कीसवें राष्ट्रमंडल खेलों का परिणाम आया। भारत की बेटियों ने सोने की बारिश कर दी। जहां बेटे चूके, वहां बेटियां इक्कीस साबित हुईं। जहां हम निराश हुए, वहां बेटियों ने हुंकार भरी और जीत कर आईं। जहां हम लडख़ड़ाए, वहां वे बेहद भरोसे के साथ पार हो गईं। हमने उनको जहां रोका, वे वहां से भी बहुत आगे निकल गईं। अब हमें उन पर भरोसा करना होगा। उन्हें प्यार करना होगा। उन्हें गैर-बराबरी और लिंगभेद के खांचे से बाहर रखकर उनकी क्षमताओं और ऊर्जा को समझ कर उन्हें उनकी जगह देनी ही होगी।

इधर के कुछ वर्षों में आप हाई स्कूल, इंटरमीडिएट, आईएएस, पीसीएस जैसी परीक्षाओं के आने वाले परीक्षा परिणामों को देखिए, वे टॉप कर रहीं हैं, शीर्ष पर जा रही हैं।

प्रबंधन और प्रशासनिक क्षमताओं में वे बड़ी तेजी से आगे बढक़र अपनी दक्षता और कार्यकुशलता साबित कर रहीं हैं। उनकी प्रतिरोध की प्रवृत्ति तो देखिए, वे बिना शोर किए, दत्त-चित्त होकर अपनी क्षमताएं साबित कर रही हैं। अब समय बदल रहा है, हम स्त्री-शक्ति को समझें, पहचानें और देश-समाज के हित में उन्हें बेहतरी और बराबरी का हक दें। तो वे बेटा बनकर नहीं, बेटी बनकर नाम करेंगी। बेटियों के हौसलें बुलन्द हैं। बस उन्हें आप स्नेह और सहकार दीजिए। वे आपको उम्मीदों से कहीं बहुत ज्यादा ससम्मान लौटायेंगी। भरोसा रखिए, हमारी बेटियाँ बहुत बहादुर हैं।

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