शराबनीति और फजीहत



---सुनील मेहता, (साथ में अजय राणा), उत्तराखंड, 11 अप्रैल 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

उत्तराखंड के लिए सात अप्रैल का अखबार एक चौकाने वाली खबर लेकर आया जब प्रदेश की भाजपा-नीत मुख्यमन्त्री त्रिवेंद्र की सरकार ने घोषित कर दिया कि राज्य का वह हर डिपार्टमेंटल स्टोर और मॉल विदेशी शराब बेच सकता है जिसकी सालाना बिक्री 50 लाख रूपये, यानि मासिक ४१६६६७ रूपये है, पर मीडिया ने इस खबर को जब यह लिखकर छापा तो सरकार के होश उड़ गए: “अब परचून की दुकानों में बिकेगी शराब।‘’

उत्तराखंड देश का एकमात्र राज्य जिसे देवभूमि भी कहा जाता है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार उत्तराखंड की भूमि में देवता वास करते हैं और इस पावन-भूमि पर शराब का बोलबाला कही न कही देवभूमि की छवि को धूमिल करता हुआ नज़र आता है. उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार है। चुनाव से पहले कई विधायक शराबबंदी का समर्थन करते हुए पाए गए लेकिन आज राज्य सरकार राज्य के हर उस डिपार्टमेंटल स्टोर और मॉल को विदेशी शराब का ठेका बनाने पर तुली हुई है जिसकी बिक्री 50 लाख रूपये सालाना, यानि मासिक ४१६६६७ रूपये है। इसी छह अप्रैल २०१८ को राज्य सरकार ने शराब-नीति पर कुछ नए प्रावधान लागू किये जिसमें मुख्य रूप से डिपार्टमेंटल स्टोर और मॉल का लायसेंस शुल्क २ लाख से बढाकर ५ लाख कर दिया गया और लायसेंस के लिए सालाना बिक्री दर महज़ ५० लाख रुपये का प्रावधान रखा गया। अगले दिन समाचार पत्रों का शीर्षक था “अब परचून की दुकान में बिकेगी शराब‘’। इस प्रावधान के चलते जैसे ही प्रदेश में सरकार की फजीहत होने लगी तो मुख्यमंत्री द्वारा एक सोशल मीडिया पर एक अपील जारी की गयी जिस पर शराब पोलिसी का ठीकरा कांग्रेस सरकार पर फोड़ा गया और बताया गया की यह नीति कांग्रेस ने २०१४ में बनायी थी जिसका दुरूपयोग रोकने के लिए ये नये कदम उठाये गए हैं। लेकिन प्रदेश की जनता ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि अगर कांग्रेस की पोलिसी गलत थी तो नयी पोलिसी क्यों नहीं बनायीं गयी ? और जो नए प्रावधान की बात मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र कर रहे हैं तो क्या इसका सीधा असर युवाओं पर नहीं पड़ेगा ? उच्च न्यायालय के अधिवक्ता डी के जोशी कहते हैं, ”सरकार के इस निर्णय की हम भर्त्सना करते हैं, प्रतिकार करते हैं, ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि इस सरकार को सदबुद्धि आये, जिससे सरकार शराब से हटकर व्यसनमुक्त उत्तराखंड बनाने पर ध्यान दे ताकि यहाँ का युवा नशे कि गिरफ्त में न आकर अपने उज्जवल भविष्य हेतु कार्य करें.”

लोग याद करते हैं कि चुनाव से पहले नरेन्द्र मोदी ने पिथौरागढ़ में भाषण जो दिया था उसमें कहा था कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आती है, और आज बीजेपी सरकार की नीतियाँ इस कथन को अक्षरशः साबित करती हैं। लेकिन शायद बीजेपी भूल रही है कि कांग्रेस अपनी ही नीतियों के चलते आज सत्ता से बाहर है। आज के निर्णय ही आगामी चुनाव के नतीजे तय करते हैं।

आज भी उत्तराखंड में शाम होते ही नशे की गिरफ्त आ जाता है। इसमें अधिकतर युवा होते हैं। नैनीताल जैसी पर्यटन नगरी के सुनसान रास्तो पर भी छोटे-छोटे बच्चे भी नशा करते हुए देखे जा सकते हैं।
लेकिन वो भी क्या करें ? उत्तराखंड में पलायन सबसे बड़ी समस्या है। यह तभी रुकेगी जब पहाड़ों पर रोजगार होगा, चिकित्सा सुविधाए होंगी, आवास होगा, प्रत्येक गाँव को जोड़ने के लिए सड़क होगी और नशे के विरुद्ध कड़ा कानून होगा।
खैर; इस शराब-नीति में किये गए संशोधन से सरकार के लिए जनता में काफी गुस्सा है। अब देखना ये होगा कि सरकार चिनगारी में शराब डालकर आग बना देती है या फिर नए प्रावधान के साथ बुझा देती है ?

मामले को गंभीरता से लेते हुए नैनीताल हाईकोट ने 9 अप्रैल को प्रदेश में शराब की दुकानें खुलने पर एक दिन तक की रोक लगा दी। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में आठ अप्रैल को शराब की कई दुकानों की निविदाएं खुलनी थी, जिस पर रोक के प्रदेश के कई शराब करोबारियों ने नैनीताल हाईकोट में चुनौती थी। फ़िलहाल इस मामले में अदालत गंभीर है और जनता आक्रोश में है।

नई आबकारी नीति को मंजूरी मिलने के बाद परचून की दुकानों में शराब बिक्री और 50 लाख के टर्नओवर पर श्रीनगर से लोगों की प्रतिक्रियाएं सरकार के विरोध में ही हैं। श्रीनगर गढ़वाल के मनोज गड़िया का कहना है रोजी रोटी के लिए दुकानदारी करते हैं ना कि शराब भेचने के लिए, कभी-कभी उनके परिवार सदस्य दुकान में बैठते हैं। क्या अब उनकी पत्नी, बच्चे दुकान में बैठकर शराब बेचेंगे ? वे सरकार के इस कदम का विरोध करते हैं और कहते हैं कि ये पहाड़ी क्षेत्र है। देवभूमि उत्तराखंड में इस तरह के फैसले का कतई विरोध होना चाहिए। जहां तक बात करे 50 लाख का सालाना टर्नओवर की तो मैदानी क्षेत्र देहरादून की तरह बड़ी-बड़ी दुकानें नहीं हैं जिससे वह इस तरह के नीतियों के लिए समर्थन देंगे।

इसी तरह सिद्धान्त उनियालका कहना है कि शराब को प्राइवेट दुकानो में बेचने से समाज में इसका बेहद गलत असर पड़ेगा जिससे महिला और बालिकाएं दुकानों में सामान लेने के लिए जाने पर भी खुद को असुरक्षित पाएंगी। वहीं समाज गलत दिशा की और बढेगा।

विकास रावत का मानना है कि एक ओर सरकार राजस्व वृद्धि के लिए प्राइवेट दुकानो में नशे के कारोबार को खोल रही है जिससे युवा पीढ़ी में नशे की लत और बढ़ सकती है। जबकि दूसरी ओर इसके रोकथाम के लिए कई कार्यक्रम वर्षो से चले आ रहे हैं। भगवन सिंह मानते हैं कि सरकार मूलभूत सुवधाएं जुटाने की बजाय शराब-खनन की नीति पर अधिक ध्यान दे रही है, जबकि सरकार का लक्ष्य विकास होना चाहिए था। गांधी सिंह कहते है कि सरकार के एक साल के कार्यकाल में ही सरकार अपना चेहरा सबके समक्ष रख रही है। कमल रावत का मत औरों से थोड़ा भिन्न है। वे कहते हिन् कि पहाड़ो में रोजगार की कमी है। ऐसे में छोटे कारोबारियों के लिए मुनाफे को देखकर ही सरकार ने ये कदम उठाया है जो व्यवसाय हित में है। अल्मोड़ा के हेम तिवारी - अल्मोड़ा पहाड़ में लोग शराब से पहले ही परेशान है। सरकार ने जो प्राइवेट संस्थानों को शराब बेचने का लाइसेंस देने का निर्णय लिया है वह गलत है। सरकार लोगो की परेशानी की अनदेखी कर केवल अपना राजस्व बढ़ाने का प्रयास कर रही है जो गलत है।

इसी तरह अल्मोड़ा के ही युसूफ तिवारी कहते है कि सरकार को पहाड़ो में उद्योग लगाने चाहिए। युवाओ को रोजगार उपलब्ध कराना चाहिए। सरकार शराब को बढ़ावा दे रही है जो पहाड़ी क्षेत्रों के लिए सही नही है। पहाड़ो में महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान है। शराब की दुकानों को बंद करने की मांग करती रहती है। शराब से कई घर बर्बाद हो चुके है। सरकार लोगो की परेशानी नही देख रही है केवल राजस्व बढ़ाने में लगी है यह गलत है।

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